साहित्य गंगा

पंडित नरेन्द्र शर्मा

परिचय जन्म :28 फ़रवरी, 1913 मृत्यु : 11 फरवरी, 1989 जन्म स्थान : गांव जहांगीरपुर, परगना ज़ेवर, तहसील खुर्जा ,जिला- बुलंदशहर (उत्तरप्रदेश) नरेन्द्र शर्मा का जन्म 28 फ़रवरी, 1913 ई. में गांव जहांगीरपुर, परगना ज़ेवर, तहसील खुर्जा ,जिला- बुलंदशहर (उत्तरप्रदेश) में हुआ था। 1931 ई. में इनकी पहली कविता 'चांद' में छपी। शीघ्र ही जागरूक, अध्ययनशील और भावुक कवि नरेन्द्र ने उदीयमान नए कवियों में अपना प्रमुख स्थान बना लिया। लोकप्रियता में इनका मुकाबला हरिवंशराय बच्चन से ही हो सकता था। प्रमुख कृतियाँ:प्रवासी के गीत, मिट्टी और फूल, अग्निशस्य, प्यासा निर्झर, मुठ्ठी बंद रहस्य (कविता-संग्रह) मनोकामिनी, द्रौपदी, उत्तरजय सुवर्णा (प्रबंध काव्य) आधुनिक कवि, लाल निशान (काव्य-संयचन) ज्वाला-परचूनी (कहानी-संग्रह, 1942 में 'कड़वी-मीठी बात' नाम से प्रकाशित) मोहनदास कर्मचंद गांधी:एक प्रेरक जीवनी, सांस्कृतिक संक्राति और संभावना (भाषण)। लगभग 55 फ़िल्मों में 650 गीत एवं 'महाभारत' का पटकथा-लेखन और गीत-रचना। विशेष  नरेन्द्र शर्मा का जन्म 28 फ़रवरी, 1913 ई.पटवारी पूरन लाल मोहन लाल शर्मा के घर में हुआ में गांव जहांगीरपुर, परगना ज़ेवर, तहसील खुर्जा ,जिला- बुलंदशहर (उत्तरप्रदेश) में हुआ था।उनकी माता का नाम गंगा देवी था और पति की मृत्यु के बाद शर्माजी के लालन-पालन में मुख्य भूमिका उनकी और उनके जेठ की ही रही।  उनकी आरंभिक शिक्षा एन आर सी कॉलेज, खुर्जा में हुई जहां आकाशवाणी के महानिदेशक और नाटककार जगदीशचंद्र माथुर के पिता प्रिंसिपल थे। उच्च शिक्षा के लिए वे इलाहाबाद गए। शीघ्र ही जागरूक, अध्ययनशील और भावुक कवि नरेन्द्र ने उदीयमान नए कवियों में अपना प्रमुख स्थान बना लिया। लोकप्रियता में इनका मुकाबला हरिवंशराय बच्चन से ही हो सकता था। 1931 ई. में इनकी पहली कविता 'चांद' में छपी और 1933 ई. में इनकी पहली कहानी प्रयाग के 'दैनिक भारत' में प्रकाशित हुई। 1934 ई. में इन्होंने मैथिलीशरण गुप्त की काव्यकृति 'यशोधरा' की समीक्षा भी लिखी।1936 में उन्होंने अंग्रेजी में एम ए किया। इलाहाबाद उन दिनों देश की सांस्कृतिक राजधानी थी और छायावाद की बृहद् चतुष्टयी में से तीन महाकवि—सुमित्रा नंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और महादेवी वर्मा वहीं निवास करते थे। इन लोगों के अलावा उनकी मुलाकात हरिवंश राय बच्चन और रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी जैसी बड़ी हस्तियों से हुई और अपने समवयस्कों शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, वीरेश्वर सिंह आदि से उनकी मैत्री हुई जो जीवन-भर कायम रही। सन्‌ 1938 ई. में कविवर सुमित्रानंदन पंत ने कुंवर सुरेश सिंह के आर्थिक सहयोग से नए सामाजिक-राजनीतिक, आर्थिक स्पंदनों से युक्त 'रूपाभ' नामक पत्र के संपादन करने का निर्णय लिया। इसके संपादन में सहयोग दिया नरेन्द्र शर्मा ने। भारतीय संस्कृति के प्रमुख ग्रंथ 'रामायण' और 'महाभारत' इनके प्रिय ग्रंथ थे। महाभारत में रुचि होने के कारण ये 'महाभारत' धारावाहिक के निर्माता बी.आर. चोपड़ा के अंतरंग बन गए। इसलिए जब उन्होंने 'महाभारत' धारावाहिक का निर्माण प्रारंभ किया तो नरेन्द्रजी उनके परामर्शदाता बने। उनके जीवन की अंतिम रचना भी 'महाभारत' का यह दोहा ही है : "शंखनाद ने कर दिया, समारोह का अंत, अंत यही ले जाएगा, कुरुक्षेत्र पर्यन्त" । 11 फरवरी, 1989 ई. को ह्‌दय-गति रुक जाने से उनका देहावसान होगया। लगभग 55 फ़िल्मों में 650 गीत एवं 'महाभारत' का पटकथा-लेखन और गीत-रचना। शर्मा जी के कुछ गीत प्रस्तुत हैं   युग की सँध्या युग की सँध्या कृषक वधू सी किस का पँथ निहार रही ? उलझी हुई समस्याओँ की बिखरी लटेँ सँवार रही ... युग की सँध्या कृषक वधू सी .... धूलि धूसरित, अस्त ~ व्यस्त वस्त्रोँ की, शोभा मन मोहे, माथे पर रक्ताभ चँद्रमा की सुहाग बिँदिया सोहे, उचक उचक, ऊँची कोटी का नया सिँगार उतार रही उलझी हुई समस्याओँ की बिखरी लटेँ सँवार रही युग की सँध्या कृषक वधू सी किस का पँथ निहार रही ? रँभा रहा है बछडा, बाहर के आँगन मेँ, गूँज रही अनुगूँज, दुख की, युग की सँध्या के मन मेँ, जँगल से आती, सुमँगला धेनू, सुर पुकार रही .. उलझी हुई समस्याओँ की बिखरी लटेँ सँवार रही युग की सँध्या कृषक वधू सी किस का पँथ निहार रही ? जाने कब आयेगा मालिक, मनोभूमि का हलवाहा ? कब आयेगा युग प्रभात ? जिसको सँध्या ने चाहा ? सूनी छाया, पथ पर सँध्या, लोचन तारक बाल रही ... उलझी हुई समस्याओँ की बिखरी लटेँ सँवार रही युग की सँध्या कृषक वधू सी किस का पँथ निहार रही ?   गंगा, बहती हो क्यूँ   विस्तार है अपार.. प्रजा दोनो पार.. करे हाहाकार... निशब्द सदा ,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ? नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई, निर्लज्ज भाव से , बहती हो क्यूँ ? इतिहास की पुकार, करे हुंकार, ओ गंगा की धार, निर्बल जन को, सबल संग्रामी, गमग्रोग्रामी,बनाती नहीँ हो क्यूँ ? विस्तार है अपार ..प्रजा दोनो पार..करे हाहाकार ... निशब्द सदा ,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ? नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई, निर्ल्लज्ज भाव से , बहती हो क्यूँ ? इतिहास की पुकार, करे हुंकार गंगा की धार, निर्बल जन को, सबल संग्रामी, गमग्रोग्रामी,बनाती नहीं हो क्यूँ ? इतिहास की पुकार, करे हुंकार,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ? अनपढ जन, अक्षरहीन, अनगिन जन, अज्ञ विहिन नेत्र विहिन दिक` मौन हो क्यूँ ? व्यक्ति रहे , व्यक्ति केन्द्रित, सकल समाज, व्यक्तित्व रहित,निष्प्राण समाज को तोड़ती न क्यूँ ? ओ गंगा की धार, निर्बल जन को, सबल संग्रामी, गमग्रोग्रामी,बनाती नहीं हो क्यूँ ? विस्तार है अपार ..प्रजा दोनो पार..करे हाहाकार ... निशब्द सदा ,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ? अनपढ जन, अक्षरहीन, अनगिनजन, अज्ञ विहिननेत्र विहिन दिक` मौन हो कयूँ ? व्यक्ति रहे , व्यक्ति केन्द्रित, सकल समाज, व्यक्तित्व रहित,निष्प्राण समाज को तोडती न क्यूँ ? विस्तार है अपार.. प्रजा दोनो पार.. करे हाहाकार... निशब्द सदा ,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ?   आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे ?   ज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? आज से दो प्रेम योगी, अब वियोगी ही रहेंगे! आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? सत्य हो यदि, कल्प की भी कल्पना कर, धीर बांधूँ, किन्तु कैसे व्यर्थ की आशा लिये, यह योग साधूँ! जानता हूँ, अब न हम तुम मिल सकेंगे! आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? आयेगा मधुमास फिर भी, आयेगी श्यामल घटा घिर, आँख भर कर देख लो अब, मैं न आऊँगा कभी फिर! प्राण तन से बिछुड़ कर कैसे रहेंगे! आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? अब न रोना, व्यर्थ होगा, हर घड़ी आँसू बहाना, आज से अपने वियोगी, हृदय को हँसना सिखाना, अब न हँसने के लिये, हम तुम मिलेंगे! आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? आज से हम तुम गिनेंगे एक ही नभ के सितारे दूर होंगे पर सदा को, ज्यों नदी के दो किनारे सिन्धुतट पर भी न दो जो मिल सकेंगे! आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? तट नदी के, भग्न उर के, दो विभागों के सदृश हैं, चीर जिनको, विश्व की गति बह रही है, वे विवश है! आज अथइति पर न पथ में, मिल सकेंगे! आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? यदि मुझे उस पार का भी मिलन का विश्वास होता, सच कहूँगा, न मैं असहाय या निरुपाय होता, किन्तु क्या अब स्वप्न में भी मिल सकेंगे? आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? आज तक हुआ सच स्वप्न, जिसने स्वप्न देखा? कल्पना के मृदुल कर से मिटी किसकी भाग्यरेखा? अब कहाँ सम्भव कि हम फिर मिल सकेंगे! आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? आह! अन्तिम रात वह, बैठी रहीं तुम पास मेरे, शीश कांधे पर धरे, घन कुन्तलों से गात घेरे, क्षीण स्वर में कहा था, "अब कब मिलेंगे?" आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? "कब मिलेंगे", पूछ्ता मैं, विश्व से जब विरह कातर, "कब मिलेंगे", गूँजते प्रतिध्वनिनिनादित व्योम सागर, "कब मिलेंगे", प्रश्न उत्तर "कब मिलेंगे"! आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? सूरज डूब गया बल्ली भर   सूरज डूब गया बल्ली भर- सागर के अथाह जल में। एक बाँस भर उठ आया है- चांद, ताड के जंगल में। अगणित उंगली खोल, ताड के पत्र, चांदनी में डोले, ऐसा लगा, ताड का जंगल सोया रजत-छत्र खोले कौन कहे, मन कहाँ-कहाँ हो आया, आज एक पल में। बनता मन का मुकुर इंदु, जो मौन गगन में ही रहता, बनता मन का मुकुर सिंधु, जो गरज-गरज कर कुछ कहता, शशि बनकर मन चढा गगन पर, रवि बन छिपा सिंधु तल में। परिक्रमा कर रहा किसी की, मन बन चांद और सूरज, सिंधु किसी का हृदय-दोल है, देह किसी की है भू-रज मन को खेल खिलाता कोई, निशि दिन के छाया-छल में। ज्योति कलश छलके   ज्योति कलश छलके - ४ हुए गुलाबी, लाल सुनहरे रंग दल बादल के ज्योति कलश छलके घर आंगन वन उपवन उपवन करती ज्योति अमृत के सींचन मंगल घट ढल के - २ ज्योति कलश छलके पात पात बिरवा हरियाला धरती का मुख हुआ उजाला सच सपने कल के - २ ज्योति कलश छलके ऊषा ने आँचल फैलाया फैली सुख की शीतल छाया नीचे आँचल के - २ ज्योति कलश छलके ज्योति यशोदा धरती मैय्या नील गगन गोपाल कन्हैय्या श्यामल छवि झलके - २ ज्योति कलश छलके अम्बर कुमकुम कण बरसाये फूल पँखुड़ियों पर मुस्काये बिन्दु तुहिन जल के - २ ज्योति कलश छलके   मेरे गीत बड़े हरियाले, मैने अपने गीत, सघन वन अन्तराल से खोज निकाले मैँने इन्हे जलधि मे खोजा, जहाँ द्रवित होता फिरोज़ा मन का मधु वितरित करने को, गीत बने मरकत के प्याले ! कनक-वेनु, नभ नील रागिनी, बनी रही वंशी सुहागिनी सात रंध्र की सीढ़ी पर चढ़, गीत बने हारिल मतवाले ! देवदारु की हरित-शिखर पर अन्तिम नीड़ बनायेँगे स्वर, शुभ्र हिमालय की छाया मेँ, लय हो जायेँगे, लय वाले ! लौ लगाती गीत गाती लौ लगाती गीत गाती, दीप हूँ मैं, प्रीत बाती नयनों की कामना, प्राणों की भावना पूजा की ज्योति बन कर, चरणों में मुस्कुराती आशा की पाँखुरी, श्वासों की बाँसुरी, थाली ह्र्दय की ले, नित आरती सजाती कुमकुम प्रसाद है, प्रभु धन्यवाद है हर घर में हर सुहागन, मंगल रहे मनाती चलो हम दोनों चलें वहां   रे जंगल के बीचो बीच, न कोई आया गया जहां, चलो हम दोनों चलें वहां। जहां दिन भर महुआ पर झूल, रात को चू पड़ते हैं फूल, बांस के झुरमुट में चुपचाप, जहां सोये नदियों के कूल; हरे जंगल के बीचो बीच, न कोई आया गया जहां, चलो हम दोनों चलें वहां। विहंग मृग का ही जहां निवास, जहां अपने धरती आकाश, प्रकृति का हो हर कोई दास, न हो पर इसका कुछ आभास, खरे जंगल के के बीचो बीच, न कोई आया गया जहां, चलो हम दोनों चलें वहां। नैना दीवाने एक नहीं माने   हुए है पराये मन हार आये मन का मरम जाने ना माने ना माने ना नैना दीवाने जाना ना जाना मन ही ना जाना चितवन का मन बनता निशाना कैसा निशाना कैसा निशाना , मन ही पहचाने ना, माने ना माने ना नैना दीवाने जीवन बेली करे अठखेली महके मन के बकुल प्रीति फूल फूले झूला झूले, चहके बन बुलबुल, महके मन के बकुल मन क्या जाने, क्या होगा कल धार समय की बहती पलपल, जीवन चँचल जीवन चँचल, दिन जाके फिर आने ना माने ना माने ना नैना दीवाने मधु के दिन मेरे गए बीत!   मैँने भी मधु के गीत रचे, मेरे मन की मधुशाला मेँ यदि होँ मेरे कुछ गीत बचे, तो उन गीतोँ के कारण ही, कुछ और निभा ले प्रीत-रीत! मधु के दिन मेरे गए बीत!(२) मधु कहाँ, यहाँ गंगा-जल है! प्रभु के चरणोँ मे रखने को, जीवन का पका हुआ फल है! मन हार चुका मधुसदन को, मैँ भूल चुका मधु-भरे गीत! मधु के दिन मेरे गए बीत!(२) वह गुपचुप प्रेम-भरीँ बातेँ,(२) यह मुरझाया मन भूल चुका वन-कुंजोँ की गुंजित रातेँ (२) मधु-कलषोँ के छलकाने की हो गई , मधुर-बेला व्यतीत! मधु के दिन मेरे गए बीत!(२) गाँव की धरती मकीले पीले रंगों में अब डूब रही होगी धरती, खेतों खेतों फूली होगी सरसों, हँसती होगी धरती! पंचमी आज, ढलते जाड़ों की इस ढलती दोपहरी में जंगल में नहा, ओढ़नी पीली सुखा रही होगी धरती! इसके खेतों में खिलती हैं सींगरी, तरा, गाजर, कसूम; किससे कम है यह, पली धूल में सोनाधूल-भरी धरती! शहरों की बहू-बेटियाँ हैं सोने के तारों से पीली, सोने के गहनों में पीली, यह सरसों से पीली धरती! सिर धरे कलेऊ की रोटी, ले कर में मट्ठा की मटकी, घर से जंगल की ओर चली होगी बटिया पर पग धरती! कर काम खेत में स्वस्थ हुई होगी तलाब में उतर, नहा, दे न्यार बैल को, फेर हाथ, कर प्यार, बनी माता धरती! पक रही फसल, लद रहे चना से बूँट, पड़ी है हरी मटर, तीमन को साग और पौहों को हरा, भरी-पूरी धरती! हो रही साँझ, आ रहे ढोर, हैं रँभा रहीं गायें-भैंसें; जंगल से घर को लौट रही गोधूली बेला में धरती! जय जयति भारत भारती   य जयति भारत भारती! अकलंक श्वेत सरोज पर वह ज्योति देह विराजती! नभ नील वीणा स्वरमयी रविचंद्र दो ज्योतिर्कलश है गूँज गंगा ज्ञान की अनुगूँज में शाश्वत सुयश हर बार हर झंकार में आलोक नृत्य निखारती जय जयति भारत भारती! हो देश की भू उर्वरा हर शब्द ज्योतिर्कण बने वरदान दो माँ भारती जो अग्नि भी चंदन बने शत नयन दीपक बाल भारत भूमि करती आरती जय जयति भारत भारती! पनिहारिन तलसोत अतल कूप आठ बाँस गहरा मन पर है राजा के प्यादे का पहरा कच्चाघट शीश धरे पनिहारिन आई कते हुए धागे की जेवरी बनाई घट भर कर चली, धूप रूप से लजाती हंसपदी चली हंस किंकणी बजाती मन ही मन गाती वह जीवन का दुखड़ा भरा हृदय भरे नयन कुम्हलाया मुखड़ा घट-सा ही भरा भरा जी है दुख दूना लिपा पुता घर आँगन प्रियतम बिन सूना काठ की घड़ौंची पर ज्यों ही घट धरती देवों की प्यास ऋक्ष देश से उतरती साँझ हुई आले पर दीप शिखा नाची बार-बार पढ़ी हुई पाती फिर बाँची घुमड़ रहे भाव और उमड़ रहा मानस गहराई और पास दूर दूर मावस जहाँ गई अश्रुसिक्त दृष्टि तिमिर गहरा हा हताश प्राणों पर देवों का पहरा अतलसोत अतल कूप आठ बांस गहरा मन पर है राजा के प्यादे का पहरा कहानी कहते कहते मुझे कहानी कहते कहते - माँ तुम क्यों सो गईं? जिसकी कथा कही क्या उसके सपने में खो गईं? मैं भरता ही रहा हुंकारा, पर तुम मूक हो गईं सहसा जाग उठा है भाव हृदय में, किसी अजाने भय विस्मय-सा मन में अदभत उत्कंठा का - बीज न क्यों बो गईं? माँ तुम क्यों सो गईं? बीते दिन का स्वप्न तुम्हारा, किस भविष्य की बना पहेली रही अबूझी बात बुद्धि को रातों जाग कल्पना खेली फिर आईं या नहीं सात - बहनें बन में जो गईं? माँ तुम क्यों सो गईं? पीले रंग के जादूगर ने कैसी काली वेणु बजाई बेर बीनती सतबहना को फिर न कहीं कुछ दिया दिखाई क्यों उनकी आँखें, ज्यों मेरी - गगनलीन हो गईं? माँ तुम क्यों सो गईं? फिर क्या हुआ सोचता हूँ मैं, क्या अविदित वह शेष कथा है जीव जगे भव माता सोए, मन में कुछ अशेष व्यथा है बेध सुई से प्रश्न फूल मन - माला में पो गईं! माँ तुम क्यों सो गईं?

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