असगर वजाहत
परिचय
जन्म : 5 जुलाई 1946, फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) भाषा : हिंदी विधाएँ : उपन्यास, कहानी, नाटक मुख्य कृतियाँ
उपन्यास : सात आसमान, कैसी आगी लगाई, रात में जागने वाले, पहर-दोपहर, मन माटी, चहारदर, फिरंगी लौट आये, जिन्ना की आवाज, वीरगति नाटक : जित लाहौर नईं वेख्या वो जन्म्या ई नईं, अकी, समिधा नुक्कड़ नाटक : सबसे सस्ता गोश्त कहानी संग्रह : मैं हिंदू हूँ, दिल्ली पहुँचना है, स्वीमिंग पूल, सब कहाँ कुछ यात्रा संस्मरण : चलते तो अच्छा था, इस पतझड़ में आना आलोचना : हिंदी-उर्दू की प्रगतिशील कविता सम्मान : कथा क्रम सम्मान, हिंदी अकादमी, इंदु शर्मा कथा सम्मान
संपर्क : 79, कला विहार, मयूर विहार, फेज 1, दिल्ली-110091
फोन : 91-11-22744579, 91-9818149015
ई-मेल : awajahat@yahoo.com
असगर वजाहत ने एम.ए. (हिंदी) और पीएच डी. अलिगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से की। डॉक्टरेट के बाद का शोधकार्य जवाहरलाल नेहरू यूनीवर्सिटी से किया .लेखन का आरंभ १९६० में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अध्ययन के समय से हुआ। लघु कथा, नाटक, उपन्यास और अन्य कई विषयों पर लेख अलग–अलग प्रकाशित। अभी तक १९ पुस्तकें प्रकाशित जिनमें पांच कथासंग्रह, चार उपन्यास, छे नाटक और नुक्कड़ नाटकों के संग्रह शामिल हैं। कहानियों के हिंदीतर अनेक भारतीय व अंग्रेजी, रूसी तथा इतालवी भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित। 'जिस लाहौर न वेख्या... नाटक की विश्व भर में अनेक प्रस्तुतियाँ। चलचित्रों की पटकथा का लेखन और टेलीविजन सिरियल्स के निर्देशन का अनुभव। कोलाज, रेखाचित्रण व छायाचित्रण का शौक। पाँच साल तक बुदापेस्ट, हंगेरी में हिंदी के प्रोफेसर। अनेक पुरस्कारों व सम्मानों से सुशोभित। असगर वजाहत अपनी अलग लेखन शैली के कारण हिन्दी साहित्य में अपना एक अलग स्थान रखते हैं .प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कहानियाँ कुछ लघु कथाएं
कहानियाँ
सूफी का जूता पूरे हिन्दुस्तान में सूफियों की तलाश शुरू हो गई हैं। पुराने, अनुभवी और थोड़ा-बहुत अपने आत्म-सम्मान का ध्यान रखने वाले सूफी इधर-उधर छिप गए ताकि विज्ञापन कंपनियों के दलालों से बच सकें, जो उनकी तलाश में घूम रहे हैं। किस्सा ये है कि सूफियों को कई बड़ी भारतीय कंपनियां अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाना चाहती हैं। ‘बिजनस विजार्ड्स’ ने बताया है कि अमेरिका में सफल हो जाने के बाद हिन्दुस्तान में भी सूफी फार्मूला पूरी तरह कामयाब होगा। अमेरिका में सूफी फॉर्मूला इसलिए सफल हो गया था कि वहां लोग सूफियों के दर्शन, प्रेम, त्याग और मैत्री के बारे में कुछ न जानते थे और ये उनके लिए आकर्षित करने वाले शब्द बन गए थे। जबकि हिन्दुस्तान में दो पीढ़ियों पहले लोग इन शब्दों से परिचित थे और अब ये शब्द नई जनरेशन के लिए नोस्टैल्जिया बन चुके हैं। और उनकी जगह डिस्को संगीत में सुरक्षित हो चुकी है। (2) बहुत खोजने के बाद एक सूफी मिला जो विज्ञापन एजेंसी वालों से बचने के लिए डाकू बन गया था। उसे यह भ्रम था कि डाकू बनकर बच जाएगा। पर चूंकि सूफी था इसलिए डाकू बनने के बाद भी सूफी ही रहा और पकड़ा गया। इस सूफी को दिल्ली की प्रसिद्ध तिहाड़ जेल से पकड़ा गया था। पहले उसकी सजा माफ कराई गई और उससे कहा गया कि अरबों डॉलर का मुनाफा कमानेवाली एक कारॅपोरेशन उसे जनहित के काम में लगाना चाहती है। ‘‘जनहित का क्या काम होगा’ सूफी ने पूछा। ‘‘कॉरपोरेशन ने जिस इलाके में अपनी विशालकाय फैक्टरी लगाई है। वहां पीने का पानी खत्म हो गया है, हवा दूषित हो गई है, पेड़ जल गए हैं। बच्चे अपंग पैदा होते हैं। वहां जाकर संतोष, त्याग, बलिदान का सन्देश देना है।’’ (3) सूफियों की इतनी चर्चा के बाद एक सज्जन ने सोचा कि पुराने-धुराने सूफी की तलाश की जाए और उससे सूफी बनने के हुनर सीखकर खुद सूफी बना जाए। बहुत खोजने पर सज्जन की सूफी तो नहीं, सूफी के एक पैर का जूता मिल गया। सज्जन को बहुत खोजने पर भी दूसरे पैर का जूता न मिला तो निराश होकर एक जूता घर ले आए। पर रात में जूते ने बोलना शुरू कर दिया। उसने कहा, ‘‘आजकल सूफियों का सबसे अच्छा प्रोफाइल डिजाइन अमेरिकन ड्रेस डिजाइनर पॉप जक्सीम करता है, तुम उसके पास जाओ।’’ ये सुनकर सज्जन बेहोश हो गए और सूफी का जूता हंसने लगा। और फिर जूता सज्जन की खोपड़ी और चेहरे पर लगातार बरसने लगा। सज्जन का चेहरा लाल हो गया। कुछ देर बाद सज्जन की जब आंख खुली तो वो पूरे सूफी बन चुके थे। और जूता वहां नहीं था। (4) देश के सबसे महंगे ड्रेस डिजाइनर ने सूफी कॉस्ट्यूम डिजाइन किया। चार कॉरपोरेशनों ने गुडविल फंडिंग की। एक एयर लाइन ने कहा कि अब उनकी एयर लाइन की एयर होस्टेस अगले महीने से सूफी ड्रेस में होंगी। बहरहाल, एक सात-सितारा होटल में सूफी अब्दुल कय्यूम अलसबा बोस्ताने बहश्तेवारे सकिने तूरानी को सूफी ड्रेस का उद्घाटन करने के लिए बुलाया गया। जगमगाते दरकार हॉल में कई देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री मौजूद थे। बिजना और फैशन की दुनिया का तो कोई सितारा ऐसा न था जो वहां न हो। सूफी अब्दुल कय्यूम अलसबा बोस्ताने बहश्तेवारे सकिने तूरानी के साथ कई राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सूफी ड्रेस पहनकर मंच पर आए। फिर सबने देखा कि सूफी समेत सब वी.वी.आई.पी. नंगे नजर आने लगे। (5) जब मामला सूफी कविता और सूफी संगीत से होता सूफी कॉस्ट्यूम, सूफी टूरिज्म सूफी फर्नीचर, सूफी डेकोर, सूफी डेकोर, सूफी बाथरूम, सूफी फूड, सूफी ज्वैलरी, सूफी शू, सूफी अंडर वियर और सूफी चाट मसाले तक आ गया तो सूफी वहीउद्दीन वल्द जहीरुद्दीन वल्द सुहीदुद्दीन वल्द करीमुद्दीन ने अपने बेटे टॉमउद्दीन से कहा ‘‘बेटा, अब तुम सूफी कफन की दुकान खोल लो।’’ ‘‘क्यों डैडी’ उनके बेटे टॉमउद्दीन ने पूछा। ‘‘बेटा, अब वही बचा है...वो काम हमने न किया तो यही कफन-चोर कर लेंगे।’’ (6) कोई दो सौ साल के बाद सूफी कदीर ने फिर से शरीर धारण किया तो उन्हें पता चला कि उनकी कब्र पर बहुत शानदार मकबरा बन गया है। पास ही विशाल दरगाह है। मकबरे के परिसर में ही एक पांच-सितारा होटल है। हजारों लोग कब्र पर फातिहा पढ़ने और चादर चढ़ाने आते हैं। लाखों रुपए रोज का चढ़ावा आता है। मुम्बई का हर डॉन और फिल्म स्टार उनकी पूजा करता है। ये सब जानकर सूफी कदीर बहुत खुश हुए और अपने मकबरे की तरफ बढ़े तो उन्हें उस तरफ से कुछ लोग भागकर आते दिखाई पड़े। इन लोगों ने सूफी कदीर से कहा कि मकबरे की तरफ मत जाना। ‘‘क्यों’ सूफी कदीर ने पूछा। ‘‘उधर गालियां चल रही हैं।’’ रोकने के बावजूद सूफी दरगाह की तरफ लपके। उन्हें डर था कि कहीं पुलिस की गोली से कोई मासूम न मर जाए। वे दरगाह के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा बन्दूकधारियों का एक दल मकबरे के अन्दर है और दूसरा बाहर। दोनों के बीच गोलीबारी हो रही है। ‘‘ये कौन लोग हैं जो एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं।’’ सूफी ने किसी से पूछा। ‘‘ये सूफी कदीर की औलादें...उनके वंशज हैं।’’ ‘‘ये क्यों लड़ रहे हैं। ‘‘दरगाह पर कब्जा करने के लिए।’’ ‘‘कब्जा कैसा कब्जा।’’ ‘‘लगता है, नए आए हो...चले...जाओ...नहीं तो बेकार में मार दिए जाओगे।’’ लेकिन सूफी कदीर तेजी से मकबरे की तरफ बढ़े। ‘‘ओय बुड्ढ़े, हट वहां से...कहां जा रहा है’ ‘‘मैं सूफी कदीर हूं बेटा।’’ ‘‘तो तू किसकी तरफ है हमारी तरफ या उनकी तरफ’ ‘‘मैं अपनी तरफ हूं बेटा।’’ ‘‘नौजवान ने उनके ऊपर गोलियां तड़तड़ा दीं और सूफी कदीर फिर दो सौ साल के लिए मर गए। (7) सूफी रहमानी के पास सब कुछ था। नाम था। इज्जत थी। शोहरत थी। लेकिन बदनसीबी यह कि सन्तान न थी। कोई औलाद न बचती थी। जब वह बहुत परेशान हो गया तो एक दिन उसके दोस्तों ने सलाह दी कि देश में एक ही आदमी है, जिसके आशीर्वाद से तुम्हारी औलाद बच सकती है। ‘‘ये आदमी कौन है।’’ सूफी ने पूछा। ‘‘ये हमारे देश का प्रधानमंत्री है।’’ ‘‘क्या उसकी दुआ में इतनी तासीर है’ ‘‘हां...वो चाहे तो ये हो सकता है...लेकिन उससे मिलना आसान नहीं है...’’ ‘‘क्या करना होगा’ ‘‘तुमको उसके दर तक सिर पर पैर रखकर जाना पड़ेगा।’’ मरता क्या न करता, सूफी प्रधानमंत्री के पास गया और उसके आशीर्वाद से एक बेटे का बाप बना। सूफी ने अपने बेटे का नाम प्रधानमंत्री के नाम पर रखा ताकि पूरी दुनिया ये समझ सके कि उसके ऊपर किसका क्या उपकार है। (8) सूफी हमीद की दुकान नहीं चल रही थी। सब कुछ करने के बावजूद न तो लोग उनके पास आते थे और न वे कहीं बुलाए जाते थे। खाने-पीने के लाले पड़ गए थे। एक दिन सूफी हमीद की बीवी ने कहा, ‘‘सुनो, मेरी मानो तो तुम अंग्रेजी बोलना सीख लो।’’ सूफी हमीद को बीवी की अक्लमन्दी पर हैरत हुई। वे बोले, ‘‘तू ये कैसे जानती है कि मेरी बदनसीबी का यही राज है कि मैं अंग्रेजी नहीं बोल सकता’ बीवी बोली, ‘‘लो, मैं न जानूंगी तो कौन जानेगा...सोते हुए तुम हर रात यही बड़बड़ाते हो कि अंग्रेजी बोल सकता होता तो ये हालत न होती।’’ (9) सूफी अजमली के पुत्र ने अपने पिता से कहा कि डैडी आप बेकार में शायरी,वायरी किया करते हैं। उसे आजकल कौन समझता है। आजकल के सूफी तो सूफी मुखड़ों को फिल्मी गानों में लाकर लाखों कमा रहे हैं। आप इधर ट्राई क्यों नहीं करते सूफी बोले, ‘‘बेटा वहां मैं ट्राई कर चुका हूं। गीतकारों और म्यूजिक डायरेक्टरों ने बड़ी सांठ-गाठं कर रखी है। वहां किसी की दाल गलना मुश्किल है।’’ बेटा बोला, ‘‘वो सब छोड़िए आप डांस के एरिया में क्यों नहीं निकल जाते मैं बैंड पकड़ लुंगा। सिस्टर डांस करेगी। मां एंकर हो जाएंगी। छोटू पब्लिसिटी में लग जाएगा। दादा जी को बुकिंग विंडो पर बैठा देंगे।’’ (10) चार सूफियों को सोने के लिए एक कम्बल दे दिया गया। पहले तो चारों सूफी कम्बल देने वाले पर बहुत चिल्लाए। उन्होंने कहा, ‘‘चार कम्बल नहीं थे चार सूफियों को बुलाया ही क्यों था। ये सूफियों का अपमान है।’’ खैर कम्बल देने वाला जान बचाकर चला गया। लाने से पहले कह गया कि मैं आयोजकों को भेजता हूं। उसके जाने के बाद एक सूफी ने कहा, ‘‘मैं तो तुम जैसे तीन घटिया सूफियों के साथ एक कम्बल में सोने से मर जाना ज्यादा पसन्द करूंगा।’’ ‘‘तो यूं मर ही जाओ।’’ तीनो सूफियों ने उसे मार डाला। अब तीन सूफी बचे। तीनों ने तय किया कि कम्बल के तीन हिस्से कर लिये जाएं और तीनों एक-एक हिस्सा ले लें। कम्बल कैसे बनता जाए, इस बात को लेकर तीनों में बहस हो गई। एक सूफी और मर गया। अब दो बचे। उनमें ये झगड़ा शुरू हुआ कि कम्बल के तीन हिस्से दो सूफियों में केसे बांटे जाएं। इस बात पर दोनों लड़ने लगे और एक और सूफी की जान चली गई। अब अकेले सूफी ने सोचा कि उस पर ही तीन की हत्या का आरोप आएगा। यह सोचकर उसने आत्महत्या कर ली। तब आयोजक आए, जो एक नेता थे। उनके साथ तीन नेता और थे। तमाशे में डूबा हुआ देश मैं पहले कहानियाँ लिखा करता था। अब मैंने कहानियाँ लिखना छोड़ दिया है क्योंकि कहानी लिखने से कोई बात नहीं बनती। झूठे सच्चे पात्र गढ़ना, इधर उधर की घटनाओं को समेटना, चटपटे संवाद लिखना, अपनी पढ़ी हुई किताबों की जानकारियों और अपने ज्ञान को कहानी में उलट देने से क्या होता है? मैं अपने दूसरे कहानीकार मित्रों को सलाह देता हूँ कि वे कहानी वहानी लिखने का काम छोड़ दें। हमारे इस देश में जहाँ रोज, हर पल, हर जगह कहानी से ज्यादा निर्मम घट रहा हो वहाँ कहानी लिखना बेकार की बात है। अपने चारों तरफ निगाह उठा कर देखिए, आपको बिखरी पड़ी कहानियाँ देख कर अपने कहानीकार होने पर शर्म आएगी जो मुझे आ चुकी है और मैंने कहानियाँ लिखना बंद कर दिया है। लेकिन चूँकि लिखने की आदत पड़ चुकी है और लिखे बिना चैन भी नहीं आता इसलिए सोचा है मैं कहानियाँ न लिख कर 'वाक्या' लिखा करूँगा। 'वाक्या' उर्दू का शब्द है जिसका मतलब 'घटना' निकाला जा सकता है लेकिन शायद बात पूरी बनेगी नहीं। 'वाक्या' किसी ऐसी सच्ची घटना का विवरण कहा जा सकता है जो रोचक, नाटकीय और मनोरंजक हो। केवल घटना मात्र न हो। अगर मैं आपको सिर्फ घटनाएँ सुनाने लगूँगा तो उसमें कुछ मजा न आएगा और आप मुझे बेवकूफ और मूर्ख समझ कर पढ़ना बंद कर देंगे। हो सकता है यह काम आप 'वाक्या' सुनने के बाद भी करें लेकिन मुझे अब भी उम्मीद है कि और कुछ करें या न करें 'वाक्ये' को सुन लेंगे। यह सच्चा वाक्या है। बहरहाल सच्चाई तो वैसे भी सामने आ जाएगी। मेरे कहने से न सच झूठ हो सकता है और न झूठ सच हो जाएगा। हमारे ही देश के एक शहर में एक आदमी गायब हो गया और दो कुत्ते के पिल्ले गायब हो गए। मैं शहर का नाम नहीं बताऊँगा क्योंकि वाक्यानिगार होने का यह मतलब नहीं है कि मैं लोगों का दिल दुखाऊँ और अपना जीना हराम कर लूँ। आप जानते ही हैं कि आज हमारे अहिंसक देश में हर तरह की हिंसा तरक्की पर है। पहले जो बात तू तू मैं मैं पर खत्म हो जाती वह अब हत्या का कारण बन जाती है। अब तो हत्यारों का सम्मान होता है। मैं जिस इलाके का रहनेवाला हूँ वहाँ जिसने जितनी हत्याएँ की होती हैं उसका उतना सम्मान होता है। यही कारण है कि आज तक मेरे इलाके में मेरा सम्मान नहीं हो सका है क्योंकि मैं मक्खी मारने लायक भी नहीं हूँ। सम्मान के मानदंड बदल गए हैं। इसे साबित करने के लिए मिसाल के लिए एक और वाक्या भी है। विधान सभा के चुनाव हो जाने के बाद कुछ नेतागण विधायक कैंटीन में बैठे बातचीत कर रहे थे और सब एक दूसरे से पूछ रहे थे कि आपने कहाँ से 'कंटेस्ट' किया था। ध्यान दें कि उनमें लोकतंत्र की भावना कितनी प्रबल थी। वे हारने या जीतने की बात नहीं कर रहे थे, केवल 'कंटेस्ट' करने की बात कर रहे थे। सबने बताया कि उन्होंने कहाँ कहाँ से 'कंटेस्ट' किया है। एक आदमी से पूछा गया तो उसने कहा कि मैंने कहीं से 'कंटेस्ट' नहीं किया है। सब उसे देख कर हैरत में पड़ गए और कहा, जाइए जा कर काउंटर से छह चाय ले आइए। अब बात लोकतंत्र की शुरू हो गई है तो एक वाक्या और सुनते चलिए। विधान सभा के सामने किसी मुद्दे पर अनिश्चितकालीन अनशन जारी था। किसी सामाजिक सरोकार के मुद्दे पर किसी संस्था की ओर से प्रतिदिन एक आदमी अनशन पर बैठता था। मैं उधर से गुजर रहा था। मैंने देखा कि अनशन पर बैठा आदमी तो पम्मी शर्मा है। मैं उसे जानता हूँ। वह उभरता हुआ नेता है और उसने अपने लिए सभी पार्टियों के दरवाजे खुले रखे हैं। मैंने सोचा क्यों न पम्मी शर्मा से मिल लूँ, ऐसी कठिन घड़ी में मेरे दो शब्द उसे ताकत देंगे और फिर पम्मी से कोई काम पड़ा तो उसे याद रहेगा कि मैंने कठिन क्षणों में उससे कुछ अच्छे शब्द कहे थे। गरज यह कि मैं उसके पास गया। वह मुझे देख कर इतना खुश हो गया जितना पहले न होता था। उसने बताया कि अनशन चालीस दिन से चल रहा है, मुझे अपने देश के विकसित लोकतंत्र पर गर्व हुआ। मैंने उसकी तारीफ की। उसने कहा - 'यार, एक दिन के लिए तुम भी अनशन पर बैठ जाओ।' मैं पहले तो चौंका, कुछ घबराया पर उसने कहा - 'यार एक दिन की तो बात है, सुबह बैठोगे... शाम को खत्म हो जाएगा।' मैं तैयार हो गया। सोचा ठीक है यार देश की लोकतंत्रिक ताकतों को मजबूत करने के लिए इतना तो करना चाहिए। मैं अगले दिन सुबह ही सुबह वहाँ पहुँच गया। वहाँ सात आठ लोग चाय पी रहे थे। पम्मी शर्मा भी था। उसने मुझे गद्दी पर बैठाया। गले में गेंदे के फूलों की माला डाली। तिलक लगाया। मेरा अनशन जारी हो गया। मैं अपनी आत्मा को उत्फुल्ल महसूस करने लगा। थोड़ी देर में पम्मी मेरे पास आया और बोला - 'किसी आदमी का इंतिजाम कर लेना।' मैं हैरत से उसकी तरफ देखने लगा। वह समझ गया था कि मैं अभी तक नहीं समझ पाया हूँ। वह बोला - 'जो अनशन से हटेगा... उसे टेंटवाले का, चायवाले का, जूसवाले का, माली का 'पेमेंट' करना होगा।' मेरे तो पैरों तले से जमीन निकल गई। मैंने गिड़गिड़ाते हुए कहा - 'यार, उस संगठन के लोग कहाँ हैं जिन्होंने अनशन कराया है?' उसने कहा - 'वे तो सब अपने अपने घर चले गए हैं... तुम्हें कुछ नहीं करना बस एक आदमी का इंतिजाम कर लो... और सुनो...' वह जाने से पहले बोला - 'शाम को जूसवाले से जूस मँगा लेना, उसके यहाँ भी हिसाब चल रहा है।' पम्मी चला गया। पम्मी ने अपनी टोपी मेरे सिर में फिट कर दी थी। मैं अब समझा कि यही है हमारा लोकतंत्र। अब मेरे साथ क्या हुआ यह मैं आपको नहीं बताऊँगा। बस यह समझ लीजिए कि अब मैं उस शहर नहीं जाता जहाँ अनशन पर बैठा था। क्योंकि टेंटवाला, चायवाला, जूसवाला, माली सब मुझे तलाश कर रहे हैं। पम्मी से मैंने जब यह बताया था कि यार टेंटवाला, चायवाला वगैरा मुझे खोज रहे हैं तो वह लापरवाही से बोला था - 'खोजने दो सालों को, इस देश में यही हो रहा है। किसी न किसी को कोई न कोई खोज रहा है और किसी को कोई नहीं मिलता। तुम आराम से अपने लिखने पढ़ने के काम में लग जाओ।' मैं पम्मी की सलाह पर लिखने पढ़ने के काम में लग गया हूँ तब ही यह वाक्या लिख रहा हूँ। माफ कीजिएगा मैंने बात शुरू की थी, एक शहर में एक आदमी और कुत्ते के पिल्लों के गायब होने से लेकिन होते हुआते मैं देश के लोकतंत्र पर आ गया। दरअसल वाक्यानिगारों की यही कमी होती है, वो बात शुरू तो कर देते हैं पर जानते नहीं कि बात कहाँ पहुँचेगी। तो जनाब एक शहर में एक आदमी गायब हो गया। उसकी पत्नी पता चलाने पुलिस के पास गई तो पुलिस ने कहा कि अभी तक कोई सिरकटी लाश नहीं मिली है, जैसे ही मिलेगी उसे बता दिया जाएगा। आदमी की पत्नी यह सुन कर डर गई। पुलिस ने कहा - 'इस देश में मौत से डरोगी तो रह ही नहीं सकती। हम लोग मौत से नहीं डरते। आत्मा पर हमारा विश्वास है। मौतें तो इस देश में ऐसे आती हैं जैसे दूसरे देशों में बहार आती है। देखो दस पाँच हजार औरतें तो जला दी जाती हैं, दस बीस हजार सड़कों पर कुचल कर मर जाते हैं, पता नहीं कितने दंगों में मार दिए जाते हैं, अकाल और बाढ़ की तो पूछो ही मत। नौकरी पाने के इच्छुक गोली खा कर मर जाते है। आतंकवादी हजारों को मार डालते हैं। तो देश क्या है बूचड़खाना है। अब काजल की कोठरी में रह कर काला होने से क्या डरना... शुक्र कर, तेरे आदमी की अभी लाश नहीं मिली है। हो सकता है अपहरण हो गया हो। फिरौती के लिए चिट्ठी या फोन आए।' औरत बोली - 'दरोगा जी, हमारे पास क्या है जो कोई फिरौती के लिए अगवा करेगा! दो टाइम खाने को नहीं जुटता।' 'तब तो अपहरण की ट्रेनिंग लेनेवालों ने अभ्यास के तौर पर तेरे पति का अपहरण कर लिया होगा।' 'ये क्या होता है दरोगा जी।' 'देख, देश में बहुत से प्राइवेट स्कूल कालिज खुल गए हैं। अपहरण उद्योग के रिटायर्ड लोगों ने मिल कर 'अपहरण कालिज' खोल दिया है। अच्छी फीस लेते हैं... वे अपने छात्रों से कहते हैं कि नमूने के तौर पर किसी का अपहरण करके दिखाओ... वे लोग तेरे पति को छोड़ देंगे... बशर्ते कि ...' पुलिसवाला बोलते बोलते रुक गया। 'क्या बशर्ते कि दरोगा जी?' औरत ने पूछा। 'देख, यह भी हो सकता है कि अपहरण के प्रयोग के बाद उन्होंने तेरे पति को किसी दूसरे स्कूल में पहुँचा दिया हो।' 'क्या मतलब दरोगा जी?' 'देख हत्या करना, गोली मारना, गला काटना आदि आदि सिखाने के भी तो स्कूल खुले हैं न?' औरत रोने लगी। पुलिस बोली - 'रो मत, हो सकता है मानव अंगों की तस्करी करनेवाले किसी गिरोह ने पकड़ लिया हो। तेरा पति आ तो जाएगा पर ये समझ ले एक गुर्दा न होगा, या एक आँख न होगी, या मान ले ...' औरत रोने लगी। पुलिस ने कहा अब यहाँ थाने में न रो। यहाँ औरतें रोती हैं तो लोग जाने क्या क्या समझते हैं। यहाँ से तो तुझे हँसते हुए जाना चाहिए।' ये तो हुई आदमी के गुम हो जाने की बात। अब सुनें कुत्ते के पिल्लों की गुमशुदगी की दास्तान। दरअसल जो कुत्ते के पिल्ले खोए है उन्हें कुत्ते का पिल्ला कहने से भी डर रहा हूँ। उसकी वजह है। आपको मालूम ही है कि कुछ साल पहले अमेरिका के राष्ट्रपति जब अपने दल बल के साथ दिल्ली आए थे तो उनके साथ कुत्ते भी थे। उनके कुत्तों की प्रतिष्ठा, गरिमा, पद आदि के बारे में पता न होने के कारण एक भारतीय अधिकारी ने उन्हें कुत्ता कह दिया था। इसी बात पर उस अधिकारी के खिलाफ कुत्तों की मानहानि का दावा कर दिया गया था। अदालत में अमेरिकी सरकार के प्रतिनिधि ने कहा था, ये कुत्ते नहीं हैं - इनके नाम और पद हैं। एक का नाम जैक जॉनी है और वह मेजर के पद पर है। दूसरे का नाम स्टीव शॉ है जो कैप्टेन है। तीसरी कुतिया का नाम लिंडा जॉन्स है जिसने अभी अभी ज्वाइन किया है और वह सेकेंड लेफ्टीनेंट है। अदालत ने इन अधिकारियों की मानहानि करने के सिलसिले में संबंधित अधिकारी को सजा सुनाई थी और यह आदेश दिया था कि भविष्य में इन कुत्तों को कुत्ता नहीं कहा जाएगा, यही वजह रही कि राजधानी के समाचारपत्र बड़े आदर और सम्मान से कुत्तों के नाम और पद छापते रहे। आप हम सब जानते हैं कि वैसे भी हमारे समाचारपत्र कुत्तों का कितना ध्यान रखते हैं क्योंकि उससे लाभ हानि जुड़ी होती है। हुआ यह कि एक रात दो बजे मंत्रीपुत्र के घर से थाने फोन आया। थाने की नींद उड़ गई। मंत्रीपुत्र ने डाँटा और कहा कि तुम सोते रहते हो और चोर चोरी करते रहते हैं। तुम्हें पता है बेबी रतन और बेबी गौरी का अपहरण हो गया है। थाने में तुरंत कार्यवाही की बात उठी। पर सब जानते थे कि मंत्रीपुत्र अभी तक अविवाहित है और उसने कसम खाई हुई है कि जब तक स्वयं मंत्री नहीं बन जाएगा शादी नहीं करेगा। ऐसी हालत में बेबी रतन और बेबी गौरी कहाँ से आ गए। इस सवाल का जवाब कोई न दे सका तो हवालात में बंद एक अपराधी ने दिया। उसने बताया, बेबी रतन और बेबी गौरी मैडम लूसी और सर जॉनसन की औलादें हैं जिन्हें मंत्रीपुत्र यू.एस. से खरीद कर लाए थे और अनजान तथा अनाड़ी इन्हें कुत्ते के पिल्ले कह उठे थे जिस पर उसी समय उनकी जुबान खिंचवा ली गई थी। रतन और गौरी के अपहरण की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई। स्थानीय पत्रकारों के बाद टी.वी. चैनल वाले धमक पड़े और पूरा थाना कैमरों, लाइटों, कटरों से भर गया। कुछ टी.वी.वाले मंत्रीपुत्र की कोठी पर पहुँच गए। सबसे पहले यह 'ब्रेकिंग न्यूज' 'जल्वा चैनल' ने दी। उसके बाद यह ब्रेकिंग न्यूज 'समकुल चैनल' पर शुरू हुई। उसके बाद तो घमासान शुरू हो गया। हर चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज स्टोरी चलने लगी, रतन और गौरी के 'स्टिल्स' और 'फुटेज' की माँग इतनी बढ़ गई कि प्रोडक्शन हाउसोंवाले पागल हो गए। चैनलों में तूफान मच गया। एक रिपोर्टर की नौकरी इसलिए चली गई कि वह रतन की फोटो नहीं ला सका। दूसरे चैनल में किसी का प्रोमोशन हो गया कि वह मंत्रीपुत्र की 'बाइट' ले आया। एक पत्रकार को पीटा गया, क्योंकि उसने मंत्रीपुत्र के कुत्ताघर, जिसे अंग्रेजी में सब 'केनल्ल' कहते थे, में घुसने की कोशिश की थी। दो पुलिसवाले सस्पेंड हो गए क्योंकि चार घंटे हो गए थे और उन्होंने रतन और गौरी का पता नहीं लगाया था। डी.एम. का ट्रांसफर होते होते बचा और एस.पी. को 'कारण बताओ' नोटिस दे दिया गया। चैनलवालों ने पुलिस को पटाने का काम शुरू किया। वे चाहते थे कि इस पूरे ऑपरेशन में जिसे पुलिस ने 'आपरेशन ट्रुथ' का नाम दिया था, वे लगातार पुलिस के साथ रहें। 'जल्वा' चैनलवालों ने पुलिस को यह समझा कर पटाया कि 'आपरेशन ट्रुथ' के बाद चैनल पुलिस का इंटरव्यू दिखाएगा। यह बात 'चैनल फोर फाइव सिक्स'वाले को पता चल गई। उन्होंने पुलिस को पच्चीस हजार नकद देने का वायदा किया। कहा यह कि 'जल्वा'वालों की जगह उन्हें पूरे 'ऑपरेशन ट्रुथ' में साथ रखा जाए। यह बात 'मून चैनल'वालों को पता चली तो उन्होंने गृह मंत्रालय के एक सीनियर ऑफीसर से फोन कराया और आदेश दिया गया कि पुलिस 'मून चैनल'वालों को प्राथमिकता दे। बात इतने ऊपर पहुँच चुकी थी कि पुलिसवाले डरने लगे। डी.एम. को लगने लगा कि कल कहीं प्रधानमंत्री सचिवालय से फोन न आ जाए। पुलिस ने छापे मारने शुरू किए। चार टीमें बनाई गईं और रात दिन रतन और गौरी की तलाश का काम शुरू हो गया। इसी दौरान मंत्रीपुत्र के पास फोन आया कि फलाँ फलाँ जगह पचास करोड़ रुपया न पहुँचाया गया तो रतन और गौरी की हत्या कर दी जाएगी। अब स्टोरी का एक नया 'ऐंगिल' निकल आया। चैनल विशेषज्ञों को बुला कर उनसे बहस कराने लगे। सुखद यह रहा कि चैनलवालों को इस मसले में विशेषज्ञ बदलने नहीं पड़े। दो चार आदमी जो राजनीति, समाज, वनस्पतिशास्त्र और खगोलशास्त्र के विशेषज्ञ थे और हर तरह के कार्यक्रमों में टी.वी. पर आया करते थे वही गौरी और रतनवाले मामले में भी आए और दर्शक यह सोच कर अचंभे में पड़ गए कि राजनीति के मर्मज्ञ कुत्तों के बारे में भी पूरी जानकारी रखते हैं। चैनलवाले गर्व से कहते थे कि विशेषज्ञता और 'प्रोफेशलनिज्म' के जमाने में हमने ऐसे लोग खोज रखे हैं जो संसार की किसी भी समस्या, ज्ञान विज्ञान के किसी भी क्षेत्र में, लोक परलोक की किसी भी घटना के बारे में विद्वत्तापूर्ण ढंग से विचार व्यक्त कर सकते हैं। ईश्वर का करना कुछ ऐसा हुआ कि पुलिस, सी.आई.डी., आई.बी., रॉ. और दूसरी खुफिया एजेन्सियों ने मिल कर रेड डालने शुरू किए और आखिरकार पता चला कि एक जगह शहर के बाहर एक फार्म हाउस में रतन और गौरी को रखा गया है। अपहरणकर्ता पूरे असलहे से लैस हैं। उनके पास बोफोर्स तोपों से ले कर 'एंटी-एयरक्राफ्ट गन' तक मौजूद है। अब तो सेना से मदद लेने की जरूरत पड़ी। गृह मंत्रालय ने सुरक्षा मंत्रालय से निवेदन किया और एक ले. जनरल के साथ ब्रिगेड भेज दी गई। टी.वी. चैनलों पर बहस का मुद्दा यह था कि इस 'ऑपरेशन ट्रुथ' में रतन और गौरी सलामत निकल आएँगे या नहीं। यह भी जानकारी मिली कि अपहरणकर्ताओं ने मार्केट से दो सौ टन टी.एन.टी. भी खरीदी है और उसका जखीरा भी उनके पास है। टी.वी. चैनलों के वही विशेषज्ञ जो वनस्पति विज्ञान से ले कर सुपरसोनिक जेटों तक के विशेषज्ञ थे कहने लगे इतना 'एक्सप्लोसिव मैटीरियल' तो पूरे फार्म हाउस को ज्वालामुखी की तरह उड़ा देगा और जाहिर है उसमें नन्हे मुन्ने रतन और गौरी के बचने की क्या उम्मीद होगी। तब कहा गया कि यह दरअसल मनोवैज्ञानिक लड़ाई है। इसे भारत अकेले नहीं लड़ सकता। इसमें तो जब तक अमेरिका का सपोर्ट नहीं होगा यह लड़ाई नहीं जीती जा सकती। अमेरिका से कहा गया तो वहाँ से बड़ा सार्थक और उत्साहवर्धक जवाब आया। अमेरिका ने कहा कि वह तो संसार के हर कोने में शांति स्थापित करने के लिए दृढ़संकल्प है। जहाँ भी शांति भंग होने, मानव अधिकारों के हनन का सवाल उठता है अमेरिका उठ खड़ा होता है। और अब चूँकि भारत में ऐसी स्थिति आ गई है इसलिए अमेरिका अवश्य ही आएगा। यह भारत की सभ्यता है कि वह अमेरिका को आमंत्रित कर रहा है। यदि न भी कर रहा होता तो अमेरिका आता क्योंकि वह विश्व में शांति स्थापित करना चाहता है और यह उसके 'एजेंडे' का एक और पहला मुद्दा है। यही नहीं, अमेरिका ने घोषणा कर दी कि उसकी सेनाएँ ध्वनि से तेज चलनेवाले विमानों पर बैठ कर भारत के लिए रवाना हो चुकी हैं। हिंद महासागर में अमेरिकी बेड़ों को भारत की तरफ कूच करने का आदेश दे दिया गया है। और यह भी कहा गया कि भारत को चाहिए कि सेनाओं के पहुँचने से पहले कोकाकोला और पेप्सीकोला का पर्याप्त भंडार कर ले। मैक्डानाल्ड हैंबर्गर, अंकिल चिप्स, कनटकी चिकन, एफ.टी.जे. वगैरा की जितनी ज्यादा दुकानें खोली जा सकती हों खुलवा दे क्योंकि अमेरिकी सैनिक जाहिर है दाल रोटी नहीं खाएँगे। चूँकि यह आदेश था इसलिए इंतिजाम पूरा हो गया। बड़े बड़े अमेरिकी बाजार खुल गए जहाँ सुई से ले कर हवाई जहाज तक उपलब्ध था। ऐसी तैयारी का नतीजा भी अच्छा निकला। लेजर बम से रतन और गौरी के एक अपहरणकर्ता को मार गिराया गया। दूसरा एक तहखाने में छिप गया था। उसने दाढ़ी बढ़ा ली थी, उसे पकड़ा गया। अमेरिकी सैनिकों ने कहा कि हम इसे अमेरिका ले जाएँगे और चिड़ियाघर में बंद कर देंगे ताकि विश्व शांति भंग करनेवालों के लिए एक सबक हो। चूँकि अमेरिकी सैनिकों के लिए पेप्सी, कोला, बियर, हैंबरगर आदि का बड़ा स्टाक था इसलिए उन्हें वापस जाने की जल्दी नहीं थी। उन्होंने कहा कि हम तो आपके देश से विश्वशांति भंग करनेवाली सभी शक्तियों को नष्ट करके ही जाएँगे। उनके इस विचार का स्वागत किया गया और वे यहाँ पेप्सी पी पी कर मोटे होने लगे। जिस दिन थाने में रतन और गौरी पहुँचे उसी दिन वहाँ एक सिरकटी लाश भी पहुँची। रतन और गौरी के मिल जाने की वजह से थाने के चारों तरफ दफा 104 लगा दिया गया था, क्योंकि ओ.वी. वैनों से रास्ता बंद हो गया था और दर्शकों का सैलाब था जो अमेरिकी सैनिकों और रतन गौरी को देखने के लिए उमड़ पड़ा था। कई बार लाठी चार्ज हो चुका था पर दर्शक काबू में नहीं आ रहे थे। वे जयजयकार कर रहे थे। खुशी के मारे आपे से बाहर हुए जा रहे थे। इसी बीच मैली कुचैली धोती बाँधे, तीन बच्चों को सँभाले किसी तरह गिरती पड़ती एक औरत थाने पहुँची। उसे पता लग गया था कि आज एक सिरकटी लाश थाने लाई गई है। किसी न किसी तरह यह औरत थाने के अंदर आ गई। वहाँ टीवी चैनलवाले भरे पड़े थे और अमेरिकी सैनिकों के साथ सिगरेटें पी रहे थे। एकआध बीयर की घूँट भी मिल जाती थी। टी.बी.सी. चैनल की राधिका रमन ने देखा कि एक औरत सिरकटी लाश के पास खड़ी उसे पहचानने की कोशिश कर रही है। उसके साथ तीन छोटे छोटे बच्चे भी खड़े हैं। राधिका ने अपने बॉस सत्यकाम से कहा - 'सर, ये देखिए कितनी अच्छी स्टोरी है। सिरकटी लाश को यह औरत पहचानने की कोशिश कर रही है। तीन बच्चे पास खड़े हैं। इसे शूट करें सर?' सत्यकाम बिगड़ कर बोला - 'क्या चाहती हो चैनल बंद हो जाए।' 'नहीं सर... लेकिन क्यों?' राधिका ने कहा। सत्यकाम बोले - 'इस औरत, बच्चों और लाश का 'विजुअल' देख कर सी.ई.ओ. मिस्टर मेहरा मेरी तो छुट्टी कर देंगे।' 'क्यों सर?' सत्यकाम बोले - 'ओ माई गॉड... तुम्हें ये भी बताना पड़ेगा? अरे हमारे चैनल पर 'ऐड' आते हैं, विज्ञापन समझीं?' 'हाँ सर।' वो विज्ञापन किसके लिए होते हैं? कौन वह सामान खरीदता है? वह क्या देखना... 'चलो चलो कैमरा लगाओ... रिफ्लेक्टर... साउंड...' चैनल का संवाददाता चिल्लाने लगा क्योंकि थाने के अंदर बड़े खूबसूरत मंच पर रतन और गौरी को लाया जा रहा था। उनके पीछे पीछे मंत्रीपुत्र, कमल का फूल बना, आ रहा था। पीछे अधिकारी, सेना के पदाधिकारी आदि थे। संगीत बज रहा था। कबूतर और गुब्बारे हवा में छोड़े जा रहे थे। आतिशबाजी आसमान पर रंगबिरंगे करिश्मे दिखा रही थी। पूरी इमारत जगमगा रही थी। लगता था आज छब्बीस जनवरी या पंद्रह अगस्त है। चारों तरफ उल्लास, मस्ती, विजय का भव्य प्रदर्शन व्याप्त था। उस औरत ने सिरकटी लाश पहचान ली थी। यह उसका पति ही था, औरत रो रही थी, पर मौज, मस्ती, आनंद, उल्लास, जश्न, गीत, संगीत के माहौल में उसकी आवाज कोई नहीं सुन रहा था। उसके बच्चे अपने फटे पुराने कपड़ों में सहमे, सिकुड़े, मुँह खोले मंच पर होनेवाले तमाशे में डूबे हुए थे। वे न अपनी माँ को देख रहे थे, न बाप की सिरकटी लाश को।
केक
उन्होंने मेज़ पर एक ज़ोरदार घूंसा मारा और मेज़ बहुत देर तक हिलती रही। 'मैं कहता हूं जब तक ऐट ए टाइम पांच सौ लोगों को गोली से नहीं उड़ा दिया जायेगा, हालात ठीक नहीं हो सकते।' अपनी खासी स्पीकिंगपावर नष्ट करके वह हांफने लगे। फिर उन्होंने अपना ऊपरी होंठ निचले होंठ से दबाकर मुझे घूरना शुरू किया। वह अवश्य समझ गये थे कि मैं मुस्करा रहा हूं। फिर उन्होंने घूरना बंद कर दिया और अपनी प्लेट पर पिल पड़े।रोज़ ही रात को राजनीति पर बात होती है। दिन के दो बजे से रात आठ बजे तक प्रूफ़रीडिंग का घटिया काम करते-करते वह काफ़ी खिसिया उठते हैं। मैंने कहा, 'उन पांच सौ लोगों में आप अपने को भी जोड़ रहे हैं?' 'अपने को क्यों जोडूं? क्या मैं क्रुक पॉलिटीशियन हूं या स्मगलर हूं या करोड़ों की चोरबाज़ारी करता हूं?' वह फिर मुझे घूरने लगे तो मैं हंस दिया। वह अपनी प्लेट की ओर देखने लगे। 'आप लोग तो किसी भी चीज़ को सीरियसली नहीं लेते हैं।' खाने के बाद उन्होंने जूठी प्लेटें उठायीं और किचन में चले गये। कुर्सी पर बैठे-ही-बैठे मिसेज़ डिसूजा ने कहा, 'डेविड, मेरे लिये पानी लेते आना।' डेविड जग भरकर पानी ले आये। मिसेज़ डिसूजा को एक गिलास देने के बोले, 'पी लीजिए मिस्टर, पी लीजिए।' मेरे इनकार करने पर जले-कटे तरीके से चमके, 'थैंक्स टू गॉड! यहां दिन-भर पानी तो मिल जाता है। अगर इंद्रपुरी में रहते तो पता चल जाता। ख़ैर, आप नहीं पीते तो मैं ही पिये लेता हूं,' कहकर वह तीन गिलास पानी पी गये। खाने के बाद इसी मेज पर डेविड साहब काम शुरू कर देते हैं। आज भी वह प्रूफ़ का पुलिंदा खोलकर बैठ गये। उन्होंने मेज़ साफ की। मेज़ के पाये की जगह इसी ईंटों को हाथ से ठीक किया, ताकि मेज़ हिल न सके। फिर टूटी कुर्सी पर बैठे-बैठे अचानक अकड़ गये और नाक का चश्मा इस तरह फिट किया जैसे बंदूक में गोलियां भर ली हों। होंठ खास तरह से दबा लिये। प्रूफ़ पांडुलिपि से मिलाने लगे। गोलियां चलने लगीं। इसी तरह डेविड साहब रात बारह बजे तक प्रूफ़ देखते रहते हैं। इसी बीच से कम-से-कम पचास बार चश्मा उतारते और लगाते हैं। बंदूक में कुछ खराबी हैं। पांच साल पहले आंखें टैस्ट करवायी थीं और चश्मा खरीदा था। अब आंखें ज्यादा कमज़ोर हो चुकी हैं, परंतु चश्मे का नंबर नहीं बढ़ पाया है। हर महीने की पंद्रह तारीख को वह अगले महीने आंखें टैस्ट करवाकर नया चश्मा खरीदने की बात करते हैं। बंदूक की कीमत बहुत बढ़ चुकी है। प्रूफ़ देखने के बीच पानी पीयेंगे तो वह 'बासु की जय` का नारा लगायेंगे। 'बासु` उनका बॉस है जिससे उन्हें कई दर्जन शिकायतें मुझे भी हैं। ऐसी शिकायतें पेश्तर छोटा काम करने वालों को होती हैं। 'बड़ा जान लेवा काम है साहब।' वे दो-एक बार सिर उठाकर मुझसे कहते हैं। मैं 'हूं-हां` में जबाव देकर बात आगे बढ़ने नहीं देता। लेकिन वह चुप नहीं होते। चश्मा उतार कर आंखों की रगड़ाई करते हैं, 'बड़ी हाईलेविल बंगलिंग होती है। अब तो छोटे-मोटे करप्शन केस पर कोई चौंकता तक नहीं। पूरी मशीनरी सड़-गल चुकी है। ये आदमी नहीं, कुत्ते हैं कुत्ते. . .। मैं भी आजादी से पहले गांधी का स्टांच सपोर्टर था और समझता था कि नॉन-वाइलेंस इज द बेस्ट पॉलिसी। लटका दो पांच सौ आदमियों को सूली पर। अरे, इन सालों का पब्लिक ट्रायल होना चाहिए, पब्लिक ट्रायल!' 'पब्लिक ट्रायल कौन करेगा, डेविड साहब,' मैं झल्ला जाता हूं। इतनी देर से लगातार बकवास कर रहे हैं। वे दोनों हाथों से अपना सिर पकड़कर बैठ जाते हैं। 'मासेज में अगर लेफ़्ट फोर्सेज. . .', वे धीरे-धीरे बहुत देर तक बड़बड़ाते रहते हैं। मैं जासूसी उपन्यास के नायक को एक बार फिर गोलियों की बौछार से बचा देता हूं। वह कहते हैं, 'आप, भी क्या दो-ढाई सौ रुपये के लिए घटिया नॉवल खिला करते हैं!' मैं मुस्कराकर उनके प्रूफ़ के पुलिंदे की तरफ़ देखता हूं और वह चुप हो जाते हैं। गंभीर हो जाते हैं। 'मैं सोचता हूं ब्रदर, क्या हम-तुम इसी तरह प्रूफ़ पढ़ते और जासूसी नॉवल लिखते रहेंगे? सोचो तो यार! दुनिया कितनी बड़ी है। यह हमें मालूम है कि कितनी अच्छी तरह से जिंद़गी गुजारी जा सकती है। कितना आराम और सुख है, कितनी ब्यूटी है. . .।' 'परेशानी तो मेरे लिए है, डेविड साहब। आप तो बहुत से काम कर सकते हैं। मुर्गी-खाना खोल सकते हैं। बेकरी लगा सकते हैं. . .।' वह आंखें बंद करके अविश्वास-मिश्रित हंसी हंसने लगते हैं। और कमरे की हर ठोस चीज़ से टकराकर उनकी हंसी उनके मुंह में वापस चली जाती है। अक्सर खाने के बाद वे ऐसी ही बात छेड़ देते हैं। काम में मन नहीं लगता और वक्त बोझ लगने लगता है। जी में आता है कि लोहे की बड़ी-सी रॉड लेकर किसी फैशनेबुल कॉलोनी में निकल जाऊँ। डेविड साब तो साथ चलने पर तैयार हो जायेंगे। वह फिर बोलने लगते हैं और उनके प्रिय शब्द 'बिच`, 'क्रूक`, 'नॉनसेंस`, 'बंगलिंग`, 'पब्लिक ट्रायल`, 'एक्सप्लॉइटेशन`, 'क्लास स्ट्रगल` आदि बार-बार सुनायी पड़ते हैं। बीच-बीच में वह हिंदुस्तानी गालियां फर्राटे से बोलते हैं। 'अब क्या हो सकता है! पच्चीस साल तक प्रूफ़रीडरी के बाद अब और क्या कर सकता हूं। सन् १९४८ में दिल्ली आया था। अरे साब, डिफेंस कॉलोनी की ज़मीन तीन रुपये गज मेरे सामने बिकी है, जिसका दाम आज चार सौ रुपये है। निजामुद्दीन से ओखला तक जंगल था जंगल। कोई शरीफ़ आदमी रहने को तैयार ही नहीं होता था। अगर उस वक्त उतना पैसा नहीं था और आज. . .। सीनियर कैम्ब्रिज में तेरे साथ पॉटी पढ़ता था। अब अगर आप आज उसे देख लें तो मान ही नहीं सकते कि मैं उसका क्लासफेलो और दोस्त था। गोरा-चिट्टा रंग, ए-क्लास सेहत, एक जीप, एंबेसेडर और एक ट्रैक्टर है उसके पास। मिर्जापुर के पास फार्मिंग करवाता है। उस जमाने में दस रुपये बीघा ज़मीन खरीदी थी उसने। मुझसे बहुत कहा था कि तुम भी ले लो डेविड भाई, चार-पांच सौ बीघा। बिलकुल उसी के फार्म के सामने पांच सौ बीघे का प्लाट था। ए-क्लास फर्टाइल ज़मीन। लेकिन उस ज़माने में मैं कुछ और था।' वह खिसियानी हंसी हंसे, 'आज उसकी आमदनी तीन लाख रुपये साल है। अपनी डेयरी, अपना मुर्गीखाना-ठाठ हैं, सब ठाठ।' डेविड साहब खुश हो गये जैसे वह सब उन्हीं का हो। प्रूफ़ के पुलिंदे को उठाकर एक कोने में रखते हुए बोले, 'मेरी तो किस्मत में इन शानदार कमरे में मिसेज़ डिसूजा का किरायेदार होना लिखा था।' मिसेज़ डिसूजा को पचास रुपये दो, कमरा मिल जायेगा। पच्चीस रुपये और दो तो सुबह नाश्ता मिल जायेगा और तीस रुपये दो रात का खाना, जिसे मिसेज़ डिसूजा अंग्रेज़ी खाना कहती हैं, मिल जायेगा। मिसेज़ डिसूजा के कमरे से लगी तस्वीरों को, जो प्राय: उनकी जवानी के दिनों की हैं, किरायेदार हटा नहीं सकता। किसी तस्वीर में वह मोमबत्ती के सामने बैठी किताब पढ़ रही हैं, तो किसी में अपन बाल गोद में रखे शून्य में देखने का प्रयत्न कर रही हैं। कुछ लोगों का परिचय अंग्रेज़ अफ़सर के रूप में करवाती हैं, पर देखने में वे सब हिन्दुस्तानी लगते हैं। एक चित्र मिसेज़ डिसूजा की लड़की का भी है, जो डेविड साहब की मेज़ पर रखा रहता है। लड़की वास्तव में कंटाप है। छिनालपना उसके चेहरे से ऐसा टपकता है कि अगर सामने कोई बर्तन रख दे तो दिन में दसियों बार खाली करना पड़े। उसे सिर्फ देखकर अच्छे-अच्छे दोनों हाथों से दबा लेते होंगे। कुछ पड़ोस वालों का यह भी कहना है कि इसी तस्वीर को देख-देखकर डेविड साहब ने शादी करने और बच्चा पैदा करने की क्षमता से हाथ धो लिये हैं। मिसेज़ डिसूजा देसी ईसाइयों की कई लड़कियां उनके लिए खोज चुकी हैं। परंतु सब बेकार। वह तो ढाई सौ वोल्टेज ही के करंट से जल-भुनकर राख हो चुके थे और एक दिन तंग आकर मिसेज़ डिसूजा ने मोहल्ले में उनको नामर्द घोषित कर दिया और उनके सामने कपड़े बदलने लगीं। सुबह का दूसरा नाम होता है। जल्दी-जल्दी बिना दूध की चाय के कुछ कप। रात के धेये कपड़ों पर उलटा-सीधा प्रेस। जूते पर पॉलिश। और दिन-भर फ्रूफ़ करेक्ट करते रहने के लिए आंखों की मसाज। फ्रूफ़ के पुलिंदे। करेक्ट किये हुए और प्रेस से आये हुए। फिर करेक्ट किये हुए फिर आये हुए। धम्! साला ज़ोर से गाली दे मारता है, 'देख लो बाबू, जल्दी दे दो। बड़ा साहब कॉलम देखना मांगता है।' पूरी जिंद़गी घटिया किस्म के कागज पर छपा प्रूफ़ हो गयी है, जिसे हम लगातार करेक्ट कर रहे हैं। घर से बाहर निकलकर जल्दी-जल्दी बस स्टॉप की तरफ़ दौड़ना, जैसे किसी को पकड़ना हो, हम दोनों एक ही नंबर की बस पकड़ते हैं। रास्तें में डेविड साहब मुझसे रोज़ एक-सी बातें करते हैं, 'हरी सब्जियों से क्या फायदा है, किस सब्जी में कितना स्टार्च होता है। अंडे और मुर्गे खाते रहो तो अस्सी साल की उम्र में भी लड़का पैदा कर सकते हो।` बकरी और भैंस के गोश्त का सूक्ष्म अंतर उन्हें अच्छी तरह मालूम है। अंग्रेजी खाने के बारे में उनकी जानकारी अथाह है। केक में कितना मैदा होना चाहिए। कितने अंडे डाले जायें। मेवा और जेली को कैसे मिलाया जाये। दूध कितना फेंटा जाये। केक की सिकाई के बारे में उनकी अलग धरणाएं हैं। क्रीम लगाने और केक को सजाने के उनके पास सैकड़ों फार्मूले हैं जिन्हें अब हिंदुस्तान में कोई नहीं जानता। कभी-कभी कहते, 'ये साले धोती बांधने वाले, खाना खाना क्या जानें! ढेर सारी सब्जी ले ली, तेल में डाली और खा गये बस, खाना पकाना और खाना मुसलमान जानते हैं या अंग्रेज। अंग्रेज़ तो चले गये, साले मुसलमानों के पास अब भैंसे का गोश्त खा-खाकर अकल मोटी करने के सिवा कोई चारा नहीं है। भैंसे का गोश्त खाओ, भैंसे की तरह अकल मोटी हो जायेगी और फिर भैंसे की तरह ही कोल्हू में पिले रहो। रात घर आकर बीवी पर भैंसे की तरह पिल पड़ो।` आज फिर घूम-फिर कर वह अपने विषय पर आ गये। 'नाश्ता तो हैवी होना ही चाहिए।' मैंने हामी भरी। इस बात से कोई उल्लू का पट्ठा ही इनकार कर सकता है। 'हैवी और एनरजेटिक?' चलते-चलते वह अचानक रुक गये। एक नये बनते हुए मकान को देखकर बोले, 'किसी ब्लैक मार्किटियर का मालूम होता है। फिर उन्होंने अकड़कर जेब से चश्मा निकाला, आंखों पर फिट करके मकान की ओर देखा। फ़ायर हुआ ज़ोरदार धमाके के साथ, और सारा मकान अड़-अड़ धड़ाम करके गिर गया।' 'बस, एक गिलास दूध, चार-टोस्ट और मक्खन, पौरिज और दो अंडे।' उन्होंने एक लंबी सांस खींची, जैसे गुब्बारे में से हवा निकल गयी हो। 'नहीं, मैं आपसे एग्री नहीं करता, फ्रूट जूस बहुत ज़रूरी है। बिना. . .।' 'फ्रूट जूस?' वह बोले? 'नहीं अगर दूध हो तो उसकी ज़रूरत नहीं है।' 'पराठे और अंडे का नाश्ता कैसा रहेगा?' 'वैरी गुड, लेकिन परांठे हलके और नर्म हों।' 'और अगर नाश्ते में केक हो?' वह सपाट और फीकी हंसी हंसे। कई साल हुए। मेरे दिल्ली आने के आसपास। डेविड साहब ने अपनी बर्थ डे पर केक बनवाया था। पहले पूरा बजट तैयार कर लिया गया था। सब खर्च जोड़कर कुल सत्तर रुपये होते थे। पहली तारीख को डेविड साहब मैदा, शक्कर और मेवा लेने खारीबावली गये थे। सारा सामान घर में फिर से तौला गया था। फिर अच्छे बेकर का पता लगाया गया था। डेविड साहब के कई दोस्तों ने दरियागंज के एक बेकर की तारीफ़ की तो वह उससे एक दिन बात करने गये बिलकुल उसी तरह जैसे दो देशों के प्रधनमंत्री गंभीर समस्याओं पर बातचीत करते हैं। डेविड साहब ने उसके सामने एक ऐसा प्रश्न रख दिया किया वह लाजवाब हो गया, 'अगर तुमने सारा सामान केक में न डाला और कुछ बचा लिया तो मुझे कैसे पता चलेगा?` इस समस्या का समाधान भी उन्होंने खुद खोज लिया। कोई ऐसा आदमी मिले जो बेकर के पास उस समय तक बैठा रहे, जब तक कि केक बनकर तैयार न हो जाये। डेविड साहब को मिसेज़ डिसूजा ने इस काम के लिए अपने-आपको कई बार 'ऑफ़र` किया। मगर वास्तव में डेविड साहब को मिसेज़ डिसूजा पर भी एतबार नहीं था। हो सकता है बेकर और मिसेज़ डिसूजा मिलकर डेविड साहब को चोट दे दें। जब पूरी दिल्ली में 'मोतबिर` आदमी नहीं मिला तो डेविड साहब ने एक दिन की छुट्टी ली। मैंने इस काम में कोई रुचि नहीं दिखायी थी, इसलिए उन दिनों मुझसे नाराज़ थे और पीठ पीछे उन्होंने मिसेज़ डिसूजा से कई बार कहा कि जानता ही नहीं 'केक` क्या होता है। मैं जानता था कि 'केक` बन जाने के बाद किसी भी रात को खाने के बाद मुर्गी खाना खोलने वाली बात करके डेविड साहब को खुश किया जा सकता है या उनके दोस्त के बारे में बात करके उन्हें उत्साहित किया जा सकता है, जिसका मिर्जापुर के पास बड़ा फार्म है और वह वहां कैसे रहता है। केक बर्थ डे से एक दिन पहले आ गया था। अब उसे रखने की समस्या थी। मिसेज़ डिसूजा के घर में चूहे ज़रूरत से ज्यादा हैं। इस आड़े वक्त में मैंने उनकी मदद की। अपने टीन के बक्स में से कपड़े निकालकर तौलिये में लपेटकर मेज़ पर रख दिये और बक्स में केक रख दिया गया। मेरा बक्स पूरे एक महीने घिरा रहा। हम सबको उस केक के बारे में बातचीत कर लेना बहुत अच्छा लगता है। डेविड साहब तो उसे अपना सबसे बड़ा 'एचीवमेंट` मानते हैं। और मैं अपने बक्स को खाली कर देना कोई छोटा कारनामा नहीं समझता। उसके बाद से लेकर अब तक केक बनवाने के कई प्रोग्राम बन चुके हैं। अब डेविड साहब की शर्त यह होती है कि सब 'शेयर` करें। ज्यादा मूड में आते हैं तो आध खर्च उठाने पर तैयार हो जाते हैं। उन्हीं के अनुसार, बचपन से उन्हें दो चीज़ें पंसद रही हैं जॉली और केक। जॉली की शादी किसी कैप्टन से हो गयी, तो वह धीरे-धीरे उसे भूलते गये। पर केक अब भी पसंद है। केक के साथ कौन शादी कर सकता है? लेकिन खारी-बावली के कई चक्कर लगाने पर उन्होंने महसूस किया कि केक की भी शादी हो सकती है। फिर भी पसंद करना बंद न कर सके। दफ़्त़र से लौटकर आया तो सारा बदन इस तरह दर्द कर रहा था, जैसे बुरी तरह से मारा गया हो। बाहरी दरवाज़ा खोलने के लए मिसेज़ डिसूजा आयीं। वह शायद किचन में अपने खटोले पर सो रही थीं। अंदर आंगन में उनके गुप्त वस्त्र सूख रहे थे। 'गुप्त वस्त्र` शब्द सोचकर हंसी आयी। कोई अंग गुप्त ही कहां रह गया है! डी.टी.सी. की बसों में चढ़ते-उतरते गुप्त अंगों के भूगोल का अच्छा-खासा ज्ञान हो गया है। उनकी गरमाहट, चिकनाई, खुदरेपन, गंदेपन और लुभावनेपन के बारे में अच्छी जानकारी है। 'आज जल्दी चले आये।` मिसेज़ डिसूजा 'गुप्त वस्त्र` उतारने लगीं, 'चाय पीयोगे?` मैंने अभी तक नहीं पी है।` 'हां, जरूर।' सोचा अगर साली ने पी ली होती तो कभी न पूछती। कमरे के अंदर चला आया। पत्थर की छत के नीचे खाने की मेज़ है। जिसके एक पाये की जगह ईंटें लगी हैं। दूसरे पायों को टीन की पट्टियों से जकड़ कर कीलें ठोंक दी गयी हैं। रस्सी, टीन, लोहा, तार और ईंटों के सहारे खड़ी मेज़ पहली नज़र में आदिकालीन मशीन-सी लगती है। मेज़ के उपर मिसेज़ डिसूजा की सिलाई मशीन रखी है। खाना खाते समय मशीन को उठाकर मेज़ के नीचे रख दिया जाता है। खाने के बाद मशीन फिर मेज़ पर आ जाती है। रात में डेविड साहब इसी मेज पर बैठकर प्रूफ़ देखते हैं। कई गिलास पानी पीते हैं और एक बजते-बजते उठते हैं तो कमरा अकेला हो जाता है। मैं कमरे में रखी सिलाई मशीन या मेज़ की तरह कमरे का एक हिस्सा बन जाता हूं। 'ये लो टी, ग्रीनलेबुल है!' मिसेज़ डिसूजा ने चाय की प्याली थमा दी। वह खानों के नाम अंग्रेज़ी में लेती है। रोटी को ब्रेड कहती है, दाल को पता नहीं क्यों उन्होंने सूप कहना शुरू कर दिया है। तरकारी को 'बॉयल्ड वेजिटेबुल्स` कहती हैं। करेलों को 'हॉटडिश` कहती हैं। मिसेज़ डिसूजा थोड़ी बहुत गोराशाही अंग्रेज़ी भी बोल लेती हैं, जिससे मोहल्ले के लोग काफ़ी प्रभावित होते हैं। मैंने टी ताजमहल ले ली। मिसेज़ डिसूजा आज के जमाने की तुलना पहले जमाने से करने लगीं। उन्हें चालीस साल तक पुराने दाम याद हैं। इसके बाद अपने मकान की चर्चा उनका प्रिय विषय है, जिसका सीधा मतलब हम लोगों पर रोब डालना होता है। वैसे रोब, डालते वक्त यह भूल जाया करती हैं कि दोनों कमरे किराये पर उठा देने के बाद वह स्वयं किचन में सोती हैं। मैं उनकी बकवास से तंग आकर बाथरूम में चला गया। अगर डेविड साहब होते तो मजा आता। मिसेज़ डिसूजा मुंह खोलकर और आंखें फाड़कर मुर्गी-पालन की बारीकियों को समझने का प्रयत्न करतीं। ' याद नहीं, सिर्फ दो हज़ार रुपये से काम शुरू करे कोई। चार सौ मुर्गियों से शानदार काम चालू हो सकता है। चार सौ अंडे रोज़ का मतलब है कम-से-कम सौ रुपये रोज़। एक महीने में तीन हज़ार रुपये और एक साल में छत्तीस हज़ार रुपये। मैं तो आंटी, लाइफ में कभी-न-कभी ज़रूर करूंगा कारोबार। फायदा. . .? मैं कहता हूं चार साल में लखपति। फिर अंडे, मुर्गीखाने का आराम अलग। रोज़ एक मुर्गी काटिये साले को। बीस अंड़ों की पुडिंग बनाइए। तब यह मकान आप छोड़ दीजिएगा, आंटी। यह भी कोई आदमियों के रहने लायक मकान है। फिर तो महारानी बाग या बसंत विहार में कोठी बनवाइएगा। एक गाड़ी ले लीजिएगा।` तब थोड़ी देर के लिए वे दोनों 'बसंत विहार` पहुंच जाया करते। बड़ी-सी कोठी के फाटक की दाहिनी तरफ़ पीतल की चमचमाती हुई प्लेट पर एरिक डेविड और मिसेज़ जे. डिसूजा के अक्षर इस तरह चमकते जैसे छोटा-मोटा सूरज। मैं लौटकर आया तो डेविड साहब आ चुके थे। कपड़े बदलकर आंगन में बैठे वह बासु को थोक में गालियां दे रहे थे, 'यह साला बासु इस लायक है कि इसका 'पब्लिक ट्रायल` किया जाये।' उनकी आंखों में नफ़रत और उकताहट थी। चश्मा थोड़ा नीचे खिसक गया था। उन्होंने अपनी गर्दन अकड़ाकर चश्मा चेहरे पर फिट किया। मैंने तिलक ब्रिज के सामने एक पेड़ की बड़ी-सी डाल पर रस्से के सहारे बासु की लाश को झूलते हुए देखा। लहरें मारती भीड़-अथाह भीड़। और कुछ ही क्षण बाद डेविड साहब को एक नन्हें से मुर्गीखाने में बंद पाया। चारों ओर जालियां लगी हुई हैं। और उसके अंदर दो सौ मुर्गियों के साथ डेविड साहब दाना चुग रहे हैं। गर्दन डालकर पानी पी रहे हैं और अंडे दे रहे हैं। अंडों के एक ढेर पर बैठे हैं। मुर्गीखाने की जालियों से बाहर 'बसंत विहार` साफ दिखाई पड़ रहा है। मैंने कहा, 'आप क्यों परेशान हैं डेविड साहब? छोड़िए साली नौकरी को। एक मुर्गीखाना खोल लीजिए। फिर बसंत विहार में मकान।' 'नहीं-नहीं, मैं बसंत विहार में मकान नहीं बनवा कसता। वहां तो बासु का मकान बन रहा है। भाई साहब, यह तो दावा है कि इस देश में बगैर चार सौ बीसी किये कोई आदमी की तरह नहीं रह सकता। आदमियों की तरह रहने के लिए आपको ब्लैक मार्केर्टिंग करनी पड़ेगी लोगों को एक्सप्लायट करना पड़ेगा. . .अब आप सोचिए, मैं किसी साले से कम काम करता हूं। रोज़ आठ घंटे ड्यूटी और दो घंटे बस के इंतजार में. . .।' 'तुम बहुत गाली बकते हो,' मिसेज़ डिसूजा बोलीं। 'फिर क्या करूं आंटी? गाली न बकूं तो क्या ईशू से प्रार्थना करूं, जिसने कम-से-कम मेरे साथ बड़ा 'जोक` किया है?' 'छोड़िए यार डेविड साहब। कुछ और बात कीजिए। कहीं प्रूफ़ का काम ज्यादा तो नहीं मिला।' 'ठीक है, छोड़िए। दिल्ली में अभी तीन साल हुए हैं न! कुछ जवानी भी है। अभी शायद आपने दिल्ली की चमक-दमक भी नहीं देखी? क्या हमारा कुछ भी हिस्सा नहीं है उसमें? कनाट प्लेस में बहते हुए पैसे को देखा है कभी?' वह हाथ चला-चलाकर पैसे के बहास के बारे में बताने लगे, 'लाखों-करोड़ों रुपये लोग उड़ा रहे हैं। औरतों के जिस्मों पर से बहता पैसा। कारों की शक्ल में तैरता हुआ।' वह उत्तेजित हो गये, और उन्होंने जेब से चश्मा निकाला, गर्दन अकड़ायी और चश्मा आंखों पर फिट कर लिया। मुझे उकताहट होने लगी। तबीयत घबराने लगी, जैसे उमस एकदम बैठ गयी हो। सांस लेने में तकलीफ होने लगी। लोहे का सलाखोंदार कमरा मुर्गीखाना लगने लगा जिसमें सख्त बदबूभर गयी हो। मिसेज़ डिसूजा कई बार भविष्यवाणी कर चुकी हैं कि डेविड साहब एक दिन हम लोगों को एरेस्ट करवायेंगे और डेविड साहब कहते हैं कि मैं उस दिन का 'वेलकम` करूंगा। गुस्से में लगातार होंठ दबाये रहने के कारण उनका निचला होंठ काफी मोटा हो गया है। चेहरे पर तीन लकीरें पड़ जाती हैं। बचपन में सुना करते थे कि माथे पर तीन लकीरें पड़ने वाला राजा होता है। कुछ ही देर में वह काफ़ी शांत हो चुके थे। खाने की मेज़ पर उन्होंने 'बासु की जय` पर नारा लगाया और दो गिलास पानी पी गये। मिसेज़ डिसूजा की 'हॉटडिश`, 'सूप` और 'ब्रेड` तैयार थी। 'करेले की सब्जी पकाना भी आर्ट है, साब!' डेविड साहब ने जोर-जोर से मुंह चलाया। 'तीन डिश के बराबर एक डिश है।' मिसेज़ डिसूजा ने एहसान लादा। डेविड उनकी बात अनसुनी करते हुए बोले, 'करेले खाने का मज़ा तो सीतापुर में आता था आंटी। कोठी के पीछे किचन गार्डन में डैडी तरह-तरह की सब्जी बुआते थे। ढेर सारी प्याज के साथ इन केरेलों में अगर कीमा भरकर पकाया जाये तो क्या कहना!' हम लोग समझ गये कि अब डेविड साहब बचपन के किस्से सुनायेंगे। इन किस्सों के बीच नसीबन गवर्नेस का ज़िक्र भी आयेगा जो केवल एक रुपया महीना तनख्व़ाह पाकर भी कितनी प्रसन्न रहा करती थी। और जिसका मुख्य काम डेविड बाबा की देखभाल को दीपक बाबा ही कहती रही। इसी सिलसिले में उस पिकनिक पार्टी का जिक्र आयेगा जिसमें डेविड बाबा ने जमुना के स्लोप पर गाड़ी चढ़ा दी थी। तजुर्बेकार ड्राइवर इस्माइल खां को पसीना छूट आया था। खां को डांटकर गाड़ी से उतार दिया था। सब लड़के और लड़कियां उतर गये। अंग्रेज़ लड़के की हिम्मत छूट गयी थी। परंतु जॉली ने उतरने से इंकार कर दिया था। डेविड बाबा ने गाड़ी स्टार्ट की। दो मिनट सोचा। गियर बदलकर एक्सीलेटर पर दबाव डाला और गाड़ी एक फर्राटे के साथ उपर चढ़ गयी। इस्माइल खां ने उपर आकर डेविड बाबा के हाथ चूम लिये थे। वह बड़े-बड़े अंग्रेज़ अफ़सरों को गाड़ी चलाते देख चुका था मगर डेविड बाबा ने कमाल ही कर दिया था। जॉली ने डेविड बाबा को उसी दिन 'किस` देने का प्रामिस किया था। इन बातों को सुनाते समय डेविड साहब की बिटरनेस गायब हो जाती है। वह डेविड साहब नहीं, दीपक बाबा लगते हैं। हलकी-सी धूल उड़ती है और सीतापुर की सिविल लाइंस पर बनी बड़ी-सी कोठी के फाटक में १९३० की फोर्ड मुड़ जाती है। फाटक के एक खंभे पर साफ अक्षरों में लिखा हुआ है पीटर जे. डेविड, डिप्टी कलेक्टर। कोठी की छत खपरैलों की बनी हुई है। कोठी के चारों ओर कई बीघे का कंपाउंड। पीछे आम और संतरे का बाग। दाहिनी तरफ़ टेनिस कोर्ट की बायीं तऱफ बड़ा-सा किचन गार्डन, कोठी के उंचे बरामदे में बावर्दी चपरासी उंघता हुआ दिखाई पड़ेगा। अंदर हाल में विक्टोरियन फ़र्नीचर और छत पर लटकता हुआ हाथ से खींचने वाला पंखा। दोपहर में पंखा-कुली पंखा खींचते-खींचते उंघ जाता है तो मिस्टर पीटर जे.डेविड डिप्टी कलेक्टर अपने विलायती जूतों की ठोकरों से उसके काले बदन पर नीले रंग के फल उगा देते हैं। बाबा लोग टाई बांधकर खाने की मेज़ पर बैठकर चिकन सूप पीते हैं। खाना खाने के बाद आइसक्रीम खाते हैं और मम्मी-डैडी को गुडनाइट कहकर अपने कमरे में चले जाते हैं। साढ़े नौ बजे के आस-पास १९३० की फोर्ड गाड़ी फिर स्टार्ट होती है। अब वह या तो क्लब चली जाती है या किसी देशी रईस की कोठी के अंदर घुसकर आधी रात को डगमगाती हुई लौटती है। मिसेज़ डिसूजा के मकान की छत के उपर से दिल्ली की रोशनियां दिखाई पड़ती हैं। सैकड़ों जंगली जानवरों की आंखें रात में चमक उठती है। पानी पीने के लिए नीचे आता हूं तो डेविड साहब प्रूफ़ पढ़ रहे हैं। मुझे देखकर मुस्कराते हैं, कलम बंद कर देते हैं और बैठने के लिए कहते हैं। आंखों में नींद भरी हुई है। वह मुझे धीरे-धीरे समझाते हैं। उनके इस समझाने से मैं तंग आ गया हूं। शुरू-शुरू में तो मैं उनको उल्लू का पट्ठा समझता था, परंतु बाद में पता नहीं क्यों उनकी बातें मेरे उपर असर करने लगीं। 'भाग जाओ इस शहर से। जितनी जल्दी हो सके, भाग जाओ। मैं भी तुम्हारी तरह कॉलेज से निकलकर सीधे इस शहर में आ गया था राजधनी जीतने। लेकिन देख रहे हो, कुछ नहीं है इस शहर में, कुछ नहीं। मेरी बात छोड़ दो। मैं कहां चला जाउं! गांड़ के रास्ते यह शहर मेरे अंदर घुस चुका है।' 'लेकिन कब तक कुछ नहीं होगा, डेविड साहब?' 'उस वक्त तक, जब तक तुम्हारे पास देने के लिए कुछ नहीं है। और मैं जानता हूं, तुम्हारे पास वह सब कुछ नहीं है जो लोगों को दिया जा सकता है।' मैं लौटकर उपर आ जाता हूं। मेरे पास क्या है देने के लिए? उंची कुर्सियां, कॉकटेल पार्टियां, लंबे-चौड़े लान, अंग्रेज़ी में अभिवादन, सूट और टाइयां, लड़कियां, मोटरें, शॉपिंग! तब ये लोग, जो तंग गलियारों में मुझसे वायदे करते हैं, मुस्कुराते हैं, कौन हैं? इसके बारे में फिर सोचना पड़ेगा। और काफ़ी देर तक फिर मैं सोचने का साहस जुटाता हूं। परंतु वह पीछे हटता जाता है। मैं उसकी बांहें पकड़कर आगे घसीटता हूं। एक बिगड़े हुए खच्चर की तरह वह अपनी रस्सी तुड़ाकर भाग निकलता है। मैं फिर पानी के लिए नीचे उतरता हूं। अपनी मेज़ पर सिर रखे वह सो रहे हैं। प्रूफ़ का पुलिंदा सामने पड़ा है। मैं उसका कंधा पकड़कर लगा देता हूं। 'अब सो जाइए। कल आपको साइट देखने जाना है।` उनके चेहरे पर मुस्कराहट आती है। कल वह मुर्गीखाना खोलने की साइट देखने जा रहे हैं। इससे पहले भी हम लोग कई साइट देख चुके हैं। डेविड साहब उठकर पानी पीते हैं। फिर अपने पलंग पर इस तरह गिर पड़ते हैं जैसे राजधनी के पैरों पर पड़ गये हों। मैं फिर उपर आकर लेट जाता हूं। 'मैंने कॉलेज में इतना पढ़ा ही क्यों? इतना और उतना की बात नहीं है, मुझे कॉलेज में पढ़ना ही नहीं चाहिए था और अब दो साल तक ढाई सौ रुपये की नौकरी करते हुए क्या किया जा सकता है? क्यों मुस्कराता और क्यों शांत रहा? दो साल से दोपहर का खाना गोल करते रहने के पीछे क्या था?` नीचे से भैंस के हगने की आवाज़ आती है। एक परिचित गंध फैल जाती है। उस अर्द्धपरिचित कस्बे की गंध, जिसे मैं अपना घर समझता हूं, जहां मुझे बहुत ही कम लोग जानते हैं। उस छोटे से स्टेशन पर यदि मैं उतरूं तो गाड़ी चली जाने के बाद कई लोग मुझे घूर कर देखेंगे। और इक्का-दुक्का इक्के वाले भी मुझसे बात करते डरेंगे। उनका डर दूर करने के लिए मुझे अपना परिचय देना पड़ेगा। अर्थात अपने पिता का परिचय देना पड़ेगा। तब उनके चेहरे पर मुस्कराहट आयेगी और वे मुझे इक्के पर बैठने के लिए कहेंगे। इस मिनट इक्का चलता रहेगा तो सारी बस्ती समाप्त हो जायेगी। उस पार खेत हैं जिनका सीधा मतलब है उस पर गरीबी है। वे गरीबी के अभ्यस्त हैं। पुलिस उनके लिए सर्वशक्तिमान है और अपनी हर होशियारी में वे काफी मूर्ख हैं. . .उपर आसमान में पालम की ओर जाने वाले हवाई जहाज की संयत आवाज सुनाई पड़ती है। नीचे सड़क पार बालू वाले ट्रक गुजर रहे हैं। लदी हुई बालू के उपर मजदूर सो रहे हैं, जो कभी-कभी किसान बन जाने का स्वप्न देख लेते हैं, अपने गांव की बात करते हैं, अपने खेतों की बात करते हैं, जो कभी उनके थे। ट्रक तेजी से चलता हुआ ओखला मोड़ से मथुरा रोड पर मुड़ जायेगा। फ्रेंड्स कालोनी और आश्रम होता हुआ 'राजदूत` होटल के सामने से गुजरेगा जहां रात-भर कैबरे और रेस्तरां के विज्ञापन नियॉनलाइट में जलते बुझते रहते हैं। उसी के सामने फुटपाथ पर बहुत से दुबले-पतले, काले और सूखे आदमी सोते हुए मिलेंगे, जिनकी नींद ट्रक की कर्कश आवाज़ से भी नहीं खुलती। उपर तेज बल्ब की रोशनी में उनके अंग-प्रत्यंग बिखरे दिखाई पड़ते हैं। मैं अक्सर हैरान रहता हूं कि वे इस चौड़े फुटपाथ पर छत क्यों नहीं डाल लेते। उसके चारों ओर, कच्ची ही सही, दीवार तो उठाई जा सकती है। इन सब बातों पर सरसरी निगाह डाली जाये, जैसी कि हमारी आदत है, तो इनका कोई महत्व नहीं है। बेवकूफी और भावुकता से भरी बातें। परंतु यदि कोई उपर से कीड़े की तरह फुटपाथ पर टपक पड़े तो उसका समझ में सब कुछ आ जायेगा। दिन इस तरह गुजरते हैं जैसे कोई लंगड़ा आदमी चलता है। अब इस महानगरी में अपने बहुत साधरण और असहाय होने का भाव सब कुछ करवा लेता है। और अपमान, जो इस महानगर में लोग तफरीहन कर देते हैं, अब उतने बुरे नहीं लगते, जितने पहले लगते थे। ऑफिस में अधिकारी की मेज़ पर तिवारी का सुअर की तरह गंदा मुंह, जो एक ही समय में पक्का समाजवादी भी है और प्रो-अमरीकन भी। उसकी तंग बुशर्ट में से झांकता हुआ हराम की कमाई का पला तंदुरुस्त जिस्म और उसकी समाजवादी लेखनी जो हर दूसरी पंक्ति केवल इसलिए काट देती है कि वह दूसरे की लिखी हुई है। उसका रोब-दाब, गंभीर हंसी, षड्यंत्र-भरी मुस्कान और उसकी मेज़ के सामने उसके साम्राज्य में बैठे हुए चार निरीह प्राणी, जो कलम घिसने के अलावा और कुछ नहीं जानते। उन लोगों के चेहरे के टाइपराइटरों की खड़खड़ाहट। इन सब चीज़ों को मुट्ठी में दबाकर 'क्रश` कर देने को जी चाहता है। भूख भी कमबख्त लगती है तो इस जैसे सोरे शहर का खाना खाकर ही खत्म होगी। शुरू में पेट गड़गड़ाता है। यदि डेविड साहब होते तो बात यहीं ये झटक लेते, 'जी, नहीं, भूख जब ज़ोर से लगती है तो ऐसा लगता है जैसे बिल्लियां लड़ रही हों। फिर पेट में हलका-सा दर्द शुरू होता है जो शुरू में मीठा लगता है। फिर दर्द तेज़ हो जाता है। उस समय यदि आप तीन-चार गिलास पानी पी लें तो पेट कुछ समय के लिए शांत हो जायेगा और आप दो-एक घंटा कोई भी काम कर सकते हैं। इतना सब कुछ कहने के बाद वह अवश्य सलाह देंगे कि इस महानगरी में भूखो...