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उस काल मारे क्रोध के तन कांपने उसका लगा, मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा। मुख-बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ, प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित हुआ? युग-नेत्र उनके जो अभी थे पूर्ण जल की धार-से, अब रोष के मारे हुए, वे दहकते अंगार-से । निश्चय अरुणिमा-मित्त अनल की जल उठी वह ज्वाल सी, तब तो दृगों...

परिचय जन्म : 23 दिसंबर 1925 भाषा : हिंदी विधाएँ : व्यंग्य मुख्य कृतियाँ व्यंग्य उपन्यास : आँसू की मशीन, मुहब्बत मनोविज्ञान और मूँछदाढ़ी, काठ का उल्लू और कबूतर व्यंग्य कथा/निबंध : लोमड़ी का मांस, प्यासा और बेपानी के लोग, मुर्ग छाप हीरो, अफलातूनों का शहर, वृहन्नला का व्यक्तव, गधे की बात, हड़ताली बाबू, आधुनिक हिंदी...