परिचय
जन्म : 1900, चुनार, मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)
भाषा : हिंदी
विधाएँ : कहानी, कविता, उपन्यास, निबंध, आत्मकथा, आलोचना, नाटक
मुख्य कृतियाँ
उपन्यास : चंद हसीनों के खतूत, दिल्ली का दलाल, बुधुवा की बेटी, शराबी, घंटा, सरकार तुम्हारी आँखों में, कढ़ी में कोयला, जीजीजी, फागुन के दिन चार, जूहू
नाटक : महात्मा ईसा, चुंबन, गंगा का बेटा, आवास, अन्नदाता माधव महाराज महान कहानी : उग्र की श्रेष्ठ कहानियाँ कविता : ध्रुवचरित आलोचना : तुलसीदास आदि अनेक आलोचनात्मक निबंध आत्मकथा : अपनी खबर अन्य : गालिब : उग्र, उग्र का परिशिष्ट (संपादक : भवदेव पांडेय) संपादन : भूत, उग्र (मासिक पत्रिका), मतवाला, संग्राम, हिंदी पंच, वीणा, विक्रम आदि कई पत्रिकाओं के संपादन से समय-समय पर जुड़े रहे, स्वदेश (दशहरा अंक का संपादन)
निधन : 1967, दिल्ली
रचनाएँ कहानियाँ
- ईश्वरद्रोही
- उरूज
- एक भीषण स्मृति
- कर्तव्य और प्रेम
- खुदाराम
- जल्लाद
- डाँवाडोल
- तीन कलाकारों की एक भूल
- देश-द्रोह
- दहीबड़े
- नौकर सा’ब
| - पतित
- प्यारे
- पिशाची
- बदमाश
- भ्रम
- मुक्ता
- मूर्खा
- रधिया नौची
- रेन ऑफ टेरर
- रिसर्च
- विकास
| - वीभत्स
- शहीद भोंदू भट्ट
- सुधारक
- साधु और असाधु
- सिक्ख-सरदार
- व्यंग्य
- नेता का स्थान
- आत्मकथा
- अपनी खबर
- निबंध
- ‘उग्र’ को फाँसी दी जाए
| - कुछ साहित्यिक बम-गोले
- क्या यह सच है
- कसौटी
- चाकलेट आन्दोलन
- चाबुक
- तुलसी दल
- धरती और धान
- मुख-मर्दन उर्फ चुम्बन
- यह कौन साहित्य है
- विप्लव-गान
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उग्र जी का प्रारम्भिक जीवन बड़े अभाव में बीता. बचपन में ही पिता का देहांत हो गया. इनके पिता पुरोहती करते थे, सो परिवार यजमानो के भरोसे ही चलता था. पिता के जाने के बाद जीवन में घोर अभाव पसर गया. बड़े भाई रामलीला में काम करते थे सो इन्हें भी रामलीला में लगवा दिया. अपनी आत्मकथा में बेचन जी एक जगह लिखते हैं कि एक बार मैं रामलीला में भरत का रोल करते हुए रो रहा था. जनता और रामलीला के संचालक को लगा मैं अभिनय में डूब गया हूँ. वे अभिनय से बेहद खुस हुए और 10 रुपये का पुरस्कार दिया. जबकि सच यह था कि मैं अपने बड़े भाई के डर से रो दिया था और भाई राम बने थे. बेचन जी के लेखन में इसीलिए जीवन का एक अलग ही रंग दिखाई देता है ,उबड़ - खाबड़ , खुरदुरा,थोड़ा बदरंग,थोड़ा स्याह, थोड़ा फक्कड़, उनके लेखन में बेबाकी रही. ''चंद हसीनों के खुतूत '' उसका प्रमाण है. उनकी कुछ खुरदुरी पर लाजवाब कहानी पढ़िए और खुद फैसला कीजिये . कहानी उसकी माँ | दोपहर को ज़रा आराम करके उठा था। अपने पढ़ने-लिखने के कमरे में खड़ा-खड़ा धीरे-धीरे सिगार पी रहा था और बड़ी-बड़ी अलमारियों में सजे पुस्तकालय की ओर निहार रहा था। किसी महान लेखक की कोई कृति उनमें से निकालकर देखने की बात सोच रहा था। मगर, पुस्तकालय के एक सिरे से लेकर दूसरे तक मुझे महान ही महान नज़र आए। कहीं गेटे, कहीं रूसो, कहीं मेज़िनी, कहीं नीत्शे, कहीं शेक्सपीयर, कहीं टॉलस्टाय, कहीं ह्यूगो, कहीं मोपासाँ, कहीं डिकेंस, सपेंसर, मैकाले, मिल्टन, मोलियर---उफ़! इधर से उधर तक एक-से-एक महान ही तो थे! आखिर मैं किसके साथ चंद मिनट मनबहलाव करूँ, यह निश्चय ही न हो सका, महानों के नाम ही पढ़ते-पढ़ते परेशान सा हो गया। इतने में मोटर की पों-पों सुनाई पड़ी। खिड़की से झाँका तो सुरमई रंग की कोई 'फिएट' गाड़ी दिखाई पड़ी। मैं सोचने लगा - शायद कोई मित्र पधारे हैं, अच्छा ही है। महानों से जान बची! जब नौकर ने सलाम कर आनेवाले का कार्ड दिया, तब मैं कुछ घबराया। उसपर शहर के पुलिस सुपरिटेंडेंट का नाम छपा था। ऐसे बेवक़्त ये कैसे आए? पुलिस-पति भीतर आए। मैंने हाथ मिलाकर, चक्कर खानेवाली एक गद्दीदार कुरसी पर उन्हें आसन दिया। वे व्यापारिक मुसकराहट से लैस होकर बोले, "इस अचानक आगमन के लिए आप मुझे क्षमा करें।" "आज्ञा हो!" मैंने भी नम्रता से कहा। उन्होंने पॉकेट से डायरी निकाली, डायरी से एक तसवीर। बोले, "देखिए इसे, जरा बताइए तो, आप पहचानते हैं इसको?" "हाँ, पहचानता तो हूँ," जरा सहमते हुए मैंने बताया। "इसके बारे में मुझे आपसे कुछ पूछना है।" "पूछिए।" "इसका नाम क्या है?" "लाल! मैं इसी नाम से बचपन ही से इसे पुकारता आ रहा हूँ। मगर, यह पुकारने का नाम है। एक नाम कोई और है, सो मुझे स्मरण नहीं।" "कहाँ रहता है यह?" सुपरिटेंडेंट ने मेरी ओर देखकर पूछा। "मेरे बँगले के ठीक सामने एक दोमंजिला, कच्चा-पक्का घर है, उसी में वह रहता है। वह है और उसकी बूढ़ी माँ।" "बूढ़ी का नाम क्या है?" "जानकी।" "और कोई नहीं है क्या इसके परिवार में? दोनों का पालन-पोषण कौन करता है?" "सात-आठ वर्ष हुए, लाल के पिता का देहांत हो गया। अब उस परिवार में वह और उसकी माता ही बचे हैं। उसका पिता जब तक जीवित रहा, बराबर मेरी जमींदारी का मुख्य मैनेजर रहा। उसका नाम रामनाथ था। वही मेरे पास कुछ हजार रुपए जमा कर गया था, जिससे अब तक उनका खर्चा चल रहा है। लड़का कॉलेज में पढ़ रहा है। जानकी को आशा है, वह साल-दो साल बाद कमाने और परिवार को सँभालने लगेगा। मगर क्षमा कीजिए, क्या मैं यह पूछ सकता हूँ कि आप उसके बारे में क्यों इतनी पूछताछ कर रहे हैं?" "यह तो मैं आपको नहीं बता सकता, मगर इतना आप समझ लें, यह सरकारी काम है। इसलिए आज मैंने आपको इतनी तकलीफ़ दी है।" "अजी, इसमें तकलीफ़ की क्या बात है! हम तो सात पुश्त से सरकार के फ़रमाबरदार हैं। और कुछ आज्ञा---" "एक बात और---", पुलिस-पति ने गंभीरतापूर्वक धीरे से कहा, "मैं मित्रता से आपसे निवेदन करता हूँ, आप इस परिवार से जरा सावधान और दूर रहें। फिलहाल इससे अधिक मुझे कुछ कहना नहीं।" "लाल की माँ!" एक दिन जानकी को बुलाकर मैंने समझाया, "तुम्हारा लाल आजकल क्या पाजीपन करता है? तुम उसे केवल प्यार ही करती हो न! हूँ! भोगोगी!" "क्या है, बाबू?" उसने कहा। "लाल क्या करता है?" "मैं तो उसे कोई भी बुरा काम करते नहीं देखती।" "बिना किए ही तो सरकार किसी के पीछे पड़ती नहीं। हाँ, लाल की माँ! बड़ी धर्मात्मा, विवेकी और न्यायी सरकार है यह। ज़रूर तुम्हारा लाल कुछ करता होगा।" "माँ! माँ!" पुकारता हुआ उसी समय लाल भी आया - लंबा, सुडौल, सुंदर, तेजस्वी। "माँ!!" उसने मुझे नमस्कार कर जानकी से कहा, "तू यहाँ भाग आई है। चल तो! मेरे कई सहपाठी वहाँ खड़े हैं, उन्हें चटपट कुछ जलपान करा दे, फिर हम घूमने जाएँगे!" "अरे!" जानकी के चेहरे की झुर्रियाँ चमकने लगीं, काँपने लगीं, उसे देखकर, "तू आ गया लाल! चलती हूँ, भैया! पर, देख तो, तेरे चाचा क्या शिकायत कर रहे हैं? तू क्या पाजीपना करता है, बेटा?" "क्या है, चाचा जी?" उसने सविनय, सुमधुर स्वर में मुझसे पूछा, "मैंने क्या अपराध किया है?" "मैं तुमसे नाराज हूँ लाल!" मैंने गंभीर स्वर में कहा। "क्यों, चाचा जी?" "तुम बहुत बुरे होते जा रहे हो, जो सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र करनेवाले के साथी हो। हाँ, तुम हो! देखो लाल की माँ, इसके चेहरे का रंग उड़ गया, यह सोचकर कि यह खबर मुझे कैसे मिली।" सचमुच एक बार उसका खिला हुआ रंग जरा मुरझा गया, मेरी बातों से! पर तुरंत ही वह सँभला। "आपने गलत सुना, चाचा जी। मैं किसी षड्यंत्र में नहीं। हाँ, मेरे विचार स्वतंत्र अवश्य हैं, मैं जरूरत-बेजरूरत जिस-तिस के आगे उबल अवश्य उठता हूँ। देश की दुरवस्था पर उबल उठता हूँ, इस पशु-हृदय परतंत्रता पर।" "तुम्हारी ही बात सही, तुम षड्यंत्र में नहीं, विद्रोह में नहीं, पर यह बक-बक क्यों? इससे फ़ायदा? तुम्हारी इस बक-बक से न तो देश की दुर्दशा दूर होगी और न उसकी पराधीनता। तुम्हारा काम पढ़ना है, पढ़ो। इसके बाद कर्म करना होगा, परिवार और देश की मर्यादा बचानी होगी। तुम पहले अपने घर का उद्धार तो कर लो, तब सरकार के सुधार का विचार करना।" उसने नम्रता से कहा, "चाचा जी, क्षमा कीजिए। इस विषय में मैं आपसे विवाद नहीं करना चाहता।" "चाहना होगा, विवाद करना होगा। मैं केवल चाचा जी नहीं, तुम्हारा बहुत कुछ हूँ। तुम्हें देखते ही मेरी आँखों के सामने रामनाथ नाचने लगते हैं, तुम्हारी बूढ़ी माँ घूमने लगती है। भला मैं तुम्हें बेहाथ होने दे सकता हूँ! इस भरोसे मत रहना।" "इस पराधीनता के विवाद में, चाचा जी, मैं और आप दो भिन्न सिरों पर हैं। आप कट्टर राजभक्त, मैं कट्टर राजविद्रोही। आप पहली बात को उचित समझते हैं - कुछ कारणों से, मैं दूसरी को - दूसरे कारणों से। आप अपना पद छोड़ नहीं सकते - अपनी प्यारी कल्पनाओं के लिए, मैं अपना भी नहीं छोड़ सकता।" "तुम्हारी कल्पनाएँ क्या हैं, सुनूँ तो! जरा मैं भी जान लूँ कि अबके लड़के कॉलेज की गरदन तक पहुँचते-पहुँचते कैसे-कैसे हवाई किले उठाने के सपने देखने लगते हैं। जरा मैं भी तो सुनूँ, बेटा।" "मेरी कल्पना यह है कि जो व्यक्ति समाज या राष्ट्र के नाश पर जीता हो, उसका सर्वनाश हो जाए!" जानकी उठकर बाहर चली, "अरे! तू तो जमकर चाचा से जूझने लगा। वहाँ चार बच्चे बेचारे दरवाजे पर खड़े होंगे। लड़ तू, मैं जाती हूँ।" उसने मुझसे कहा, "समझा दो बाबू, मैं तो आप ही कुछ नहीं समझती, फिर इसे क्या समझाऊँगी!" उसने फिर लाल की ओर देखा, "चाचा जो कहें, मान जा, बेटा। यह तेरे भले ही की कहेंगे।" वह बेचारी कमर झुकाए, उस साठ बरस की वय में भी घूँघट सँभाले, चली गई। उस दिन उसने मेरी और लाल की बातों की गंभीरता नहीं समझी। "मेरी कल्पना यह है कि---", उत्तेजित स्वर में लाल ने कहा, "ऐसे दुष्ट, व्यक्ति-नाशक राष्ट्र के सर्वनाश में मेरा भी हाथ हो।" "तुम्हारे हाथ दुर्बल हैं, उनसे जिनसे तुम पंजा लेने जा रहे हो, चर्र-मर्र हो उठेंगे, नष्ट हो जाएँगे।" "चाचा जी, नष्ट हो जाना तो यहाँ का नियम है। जो सँवारा गया है, वह बिगड़ेगा ही। हमें दुर्बलता के डर से अपना काम नहीं रोकना चाहिए। कर्म के समय हमारी भुजाएँ दुर्बल नहीं, भगवान की सहस्र भुजाओं की सखियाँ हैं।" "तो तुम क्या करना चाहते हो?" "जो भी मुझसे हो सकेगा, करूँगा।" "षड्यंत्र?" "जरूरत पड़ी तो जरूर---" "विद्रोह?" "हाँ, अवश्य!" "हत्या?" "हाँ, हाँ, हाँ!" "बेटा, तुम्हारा माथा न जाने कौन सी किताब पढ़ते-पढ़ते बिगड़ रहा है। सावधान!" मेरी धर्मपत्नी और लाल की माँ एक दिन बैठी हुई बातें कर रही थीं कि मैं पहुँच गया। कुछ पूछने के लिए कई दिनों से मैं उसकी तलाश में था। "क्यों लाल की माँ, लाल के साथ किसके लड़के आते हैं तुम्हारे घर में?" "मैं क्या जानूँ, बाबू!" उसने सरलता से कहा, "मगर वे सभी मेरे लाल ही की तरह मुझे प्यारे दिखते हैं। सब लापरवाह! वे इतना हँसते, गाते और हो-हल्ला मचाते हैं कि मैं मुग्ध हो जाती हूँ।" मैंने एक ठंडी साँस ली, "हूँ, ठीक कहती हो। वे बातें कैसी करते हैं, कुछ समझ पाती हो?" "बाबू, वे लाल की बैठक में बैठते हैं। कभी-कभी जब मैं उन्हें कुछ खिलाने-पिलाने जाती हूँ, तब वे बड़े प्रेम से मुझे 'माँ' कहते हैं। मेरी छाती फूल उठती है---मानो वे मेरे ही बच्चे हैं।" "हूँ---", मैंने फिर साँस ली। "एक लड़का उनमें बहुत ही हँसोड़ है। खूब तगड़ा और बली दिखता है। लाल कहता था, वह डंडा लड़ने में, दौड़ने में, घूँसेबाजी में, खाने में, छेड़ खानी करने और हो-हो, हा-हा कर हँसने में समूचे कालेज में फ़र्स्ट है। उसी लड़के ने एक दिन, जब मैं उन्हें हलवा परोस रही थी, मेरे मुँह की ओर देखकर कहा, 'माँ! तू तो ठीक भारत माता-सी लगती है। तू बूढ़ी, वह बूढ़ी। उसका उजला हिमालय है, तेरे केश। हाँ, नक्शे से साबित करता हूँ---तू भारत माता है। सिर तेरा हिमालय---माथे की दोनों गहरी बड़ी रेखाएँ गंगा और यमुना, यह नाक विंध्याचल, ठोढ़ी कन्याकुमारी तथा छोटी बड़ी झुरियाँ-रेखाएँ भिन्न-भिन्न पहाड़ और नदियाँ हैं। जरा पास आ मेरे! तेरे केशों को पीछे से आगे बाएँ कंधे पर लहरा दूँ, वह बर्मा बन जाएगा। बिना उसके भारत माता का श्रृंगार शुद्ध न होगा।" जानकी उस लड़के की बातें सोच गद्गद हो उठी, "बाबू, ऐसा ढीठ लड़का! सारे बच्चे हँसते रहे और उसने मुझे पकड़, मेरे बालों को बाहर कर अपना बर्मा तैयार कर लिया!" उसकी सरलता मेरी आँखों में आँसू बनकर छा गई। मैंने पूछा, "लाल की माँ, और भी वे कुछ बातें करते हैं? लड़ने की, झगड़ने की, गोला, गोली या बंदूक की?" "अरे, बाबू," उसने मुसकराकर कहा, "वे सभी बातें करते हैं। उनकी बातों का कोई मतलब थोड़े ही होता है। सब जवान हैं, लापरवाह हैं। जो मुँह में आता है, बकते हैं। कभी-कभी तो पागलों-सी बातें करते हैं। महीनाभर पहले एक दिन लड़के बहुत उत्तेजित थे। न जाने कहाँ, लड़कों कोसरकार पकड़ रही है। मालूम नहीं, पकड़ती भी है या वे यों ही गप हाँकते थे। मगर उस दिन वे यही बक रहे थे, 'पुलिसवाले केवल संदेह पर भले आदमियों के बच्चों को त्रस देते हैं, मारते हैं, सताते हैं। यह अत्याचारी पुलिस की नीचता है। ऐसी नीच शासन-प्रणाली को स्वीकार करना अपने धर्म को, कर्म को, आत्मा को, परमात्मा को भुलाना है। धीरे-धीरे घुलाना-मिटाना है।' एक ने उत्तेजित भाव से कहा, 'अजी, ये परदेसी कौन लगते हैं हमारे, जो बरबस राजभक्ति बनाए रखने के लिए हमारी छाती पर तोप का मुँह लगाए अड़े और खड़े हैं। उफ़! इस देश के लोगों के हिये की आँखें मुँद गई हैं। तभी तो इतने जुल्मों पर भी आदमी आदमी से डरता है। ये लोग शरीर की रक्षा के लिए अपनी-अपनी आत्मा की चिता सँवारते फिरते हैं। नाश हो इस परतंत्रवाद का!' दूसरे ने कहा, 'लोग ज्ञान न पा सकें, इसलिए इस सरकार ने हमारे पढ़ने-लिखने के साधनों को अज्ञान से भर रखा है। लोग वीर और स्वाधीन न हो सकें, इसलिए अपमानजनक और मनुष्यताहीन नीति-मर्दक कानून गढ़े हैं। गरीबों को चूसकर, सेना के नाम पर पले हुए पशुओं को शराब से, कबाब से, मोटा-ताजा रखती है यह सरकार। धीरे-धीरे जोंक की तरह हमारे धर्म, प्राण और धन चूसती चली जा रही है यह शासन-प्रणाली!' 'ऐसे ही अंट-संट ये बातूनी बका करते हैं, बाबू। जभी चार छोकरे जुटे, तभी यही चर्चा। लाल के साथियों का मिजाज भी उसी-सा अल्हड़-बिल्हड़ मुझे मालूम पड़ता है। ये लड़के ज्यों-ज्यों पढ़ते जा रहे हैं, त्यों-त्यों बक-बक में बढ़ते जा रहे हैं।' "यह बुरा है, लाल की माँ!" मैंने गहरी साँस ली। जमींदारी के कुछ जरूरी काम से चार-पाँच दिनों के लिए बाहर गया था। लौटने पर बँगले में घुसने के पूर्व लाल के दरवाजे पर नजर पड़ी तो वहाँ एक भयानक सन्नाटा-सा नजर आया - जैसे घर उदास हो, रोता हो। भीतर आने पर मेरी धर्मपत्नी मेरे सामने उदास मुख खड़ी हो गई। "तुमने सुना?" "नहीं तो, कौन सी बात?" "लाल की माँ पर भयानक विपत्ति टूट पड़ी है।" मैं कुछ-कुछ समझ गया, फिर भी विस्तृत विवरण जानने को उत्सुक हो उठा, "क्या हुआ? जरा साफ़-साफ़ बताओ।" "वही हुआ जिसका तुम्हें भय था। कल पुलिस की एक पलटन ने लाल का घर घेर लिया था। बारह घंटे तक तलाशी हुई। लाल, उसके बारह-पंद्रह साथी, सभी पकड़ लिए गए हैं। सबके घरों से भयानक-भयानक चीजें निकली हैं।" "लाल के यहाँ?" "उसके यहाँ भी दो पिस्तौल, बहुत से कारतूस और पत्र पाए गए हैं। सुना है, उन पर हत्या, षड्यंत्र, सरकारी राज्य उलटने की चेष्टा आदि अपराध लगाए गए हैं।" "हूँ," मैंने ठंडी साँस ली, "मैं तो महीनों से चिल्ला रहा था कि वह लौंडा धोखा देगा। अब यह बूढ़ी बेचारी मरी। वह कहाँ है? तलाशी के बाद तुम्हारे पास आई थी?" "जानकी मेरे पास कहाँ आई! बुलवाने पर भी कल नकार गई। नौकर से कहलाया, 'परांठे बना रही हूँ, हलवा, तरकारी अभी बनाना है, नहीं तो, वे बिल्हड़ बच्चे हवालात में मुरझा न जाएँगे। जेलवाले और उत्साही बच्चों की दुश्मन यह सरकार उन्हें भूखों मार डालेगी। मगर मेरे जीते-जी यह नहीं होने का'।" "वह पागल है, भोगेगी," मैं दुख से टूटकर चारपाई पर गिर पड़ा। मुझे लाल के कर्मों पर घोर खेद हुआ। इसके बाद प्रायः एक वर्ष तक वह मुकदमा चला। कोई भी अदालत के कागज उलटकर देख सकता है, सी-आई-डी- ने और उनके प्रमुख सरकारी वकील ने उन लड़कों पर बड़े-बड़े दोषारोपण किए। उन्होंने चारों ओर गुप्त समितियाँ कायम की थीं, खर्चे और प्रचार के लिए डाकेडाले थे, सरकारी अधिकारियों के यहाँ रात में छापा मारकर शस्त्र एकत्र किए थे। उन्होंने न जाने किस पुलिस के दारोगा को मारा था और न जाने कहाँ, न जाने किस पुलिस सुपरिटेंडेंट को। ये सभी बातें सरकार की ओर से प्रमाणित की गईं। उधर उन लड़कों की पीठ पर कौन था? प्रायः कोई नहीं। सरकार के डर के मारे पहले तो कोई वकील ही उन्हें नहीं मिल रहा था, फिर एक बेचारा मिला भी, तो 'नहीं' का भाई। हाँ, उनकी पैरवी में सबसे अधिक परेशान वह बूढ़ी रहा करती। वह लोटा, थाली, जेवर आदि बेच-बेचकर सुबह-शाम उन बच्चों को भोजन पहुँचाती। फिर वकीलों के यहाँ जाकर दाँत निपोरती, गिड़गिड़ाती, कहती, "सब झूठ है। न जाने कहाँ से पुलिसवालों ने ऐसी-ऐसी चीजें हमारे घरों से पैदा कर दी हैं। वे लड़के केवल बातूनी हैं। हाँ, मैं भगवान का चरण छूकर कह सकती हूँ, तुम जेल में जाकर देख आओ, वकील बाबू। भला, फूल-से बच्चे हत्या कर सकते हैं?" उसका तन सूखकर काँटा हो गया, कमर झुककर धनुष-सी हो गई, आँखें निस्तेज, मगर उन बच्चों के लिए दौड़ना, हाय-हाय करना उसने बंद न किया। कभी-कभी सरकारी नौकर, पुलिस या वार्डन झुँझलाकर उसे झिड़क देते, धकिया देते। उसको अंत तक यह विश्वास रहा कि यह सब पुलिस की चालबाजी है। अदालत में जब दूध का दूध और पानी का पानी किया जाएगा, तब वे बच्चे जरूर बेदाग छूट जाएँगे। वे फिर उसके घर में लाल के साथ आएँगे। उसे 'माँ' कहकर पुकारेंगे। मगर उस दिन उसकी कमर टूट गई, जिस दिन ऊँची अदालत ने भी लाल को, उस बंगड़ लठैत को तथा दो और लड़कों को फाँसी और दस को दस वर्ष से सात वर्ष तक की कड़ी सजाएँ सुना दीं। वह अदालत के बाहर झुकी खड़ी थी। बच्चे बेड़ियाँ बजाते, मस्ती से झूमते बाहर आए। सबसे पहले उस बंगड़ की नजर उसपर पड़ी। "माँ!" वह मुसकराया, "अरे, हमें तो हलवा खिला-खिलाकर तूने गधे-सा तगड़ा कर दिया है, ऐसा कि फाँसी की रस्सी टूट जाए और हम अमर के अमर बने रहें, मगर तू स्वयं सूखकर काँटा हो गई है। क्यों पगली, तेरे लिए घर में खाना नहीं है क्या?" "माँ!" उसके लाल ने कहा, "तू भी जल्द वहीं आना जहाँ हम लोग जा रहे हैं। यहाँ से थोड़ी ही देर का रास्ता है, माँ! एक साँस में पहुँचेगी। वहीं हम स्वतंत्रता से मिलेंगे। तेरी गोद में खेलेंगे। तुझे कंधे पर उठाकर इधर से उधर दौड़ते फिरेंगे। समझती है? वहाँ बड़ा आनंद है।" "आएगी न, माँ?" बंगड़ ने पूछा। "आएगी न, माँ?" लाल ने पूछा। "आएगी न, माँ?" फाँसी-दंड प्राप्त दो दूसरे लड़कों ने भी पूछा। और वह टुकुर-टुकुर उनका मुँह ताकती रही - "तुम कहाँ जाओगे पगलो?" जब से लाल और उसके साथी पकड़े गए, तब से शहर या मुहल्ले का कोई भी आदमीलाल की माँ से मिलने से डरता था। उसे रास्ते में देखकर जाने-पहचाने बगलें झाँकने लगते। मेरा स्वयं अपार प्रेम था उस बेचारी बूढ़ी पर, मगर मैं भी बराबर दूर ही रहा। कौन अपनी गदरन मुसीबत में डालता, विद्रोही की माँ से संबंध रखकर? उस दिन ब्यालू करने के बाद कुछ देर के लिए पुस्तकालय वाले कमरे में गया, किसी महान लेखक की कोई महान कृति क्षणभर देखने के लालच से। मैंने मेजिनी की एक जिल्द निकालकर उसे खोला। पहले ही पन्ने पर पेंसिल की लिखावट देखकर चौंका। ध्यान देने पर पता चला, वे लाल के हस्ताक्षर थे। मुझे याद पड़ गई। तीन वर्ष पूर्व उस पुस्तक को मुझसे माँगकर उस लड़के ने पढ़ा था। एक बार मेरे मन में बड़ा मोह उत्पन्न हुआ उस लड़के के लिए। उसके पिता रामनाथ की दिव्य और स्वर्गीय तसवीर मेरी आँखों के आगे नाच गई। लाल की माँ पर उसके सिद्धांतों, विचारों या आचरणों के कारण जो वज्रपात हुआ था, उसकी एक ठेस मुझे भी, उसके हस्ताक्षर को देखते ही लगी। मेरे मुँह से एक गंभीर, लाचार, दुर्बल साँस निकलकर रह गई। पर, दूसरे ही क्षण पुलिस सुपरिटेंडेंट का ध्यान आया। उसकी भूरी, डरावनी, अमानवी आँखें मेरी 'आप सुखी तो जग सुखी' आँखों में वैसे ही चमक गईं, जैसे ऊजड़ गाँव के सिवान में कभी-कभी भुतही चिनगारी चमक जाया करती है। उसके रूखे फ़ौलादी हाथ, जिनमें लाल की तसवीर थी, मानो मेरी गरदन चापने लगे। मैं मेज पर से रबर (इरेजर) उठाकर उस पुस्तक पर से उसका नाम उधेड़ने लगा। उसी समय मेरी पत्नी के साथ लाल की माँ वहाँ आई। उसके हाथ में एक पत्र था। "अरे!" मैं अपने को रोक न सका, "लाल की माँ! तुम तो बिलकुल पीली पड़ गई हो। तुम इस तरह मेरी ओर निहारती हो, मानो कुछ देखती ही नहीं हो। यह हाथ में क्या है?" उसने चुपचाप पत्र मेरे हाथ में दे दिया। मैंने देखा, उसपर जेल की मुहर थी। सजा सुनाने के बाद वह वहीं भेज दिया गया था, यह मुझे मालूम था। मैं पत्र निकालकर पढ़ने लगा। वह उसकी अंतिम चिट्ठी थी। मैंने कलेजा रूखाकर उसे जोर से पढ़ दिया - "माँ! जिस दिन तुम्हें यह पत्र मिलेगा उसके सवेरे मैं बाल अरुण के किरण-रथ पर चढ़कर उस ओर चला जाऊँगा। मैं चाहता तो अंत समय तुमसे मिल सकता था, मगर इससे क्या फ़ायदा! मुझे विश्वास है, तुम मेरी जन्म-जन्मांतर की जननी ही रहोगी। मैं तुमसे दूर कहाँ जा सकता हूँ! माँ! जब तक पवन साँस लेता है, सूर्य चमकता है, समुद्र लहराता है, तब तक कौन मुझे तुम्हारी करुणामयी गोद से दूर खींच सकता है? दिवाकर थमा रहेगा, अरुण रथ लिए जमा रहेगा! मैं, बंगड़ वह, यह सभी तेरे इंतजार में रहेंगे। हम मिले थे, मिले हैं, मिलेंगे। हाँ, माँ! तेरा--- लाल" काँपते हाथ से पढ़ने के बाद पत्र को मैंने उस भयानक लिफ़ाफ़े में भर दिया। मेरी पत्नी की विकलता हिचकियों पर चढ़कर कमरे को करुणा से कँपाने लगी। मगर, वह जानकी ज्यों-की-त्यों, लकड़ी पर झुकी, पूरी खुली और भावहीन आँखों से मेरी ओर देखती रही, मानो वह उस कमरे में थी ही नहीं। क्षणभर बाद हाथ बढ़ाकर मौन भाषा में उसने पत्र माँगा। और फिर, बिना कुछ कहे कमरे के फाटक के बाहर हो गई, डुगुर-डुगुर लाठी टेकती हुई। इसके बाद शून्य-सा होकर मैं धम से कुरसी पर गिर पड़ा। माथा चक्कर खाने लगा। उस पाजी लड़के के लिए नहीं, इस सरकार की क्रूरता के लिए भी नहीं, उस बेचारी भोली, बूढ़ी जानकी - लाल की माँ के लिए। आह! वह कैसी स्तब्ध थी। उतनी स्तब्धता किसी दिन प्रकृति को मिलती तो आँधी आ जाती। समुद्र पाता तो बौखला उठता। जब एक का घंटा बजा, मैं जरा सगबगाया। ऐसा मालूम पड़ने लगा मानो हरारत पैदा हो गई है---माथे में, छाती में, रग-रग में। पत्नी ने आकर कहा, "बैठे ही रहोगे! सोओगे नहीं?" मैंने इशारे से उन्हें जाने का कहा। फिर मेजिनी की जिल्द पर नजर गई। उसके ऊपर पड़े रबर पर भी। फिर अपने सुखों की, जमींदारी की, धनिक जीवन की और उस पुलिस-अधिकारी की निर्दय, नीरस, निस्सार आँखों की स्मृति कलेजे में कंपन भर गई। फिर रबर उठाकर मैंने उस पाजी का पेंसिल-खचित नाम पुस्तक की छाती पर से मिटा डालना चाहा। "माँ---" मुझे सुनाई पड़ा। ऐसा लगा, गोया लाल की माँ कराह रही है। मैं रबर हाथ में लिए, दहलते दिल से, खिड़की की ओर बढ़ा। लाल के घर की ओर कान लगाने पर सुनाई न पड़ा। मैं सोचने लगा, भ्रम होगा। वह अगर कराहती होती तो एकाध आवाज और अवश्य सुनाई पड़ती। वह कराहनेवाली औरत है भी नहीं। रामनाथ के मरने पर भी उस तरह नहीं घिघियाई जैसे साधारण स्त्रियाँ ऐसे अवसरों पर तड़पा करती हैं। मैं पुनः सोचने लगा। वह उस नालायक के लिए क्या नहीं करती थी! खिलौने की तरह, आराध्य की तरह, उसे दुलराती और सँवारती फिरती थी। पर आह रे छोकरे! "माँ---" फिर वही आवाज। जरूर जानकी रो रही है। जरूर वही विकल, व्यथित, विवश बिलख रही है। हाय री माँ! अभागिनी वैसे ही पुकार रही है जैसे वह पाजी गाकर, मचलकर, स्वर को खींचकर उसे पुकारता था। अँधेरा धूमिल हुआ, फीका पड़ा, मिट चला। उषा पीली हुई, लाल हुई। रवि रथ लेकर वहाँ क्षितिज से उस छोर पर आकर पवित्र मन से खड़ा हो गया। मुझे लाल के पत्र की याद आ गई। "माँ---" मानो लाल पुकार रहा था, मानो जानकी प्रतिध्वनि की तरह उसी पुकार को गा रही थी। मेरी छाती धक् धक् करने लगी। मैंने नौकर को पुकारकर कहा, "देखो तो, लाल की माँ क्या कर रही है?" जब वह लौटकर आया, तब मैं एक बार पुनः मेज और मेजिनी के सामने खड़ा था। हाथ में रबर लिए उसी उद्देश्य से। उसने घबराए स्वर से कहा, "हुजूर, उनकी तो अजीब हालत है। घर में ताला पड़ा है और वे दरवाजे पर पाँव पसारे, हाथ में कोई चिट्ठी लिए, मुँह खोल, मरी बैठी हैं। हाँ सरकार, विश्वास मानिए, वे मर गई हैं। साँस बंद है, आँखें खुलीं---" | |
कहानी जल्लाद प्रातः आठ साढ़े आठ बजे का समय था। रात को किसी पारसी कम्पनी का कोई रद्दी तमाशा अपने पैसे वसूल करने के लिए दो बजे तक झख मार-मार कर देखते रहने के कारण सुबह नींद कुछ विलम्ब से टूटी। इसी से उस दिन हवाखोरी के लिए निकलने में कुछ देर हो गई थी और लौटने में भी। मैं वायु सेवन के लिए अपने घर से कोई चार मील की दूरी तक रोज ही आया-जाया करता था। मेरे घर और उस रास्ते के बीच में हमारे शहर का जिला जेल भी पड़ता था, जिसकी मटमैली, लम्बी-चौड़ी और उदास चहारदीवारियाँ रोज आगे ही मेरी आँखों के आगे पड़ती और मेरे मन में एक प्रकार की अप्रिय और भयावनी सिहर पैदा किया करती थी। मगर उस दिन उसी जेल के दक्षिणी कोने पर अनेक घने और विस्तृत वृक्षों की अनुज्ज्वल छाया में मैंने जो कुछ देखा, उसे मैं बहुत दिनों तक चेष्टा करने पर भी शायद न भूल सकूँगा। मैंने देखा कि मुश्किल से तेरह-चौदह वर्ष का कोई रूखा पर सुन्दर लड़का, एक पेड़ की जड़ के पास अर्धनग्नावस्था में पड़ा तड़प रहा है और हिचक-हिचक कर बिलख रहा है। उसी लड़के के सामने एक कोई परम भयानक पुरुष असुन्दर भाव से खड़ा हुआ, रूखे शब्दों में उससे कुछ पूछ-ताछ कर रहा था। यह सब मैंने उस छोटी सड़क पर से देखा, जो उस स्थान से कोई पचीस-तीस गज की दूरी पर थी। यद्यपि दिन की बाढ़ के साथ-साथ तपन की गरमी भी बढ़ रही थी और यद्यपि मैं थका और अनमना सा भी था, पर मेरे मन की उत्सुकता उस दयनीय दृश्य का भेद जानने को मचल उठी। मैं धीरे-धीरे उन दोनों की नज़र बचाता हुआ उनकी तरफ़ बढ़ा। अब मुझे ज्ञात हुआ कि लड़का क्यों बिलख रहा था। मैंने देखा, उसके शरीर के मध्य-भाग पर, जो खुला हुआ था, प्रहार के अनेक काले और भयावने चिह्न थे। उसको बेंत लगाए गए थे। बेंत लगाए गए थे उस कोमल-मति गरीब बालक को अदालत की आज्ञा से। मेरा दिल धक् से होकर रह गया। न्याय ऐसा अहृदय, ऐसा क्रूर होता है? अब मैं आड़ में लुक कर उस तमाशे को न देख सका। झट मैं उन दोनों के सामने आ खड़ा हुआ और उस भयानक प्राणी से प्रश्न करने लगा-क्या इसको बेंत लगाए गए हैं? हाँ, उत्तर देने से अधिक गुर्रा कर उस व्यक्ति ने कहा-देखते नहीं हैं आप? ससुरे ने जमींदार के बाग से दो कटहल चुराए थे। लड़का फिर पीड़ा और अपमान से बिलबिला उठा। इस समय वह छाती के बल पड़ा हुआ था, क्योंकि उसके घाव उसे आराम से बेहोश भी नहीं होने देना चाहते थे। वह एक बार तड़पा और दाहिनी करवट होकर मेरी ओर देखने की कोशिश करने लगा। पर अभागा वैसा न कर सका। लाचार फिर पहले ही सा लेट कर अवरुद्ध कण्ठ से कहने लगा-नहीं बाबू, चुरा कहाँ सका? भूख से व्याकुल होकर लोभ में पड़ कर मैं उन्हें चुरा जरूर रहा था, पर जमींदार के रखवालों ने मुझे तुरन्त ही गिरफ्तार कर लिया। 'गिरफ्तार कर लिया तो तेरे घर वाले उस वक्त कहाँ थे?'नीरस और शासन के स्वर में उस भयानक पुरुष ने उससे पूछा-'क्या वे मर गए थे? तुझे बचाने-जमींदार से, पुलीस से, बेंत से-क्यों नहीं आए?' 'तुम विश्वास ही नहीं करते?' लड़के ने रोते-रोते उत्तर दिया-'मैंने कहा नहीं, मैं विक्रमपुर गाँव का एक अनाथ भिखमंगा बालक हूँ। मेरे माता-पिता मुझे छोड़ कर कब और कहाँ चले गए, मुझे मालूम नहीं। वे थे भी या नहीं, मैं नहीं जानता। छुटपन से अब तक दूसरों की जूठन और फटकारों में पला हूँ। मेरे अगर कोई होता तो मैं उस गाँव के जमींदार का चोर क्यों बनता? मेरी यह दुर्गति क्यों होती?...आह...बाप रे...बाप...।' वह गरीब फिर अपनी पुकारों से मेरे कलेजे को बेधने लगा। मैं मन ही मन सोचने लगा कि किस रूप से मैं इस बेचारे की कोई सहायता करूँ। मगर उसी समय मेरी दृष्टि उस भयानक पुरुष पर पड़ी, जो जरा तेजी से उस लड़के की ओर बढ़ रहा था। उसने हाथ पकड़ कर अपना बल देकर उसको खड़ा किया। 'तू मेरी पीठ पर सवार हो जा।' उसी रूखे स्वर में उसने कहा-'मैं तुझे अपने घर ले चलूँगा।' 'अपने घर?' मैंने विवश भाव से उस रूखे राक्षस से पूछा--'तुम कौन हो? कहाँ है तुम्हारा घर?...और इसको अब वहाँ क्यों लिए जाते हो?' 'मैं जल्लाद हूँ बाबू' लड़के को पीठ पर लादते हुए खूनी आँखों से मेरी ओर देख कर लड़खड़ाती आवाज़ में उसने कहा-'मैं कुछ रुपयों का सरकारी गुलाम हूँ। मैं सरकार की इच्छानुसार लोगों को बेंत लगाता हूँ तो प्रति प्रहार कुछ पैसे पाता हूँ और प्राण लेता हूँ तो प्रति प्राण कुछ रुपये।' 'फाँसी की सजा पाने वालों से तो नहीं, बेंत खाने वालों से सुविधानुसार मैं रिश्वत भी खाता हूँ। सरकार की तलब से मैंने तो बाबू यही देखा है-बहुत कम सरकारी नौकरों की गुजर हो सकती है। इसी से सभी अपने-अपने इलाकों में ऊपरी कमाई के 'कर' फैलाए रहते हैं। मैं गरीब छोटा सा गुलाम हूँ, मेरी रिश्वत की चर्चा तो वैसी चमकीली है भी नहीं कि किसी के आगे कहने में मुझे कोई भय हो। मैं तो सबसे कहता हूँ कि कोई मुझे पूजे तो मैं उसके सगे-सम्बन्धियों को 'सुच्चे' बेंत न लगा कर 'हलके' लगाऊँ। और नहीं...तो सड़ासड़...सड़ासड़...। उसने ऐसी मुद्रा बना ली जैसे किसी को बेंत लगा रहा हो। वह भूल गया कि उसकी पीठ पर उसकी 'सड़ासड़' का एक गरीब शिकार काँप रहा है। 'मगर इस अनाथ को 'सुच्चे' बेंत लगा कर मैंने ठीक काम नहीं किया। इसने जेल में ही बताया था कि मेरे कोई नहीं है। मगर मैंने विश्वास नहीं किया। मैं अपने जिस शिकार का विश्वास नहीं करता, उसके प्रति भयानक हो उठता हूँ, और मेरा भयानक होना कैसा वीभत्स होता है, इसे आप इस लड़के की पीठ पर देखें। मगर इसे काट कर मैंने गलती की। यही न जाने क्यों मेरा मन कह रहा है। 'इसी से बाबू मैं इसे अपने घर ले जा रहा हूँ, वहाँ इसके घाव पर केले का रस लगाऊँगा और इसको थोड़ा आराम देने के लिए 'दारू' पिलाऊँगा, बिना इसको चंगा किए मेरा मन सन्तुष्ट न होगा, यह मैं खूब जानता हूँ।' भैंसे की तरह अपनी कठोर और रूखी पीठ पर उस अनाथ अपराधी को लाद कर वह एक ओर बढ़ चला। मगर मैंने उसे बाधा दी- 'सुनो तो, मुझसे भी यह एक रुपया लेते जाओ। मुझको भी इस लड़के की दुर्दशा पर दया आती है।' 'क्या होगा रुपया बाबू? भयानकता से मुस्करा कर उसने रुपये की ओर देखा और उसको मेरी उँगलियों से छीन कर अपनी उंगलियों में ले लिया।' 'उसको दारू पिलाना, पीड़ा कम हो जाएगी। अभी एक ही रुपया जेब में था, मैं शाम को इसके लिए कुछ और देना चाहता हूँ। तुम्हारा घर कहाँ है? नाम क्या है?' 'मैं शहर के पूरब उस कबरिस्तान के पास के डोमाने में रहता हूँ, डोमों का चौधरी हूँ, मेरा नाम रामरूप है। पूछ लीजिएगा।' उस अनाथ लड़के का नाम 'अलियार' था, यह मुझे उस घटना के सातवें या आठवें दिन मालूम हुआ। ग्रामीणों में अलियार शब्द 'कूड़ा-कर्कट' के पर्याय रूप में प्रचलित है। उस लड़के ने मुझे बताया। उसके गाँव वालों का कहना है कि उसे पहले-पहल गाँव के एक 'भर' ने अलियार पर पड़ा पाया था। उसी ने कई वर्षों तक उसे पाला भी और उसका उक्त नामकरण भी किया। अलियार के अंग पर के बेंतों के घाव, बधिक रामरूप के सफल उपायों से तीन-चार दिनों के भीतर ही सूख चले, मगर वह बालक बड़ा दुर्बल-तन और दुर्बल-हृदय था। सम्भव है, उसको बारह बेंतों की सजा सुनाने वाले मजिस्ट्रेट ने, पुलिस की मायामयी डायरियों पर विश्वास कर, उसकी उम्र अठारह या बीस वर्ष मान ली हो, मगर मेरी नज़रों में तो वह बेचारा चौदह-पन्द्रह वर्षों से अधिक वयस का नहीं मालूम पड़ा। तिस पर उसकी यह रूखी-सूखी काया, आश्चर्य, किसी डाक्टर ने किस तरह उसको बेंत खाने योग्य घोषित किया होगा। जेल के किसी जिम्मेदार और शरीफ अधिकारी ने किस तरह अपने सामने उस बेचारे को बेंतों से कटवाया होगा। जब तक अलियार खाट पर पड़ा-पड़ा कराहता रहा, अपने उसे बेंत खाने के भयानक अनुभव का स्वप्न देख-देख कर अपनी रक्षा के लिए करुण दुहाइयाँ देता रहा, तब तक मैं बराबर, एक बार रोज, रामरूप की गन्दी झोपड़ी में जाता था और अपनी शक्ति के अनुसार प्रभु के उस असहाय प्राणी की मन और धन से सेवा करता था, मगर मेरे इस अनुराग में एक आकर्षण था और यह था जल्लाद रामरूप। न जाने क्यों उसका यह 'अलकतरा' रंग, उसकी भयानक नैपालियों-सी नाटी काया, उसका वह मोटा, वीभत्स अधर और पतला ओंठ, जिस पर घनी काली, भयावनी तथा अव्यवस्थित मूँछों का भार अशोभायमान था, मुझे कुछ अपूर्ण सा मालूम पड़ता था। न जाने क्यों उसकी बड़ी-बड़ी, डोरीली, नीरस और रक्तपूर्ण आँखें मेरे मन में एक तरह की सिहर सी पैदा कर देती थीं। पर आश्चर्य, इतने पर भी मैं उसे अधिक से अधिक देखना और समझना चाहता था। उसकी मिट्टी की झोपड़ी में उसके अलावा उसकी प्रौढ़ा स्त्री भी थी। एक दिन जब मैंने रामरूप से उसकी जीवनी पूछी और यह पूछा कि उसके परिवार का कोई और भी कहीं है या नहीं, तो उसने अपनी विचित्र कहानी मुझे सुनाई। 'बाबू' उसने बताया-'पुश्त दो पुश्त से नहीं, मेरे खानदान में तेरह पुश्तों से यही जल्लादी का काम होता है। हाँ, उसके पहले मुसलमानी राज में मेरे पुरखे डाके डाला करते थे। मेरे दादा के दादा ऐसे प्रतापी थे कि सन् ५७ के गदर में उन्होंने इसी शहर के उस दक्षिणी मैदान में सरकार बहादुर के हुकुम से पाँच सौ और तीन पचीस और दो दस आदमियों को चन्द दिनों के भीतर ही फाँसी पर लटका दिया था। उन दिनों वह आठों पहर शराब छाने रहा करते थे। ...और कैसी शराब? मामूली नहीं बाबू, गोरों के पीने वाली-अंगरेजी।' मैंने उसे टोका-रामरूप, क्या अब भी फाँसी देने से पूर्व तुम लोगों को शराब मिलती है? 'हाँ, हाँ, मिलती क्यों नहीं बाबू, मगर देसी की एक बोतल का दाम मिलता है, विलायती का नहीं, जिसको छान-छान कर मेरे दादा के दादा गाहियों के गाही लोगों को काल के पालने पर सुला देते थे। यही मेरे खानदान में सबसे अधिक धनी और जबरदस्त भी थे। लम्बे-चौड़े तो वह ऐसे थे कि बड़े-बड़े पलटनिये साहब उनका मुँह बकर-बकर ताका करते थे। मगर उनमें एक दोष भी बहुत बड़ा था। वह शराब बहुत पीते थे। इसी में वह तबाह हो गए और मरते-मरते गदर की सारी कमाई फूँक-ताप गए। हाँ, मैं भूल कर गया बाबू, वह मरे नहीं, बल्कि शराब के नशे में एक दिन बड़ी नदी में कूद पड़े और तब से लापता हो गए। नदी के उस ऊँचे घाट पर हमारे दादा ने उनका 'चौरा्' भी वनवाया है, जिसकी सैकड़ों डोम पूजा किया करते हैं और हमारे वंश के तो वह 'वीर' ही हैं।' अपने वीर परदादा के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए, उनकी कहानी समाप्त करते-करते रामरूप ने धीरे से अपने कान उमेठे। 'रामरूप', मैंने कहा-'जाने दो अपने पुरखों की कहानी। वह बड़ी ही भयानक है। अब तुम यह बताओ कि तुम्हारे कोई बच्ची-बच्चा भी है?' 'नहीं बाबू', किञ्चित गम्भीर होकर उसने कहा-'मेरी औरतिया को, कोई सात बरस हुए-एक लड़का हुआ ज़रूर था, मगर वह दो साल का होकर जाता रहा। बच्चे तो वैसे भी मेरे खानदान में बहुत कम जीते हैं। न जाने क्यों, जहाँ तक मुझे मालूम है, मेरे किसी भी पुरखे का एक से ज्यादा बच्चा नहीं बचा। मुझको तो वह भी नसीब नहीं। मेरी लुगैया तो अब बूढ़ी हो जाने पर भी बच्चा-बच्चा रिरियाती रहती है। मगर यह मेरे बस की बात तो है नहीं। मैं तो आप ही चाहता हूँ कि मेरे एक वीर बच्चा हो, जो हमारे इस पुश्तैनी रोजगार को मेरे बाद संभाले, पर जब दाता देता ही नहीं तब कोई क्या करे?' 'जब तक तुम्हारे और कोई नहीं है' मैंने उस जल्लाद के हृदय की थाह ली-'तब तक तुम इसी भिखमंगे को क्यों नहीं पालते-पोसते? तुमने कुछ अन्दाज लगाया है? कैसा है उसका मिजाज? यह तुम्हारे यहाँ खप जाने लायक है?' 'है तो, और मेरी लुगइया उसको चाहती भी है।' रामरूप ने ज़रा मुस्करा कर कहा-'पर मेरे अन्दाज से वह अलियार कुछ दब्बू और डर्रू है। और मेरे लड़के को तो ऐसा निडर होना चाहिए कि जरूरत पड़े तो बिना डरे काल की भी खाल खींच ले और जान निकाल ले। यह मंगन छोकरा भला मेरे रोजगार को क्या सँभालेगा?' 'कोई दूसरा रोजगार देखो रामरूप', मैंने कहा-'छोड़ो इस हत्यारे व्यापार को, इसमें भला तुम्हें क्या आनन्द मिलता होगा। ग़ज़ब की है तुम्हारी छाती, जो तुम लोगों को प्रसन्न भाव से बेंत लगाते हो और फाँसी के तख्ते पर चढ़ा कर अपने परदादा के शब्दों में काल के पालने में सुला देते हो, मगर यह सुन्दर नही।' 'हा, हा, हा, हा' रामरूप ठठाया-'आप कहते हैं यह सुन्दर नहीं। नहीं बाबू, हमारे लिए यह परम सुन्दर है। आप जानते ही हैं कि मैं आप लोगों की 'नीच जाति' का एक तुच्छ प्राणी हूँ। आप तो नए ख़याल के आदमी हैं, इसलिए न जाने क्या समझ कर इस लड़के के प्रेम में मेरी झोपड़ी तक आए भी हैं, नहीं तो मैं और मेरी जाति इस इज्जत के योग्य कहाँ? मेरे घर वाले जल्लादी न करते, तो आप लोगों के मैले साफ करते और कुत्तों को मारते। मगर-हा, हा, हा, हा-कुत्तों को मारने से तो आदमी मारना कहीं अच्छा है, इसे आप भी मानेंगे, यद्यपि मेरी समझ से कुत्ता मारना और आदमी मारना, जल्लाद के लिए एक ही बात है। हमारे लिए वे भी अपरिचित और निरपराध और ये भी। दूसरों के कहने पर हम कुत्तों को भी मारते हैं और कुत्तों से ज्यादा समझदारों-आदमियों- को भी।' इसके बाद मुझे एक काम के सिलसिले में बम्बई जाना पड़ा और वहीं पूरे दो महीने रुकना पड़ा। लौटने पर भूल गया उस जल्लाद को और परिचित उस अलियार को। प्रायः दो बरस तक उनकी कोई खबर न ली। फुर्सत भी अपनी मानविक हाय-हायों से, इतनी न थी कि उनकी ओर ध्यान देता। मगर उस दिन अचानक अलियार दिखाई पड़ा, और मैंने नहीं, उसी ने मुझको पहचाना भी। मुझे इस बार वह कुछ अधिक स्वस्थ, प्रसन्न और सुन्दर मालूम पड़ा। 'कहां रहते हो आजकल अलियार?' मैंने दरियाफ्त किया,'और वह अद्भुत मित्र कैसे हैं, जिनको तुम शायद सपने में भी न भूल सकते होगे।' 'वह मजे में है,' उसने उत्तर दिया-'और मैं तभी से उसी के साथ रहता हूँ। तभी से उसकी वह स्त्री मुझको अपने बेटे की तरह मानती और पालती है।' 'तो क्या अब तुम भी वही व्यापार सीख रहे हो और रामरूप की गद्दी के हकदार बनने के यत्न में हो?' 'मुझे स्वयं तो पसन्द नहीं है उसका वह हत्या-व्यापार, मगर उसकी रोटी खाता हूँ तो बातें भी माननी पड़ती हैं। वह अब अक्सर मुझे फाँसी या बेंत लगाने के वक्त अपने साथ जेल में ले जाता है और अपने निर्दय व्यापार को बार-बार मुझे दिखा कर अपना ही सा बनाना चाहता है।' 'तुम जेल में जाने कैसे पाते हो?' मैंने पूछा-'वहाँ तो बिना अफसरों की आज्ञा के कोई भी जाने नहीं पाता है। फिर खास कर बेंत मारने और फाँसी के वक्त तो और भी बाहरी लोगों की मनाही रहती है।' 'मगर' उसने उत्तर दिया-'अब तो मैं उसे मामा कह कर पुकारता हूँ और वह मुझे बहिन का लड़का और अपना गोद लिया हुआ बेटा कहकर अफसरों के आगे पेश करता है। कहता है, हमारे खानदान के सभी लड़कों ने इसी तरह देख-देख कर इस विद्या का अभ्यास किया था।' 'तो तुम भी अब,' मैंने एक उदास साँस ली-'जल्लाद बनने की धुन में हो? वही जल्लाद, जिसके अस्तित्व के कारण उस दिन जेल के उस कोने में पड़े तुम तड़प रहे थे और अपने भावी मामा की ओर देख-देख कर उसकी क्रूरता को कोस रहे थे। बाप रे... तुम उस भयानक रामरूप को प्यार करते हो- कर सकते हो?' मेरे इस प्रश्न पर कुछ देर तक अलियार चुप और गम्भीर रहा। फिर बोला-'नहीं बाबू जी मैं उस पशु को कदापि नहीं प्यार करता, बलिक आपसे सच कहता हूँ, उससे घृणा करता हूँ। जब-जब मेरी नजर उस पर पड़ती है, तब-तब मैं उसे उसी रूप में देखता हूँ, जिस रूप में उस दिन देखा था, जिसकी आप अभी चर्चा कर रहे थे। पर मैं उसकी स्त्री का आदर करता हूँ, जो हत्यारे की औरत होने पर भी हत्यारिणी नहीं, माँ है। बस उसी कारण मैं वहाँ रुका हूँ, नहीं तो मेरा बस चले तो मैं उस रामरूप को एक ही दिन इस पृथ्वी पर से उठा दूँ, जो लोगों की हत्या करके अपनी जीविका चलाता है। और आपसे छिपाता नहीं, मैं शीघ्र ही किसी न किसी तरह उसको इस व्यापार से अलग करूँगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।' 'वह ऐसा कप़ड़ा नहीं है अलियार' मैंने कहा-'जिस पर कोई दूसरा रंग भी चढ़ सके। रामरूप को, जहाँ तक मैंने समझा है, स्वयं भगवान भी उसके व्यापार से अलग नहीं कर सकते। दूसरे जल्लाद चाहे कुछ कच्चे अधिक हों, मगर तुम्हारा यह मामा तो जरूर ही सभी जल्लादों का दादा गुरू है। बचना तुम उससे-...और उसको उसके पथ से विरत करना नहीं सो सावधान, वह ऐसा निर्दय है कि कुछ उलटी-सीधी समझते ही तुम्हारे प्राणों तक को मसल डालेगा।' 'पर बाबू' अलियार ने सच-सच कहा-'अब तो वह भी मुझको प्यार करने लग गया है। मुझे तो कभी-कभी ऐसा ही मालूम पड़ता है। आश्चर्य से चकित हो कर कभी-कभी मेरी वह नई माँ भी ऐसा ही कहा और सोचा करती है। वह क्रुद्ध होने पर अब भी अक्सर मेरी माँ को बुरी तरह मारने लगता है, पर मेरी ओर-बड़ा से बड़ा अपराध होने पर भी-न जाने क्यों, तर्जनी उँगली तक नहीं उठाता। मुझे अपने ही साथ खिलाता भी है, और यहाँ-वहाँ-जेल में और छोटे-मोटे अफसरों के पास-ले भी जाता है। मगर इतने पर भी मैं उससे घृणा करता हूँ। उसका अमंगल और सर्वनाश चाहता हूँ।' 'क्यों...न जाने क्यों?' मैंने साश्चर्य से पूछा। उसने उत्तर दिया-'मैं उस पशु को कभी प्यार नहीं कर सकता। अच्छा बाबू, आपको भी देर हो रही है, मुझे भी। यहाँ रहा तो फिर कभी सलाम करने आ जाऊँगा। इस वक्त जाने दीजिए-सलाम।' मुझको यह विश्वास नहीं था कि वह दुबला-पतला भिखमंगा बालक अपने निश्चय का ऐसा पक्का निकलेगा कि एक दिन सारे शहर में तहलका मचा कर छोड़ेगा पर वह विचित्र निकला। एक दिन प्रातःकाल होते ही शहर में जोरों की सनसनी फैली कि आज स्थानीय जिला-जेल से कोई बड़ा मशहूर फाँसी का कैदी भाग निकला है। यद्यपि उसके भागने के वक्त पहरेदार वार्डरों को कुछ आहट मिल गई थी, पर उससे कोई फायदा नहीं हो सका। भागने वाला तो भाग ही गया। हाँ, भगाने वालों में से एक नवयुवक पकड़ा गया है। समाचार तो आकर्षक था, इसलिए कि फाँसी का कोई कैदी भागा था। मेरे जी में आया कि जरा जेल की ओर टहलता हुआ चलूँ। देखूँ, वहाँ शायद रामरूप या अलियार मिलें। उन दोनों में से किसी के भी मिलने से बहुत सी भीतरी बातों का पता चल सकेगा। कपड़े पहन और टहलने की छड़ी हाथ में लेकर जब मैं जेल के पास पहुँचा तो वहाँ का हँगामा देखकर एक बार आश्चर्य में आ गया। फाटक के बाहर अपने क्वार्टरों के सामने मैदान में ड्यूटी से बचे हुए अनेक वार्डर हताश और उदास खड़े गत रात्रि की घटना पर मनोरंजक ढंग से वाद-विवाद कर रहे थे। 'भीतर बड़े साहब और कलेक्टर' एक ने दरियाफ्त किया-'उसका बयान ले रहे हैं, ग़ज़ब कर दिया उस लौंडे ने। ऐसे जालिम आदमी को भगा दिया, जिसे कि, अब सरकार पा ही नहीं सकती। मैंने पहले इस छोकरे को ऐसा नहीं समझा था।' 'अरे उसको छोकरा कहते हो?' दूसरे मुसलमान वार्डर ने कहा-'साला चाहे तो बड़े-बड़ों को चरा के छोड़ दे। मगर उस पाजी की वजह से बेचारा रामरूप पिस जाएगा, क्योंकि अपना-अपना बोझ हलका हल्का करने के लिए सभी गरीब रामरूप पर टूटेंगे। उसी की वजह से वह जेल में आने-जाने और उसके भेद पाने लायक हुआ था। अब देखना है, रामरूप की डोंगी किस घाट लगती है।' 'वह भी अफ़सरों के सामने जेलर साहब द्वारा बुलाया गया है। शायद उसको भी बयान देना होगा।' 'नहीं', किसी गम्भीर वार्डर ने कहा-'जेल के कर्मचारियों से जब कोई ग़लती हो जाती है, तब अपनी सारी ताकत लगा कर वह उसे छिपाने की कोशिश करते हैं। मुझे ठीक मालूम है कि उस लड़के के सिलसिले में रामरूप का नाम लिया ही न जाय और यह साबित ही न होने दिया जाय कि वह पहले से यहाँ आता-जाता था। यह बात रामरूप को और उस लौंडे को भी समझा दी गई है।' 'मगर वह पाजी छोकरा, जिसने उस मशहूर डाकू को भगा कर हमारे सर पर आफत का पहाड़ ढा दिया है, जेलर की सलाह मानेगा ही क्यों? अगर अपने बयान में वही कुछ कह दे?' 'अजी कहेगा ज़रूर ही', किसी बूढ़े वार्डर ने राय दी-'आखिर इस भगाई में एक खून भी तो हुआ है। माना कि खून लड़के ने नहीं, उस डाकू के किसी साथी ने किया होगा, पर अगर दूसरे न पकड़े गए तो उस वार्डर का खून तो इसी छोकरे के माथे मढ़ा जाएगा। उफ, बड़े जीवट की यह घटना हुई है। मैं तो तीस साल से इस नौकरी में हूँ। इस बीच में पचासों कैदियों के भागने की की बातें मैंने सुनीं, मगर उनमें ऐसी घटना एक भी नहीं। फाँसी के कैदी का भाग जाना और भाग जाने पाना-कमाल है। अरे, इस मामले में जेल का सारा स्टाफ बदल दिया जाएगा-बड़े साहब से लेकर छोटे जमादार तक। लोग तनज़्जुल होंगे, सो अलग।' इसी समय रामरूप जेल के फाटक से बाहर आता दिखाई पड़ा। सबकी नज़र उस पर पड़ी। 'वह देखो', एक ने कहा-'वह बाहर आया, ओह, कैसी लाल हैं आज उसकी आँखें। कैसे उसके होंठ फड़क रहे हैं। जरा बुलाओ तो इधर। पूछा जाय कि भीतर क्या हो रहा है।' 'क्या हो रहा है रामरूप?' अपनी ओर बुलाकर वार्डरों ने उससे दरियाफ्त किया-'क्या कलेक्टर के आगे तुम्हारा नाम भी लिया जा रहा है?' 'नहीं बाबू,' उसने दाँत किटकिटा कर कहा-'आप लोगों की दया से मेरा नाम तो नहीं लिया जा रहा है। वह छोकरा भी इस बारे में चुप है। कुछ बोलता ही नहीं, सिवा इसके कि- हाँ, मैंने ही उस डाकू को भगा दिया है। मैंने ही मारा भी है उस वार्डर को। मेरी सहायता में और लोग भी थे, मगर मैं उन्हें इस बारे में नहीं फँसाना चाहता। मेरी सज़ा हो, मुझको फाँसी दी जाय, मैं तैयार हूँ।' 'फिर क्या होगा, रामरूप' एक ने पूछा-'लच्छन कैसे दिखाई पड़ते हैं।' 'क्या होगा, इसे आज ही कौन बता सकता है जमादार साहब?' उसने नीरस उत्तर दिया-'अभी तो सरकार उस डाकू और उसके साथियों को पकड़ने की कोशिश करेगी। इसके बाद उस साले भिखमंगे को फाँसी दी जाएगी, इसमें कोई सन्देह नहीं, वह पाजी जरूर फाँसी पर लटकाया जाएगा। मैं फाँसी पाने वालों की आँखें पहचान जाता हूँ और सच कहता हूँ कि भैरव बाबा की दया से मैं उस शैतान के बच्चे को मृत्यु के झूले पर टाँगूँगा।' न जाने क्या विचार कर रामरूप एकाएक उत्तेजित हो उठा- 'इन्हीं हाथों से मैंने अच्छे-अच्छे और बड़े-बड़ों को फाँसी पर टाँग दिया है। सच मानना जमादार साहब, आज तक चार बीस और सात आदमियों को लटका चुका हूँ। अब यह साला आठवाँ होगा, हाँ, हाँ, आठवाँ होगा-आठवाँ होगा।' उत्तेजित रामरूप उस भीड़ से दूर एक ओर तेजी से बड़बड़ाता हुआ बढ़ गया। उस समय उससे कुछ पूछने की हिम्मत न हुई। मगर आश्चर्य की बात तो यह है कि धीरे-धीरे वह क्रूर हृदय जल्लाद उस अलियार को प्यार करने लग गया था। अलियार उस दिन बिलकुल सच कह रहा था। क्योंकि सेशन अदालत से, और किसी प्रामाणिक मुजरिम के अभाव में और प्रमाणों के आधिक्य से, अलियार को फाँसी की सजा सुनाई गई, तब वही रामरूप कुछ ऐसा उत्तेजित हो उठा कि पागल सा हो गया। 'हा हा हा हा?' वह अदालत के बाहर ही निस्संकोच बड़बड़ाने लगा-'अब लूँगा-अब बच्चू से लूँगा बदला। क्यों न लूँ बदला उससे? मैंन सरकारी हुक्म से उसको, उस दिन बेंत मारे थे, जिसका उसने मुझसे ऐसा भयानक बदला लिया है। मेरी रोजी मारते-मारते बचा। वह तो बचा ही, उस पापी ने मेरी औरत को अपने प्रेम में खाट पकड़वा दी है। अब भोगो बेटे, अब झूलो पालना बच्चू। हा हा हा हा।' यद्यपि अलियार की फाँसी की सजा सुन कर जल्लाद अट्टहास कर उठा, पर मेरा तो कलेजा धक् से होकर रह गया। मुझको ऐसी आशा नहीं थी कि जिस कहानी का आरम्भ, उस दिन जेल के कोने में, अलियार और जल्लाद से मेरे परिचित होने से हुआ था, उसका अन्त ऐसा वीभत्स होगा। मैंने बड़े दुख के साथ, उस दिन यह निश्चय किया कि अब मैं कभी उस रामरूप के सामने न जाऊँगा। मगर संयोग को कौन टाल सकता है? जिस दिन अलियार को दुनिया के उस पार फेंक देने का निश्चय हो गया था, उससे एक दिन पूर्व मैंने उसको अन्तिम बार पुनः देखा। हाथ में एक हाँडी लिए परम उत्तेजित भाव से वह शहर की एक चौमुहानी पर खड़ा था और उसको घेरे हुए लड़कों, युवकों और बेकारों की एक भीड़ खड़ी थी। अजीब-अजीब प्रश्न लोग उस पर बरसा रहे थे और वह उनके रोमांचकारी उत्तर दे रहा था। किसी ने पूछा-'तुम कौन हो भाई...' 'मैं?' वह मुस्कराया-'मैं महापुरुष हूँ। आह, पर अफसोस, तुम नहीं जानते कि मैं महापुरुष क्योंकर हो सकता हूँ, क्योंकि मैं तो खानदानी जल्लाद रामरूप हूँ। पर अफसोस, तुम नहीं जानते कि प्रत्येक जल्लाद महापुरुष होता है।' 'अच्छा यार,'एक ने कहा-'हमने मान लिया कि तुम महापुरुष हो। पर यह तो बताओ कि आज यहाँ' इस तरह क्यों खड़े हो?' 'यह हाँडी,' उसने हाँडी का मुँह भीड़ के सामने किया-इसमें फाँसी की रस्सी है जरूर, यह असली नहीं है। असली रस्सी तो दुरुस्त करके आज ही जेल में ऐसे ही एक बरतन में रख आया हूँ। वह रस्सी इससे कहीं सुन्दर, कहीं मजबूत है। इसको तो केवल अभ्यास के लिए अपने साथ लेता आया हूँ। आज रात भर इन उस्ताद हाथों को फाँसी देने का अभ्यास जोर-शोर से कराऊँगा। क्योंकि इस बार मामूली आदमी को नहीं लटकाना है। इस बार उसको लटकाना है, जिसके झूलते ही कोई आश्चर्य नहीं, जो मेरी औरतिया भी इस दुनिया से कूच कर जाये, क्योंकि वह उस पापी को प्यार करती है। किसी ने कहा-जरा अपने गले में इस रस्सी को लगा कर दिखाओ तो रामरूप कि फाँसी की गाँठ कैसे दी जाती है? 'हाँ, हाँ' उसने रस्सी को अपने गले में चारों ओर लपेट कर, गाँठ देना शुरू किया। 'यह देखो, यह गले का कण्ठ है और यह है मेरी मृत्यु-गाँठ। बस, अब केवल चबूतरे पर खड़ाकर झुला देने की कसर है। जहाँ एक झटका दिया कि बच्चू गए जग-धाम। यह देखो...यह देखो...।' अपने गले में उस रस्सी को उसी तरह लपेटे वह उन्मत्त रामरूप हाँडी फेंक कर, भीड़ को चीरता हुआ एक ओर बेतहाशा भाग गया। दूसरे दिन अलियार को फाँसी देने के लिए जब सशस्त्र पुलिस, मैजिस्ट्रेट, जेल-सुपरिन्टेंडेंट और अन्य अधिकारी एकत्र हुए तो मालूम हुआ कि जल्लाद रामरूप हाजिर नहीं है। पुलिस दौड़ी, जेल के वार्डर दौड़े, उसको ढूँढने के लिए। मगर वह मिल न सका। न जाने कहाँ गायब हो गया। अलियार को उस दिन फाँसी नहीं हो सकी। मगर उसी दिन दोपहर को कुछ लोगों ने रामरूप को शहर के बाहर एक बरगद की डाल में, फाँसी पर टँगे देखा। उसकी गर्दन में वही रस्सी थी, जिसको कुछ घण्टे पूर्व शहर के अनेक लोगों ने उसके हाथ में देखा था। उस समय भी उसकी आँखें खुली, भयानक और नीरस थीं। जीभ मुँह से कोई बारह अंगुल बाहर निकल आई थी कि बड़े-बड़े हिम्मती तक उसकी ओर देख कर दहल उठते थे।
उग्र जी की चर्चित आत्मकथा ''अपनी खबर'' का एक अंश आज जिन्दगी के साठ साल सकुशल समाप्त हो जाने के उपलक्ष्य में उन्हें, जो कि मुझे कम या बेश जानते हैं, अपने जीवन के आरंभिक बीस बरसों की घटनाओं से कसमसाती कहानी सुनाना चाहता हूँ। विक्रमीय संवत् के 1957 वें वर्ष के पौष शुक्ल अष्टमी की रात साढ़े आठ बजे मेरा जन्म यू.पी. के मिर्ज़ापुर ज़िले की चुनार तहसील के सद्दूपुर नामक मुहल्ले में बैजनाथ पाँडे नामक कौशिक गोत्रोत्पन्न सरयूपारीण ब्राह्मण के घर पर हुआ। मेरी माता का नाम जयकली, जिसे बिगाड़कर लोग ‘जयकल्ली’ पुकारते थे। मेरे पिता तेजस्वी, सतोगुणी,वैष्णव-हृदय के थे। मेरी माता ब्राह्मणी होने के बावजूद परम उग्र, कराल-क्षत्राणी स्वभाव की थीं। मेरे एक दर्जन बहन-भाई थे जिनमें अधिकतर पैदा होते ही या साल-दो साल के होते-होते प्रभु के प्यारे हो गए थे। पहले भाइयों के नाम उमाचरण, देवीचरण, श्रीचरण, श्यामाचरण, रामाचरण आदि थें। इनमें अधिकतर बच्चे दग़ा दे गए थे, अत: मेरे जन्म पर कोई ख़ास उत्साह नहीं प्रकट किया गया। शायद थाली भी न बजाई गई हो, नौबत और शहनाई तो दूर की बात। मैं भी कहीं दिवंगत अग्रेजों की राह न लगूँ, अत: तय यह पाया कि पहले तो मेरी जन्म-कुंडली न बनाई जाए, साथ ही जन्मते ही मुझे बेच दिया जाए। सो, जन्मते ही मुझे यारों ने बेच डाला। और किस क़ीमत पर? महज़ टके पर एक! उसका भी गुड़ मँगाकर मेरी माँ ने खा लिया था। अपने पल्ले उस पर टके में से एक छदाम नहीं पड़ा था, जो मेरे जीवन का संपूर्ण दाम था। अलबत्ता ‘जन्मजात बिका’ का बिल्ला-जैसा नाम तौक की तरह गले मढ़ा गया— बेचन! बेचन नाम ऐसा नहीं, जिसे ओमप्रकाश की तरह भारत-प्रचलित कहा जाए। यह तो उत्तर भारत के पूरबी ज़िलों में चलनेवाला नाम है, सो भी अहीरों, कोरियों, तथाकथित निम्न-वर्गीयों में प्रचलित। ब्राह्मण के घर में पैदा होने पर भी मुझे यह जो मंद नाम बख्शा गया. उसकी बुनियाद में मेरी बहबूदी, जिन्दगी-दराज़ की कामना ही थी। किसी भी नाम से बेटा जिए तो! आज जीवन के 60वें साल में मैं साधिकार कह सकता हूँ कि मुझे ही नहीं, मौत को भी यह नाम नापसन्द है। लेकिन, अब, इस उम्र में तो ऐसा लगता है यह नाम नहीं, तिलस्मी गंडा है, जिसके आगे काल काहथकंडा भी नहीं चल पा रहा है। इस तरह—मैं शिकायत नहीं करता—देखिए तो जहाँ मैं पैदा हुआ वह परिवार तो ग़रीब था ही, नाम भी मुझे जगन्नाथ, भुवनेश्वर, राजेश्वर, धनीराम, मनीराम, सूर्यनारायण, सुमित्रानंदन, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन जैसा नहीं मिला ! और गोया इससे भी मेरे दुर्भाग्य को संतोष नहीं हुआ तो मैंने अभी तुतलाना भी नहीं सीखा था कि पिता का स्वर्गवास हो गया। इसके बाद मैं अपने बड़े भाई के अंडर में आया , जो विवाहित थे और पिता के बाद घर के पालक थे। मेरे बड़े भाई ने विधि से कुछ भी पढ़ा नहीं था, फिर भी बुद्धि उनकी ऐसी तीव्र थी कि वह हिंदी तो बहुत ही अच्छी साथ ही संस्कृति और बंगला भी ख़ासी जानते थे; वैद्यक और ज्योंतिष में भी टाँग अड़ाने की योग्यता रखते थे। वह समस्या-पूर्ति-युग के कवि और गद्य-लेखक भी ख़ासे थे। प्रूफ-शोधन तथा पत्रकार-कला से भी उनका घनघोर सम्बन्ध था। मेरे यह बड़े भाई साहब जब जवान थे तभी सनातन धर्म के भाग्य में, परिवार-पद्धति के भाग्य में, सर्वनाश की भूमिका लिखी हुई थी। अतएव जाने-अनजाने युग के साथ भाई साहब को भी इस सर्वनाश नाटक में अपने हाथों पाँव में कुल्हाड़ी मारने का उन्मत्त पार्ट अदा करना पड़ा। हम नज़दीक थे, अत: भाई साहब का काम हमें अधिक दुखदायी एवं बुरा लगा। लगा, दुनिया में उन-जैसा बुरा कोई था ही नहीं। लेकिन ज़रा ही ध्यान से देखने से पता चल जाएगा कि मेरे घर में जो हो रहा था वह अकेले मेरे ही घर का नहीं, कमोबेश समाज के घर-घर का नाटक था। और मैं उस गली की कहानी बतला दूँ जिसमें मैंने जन्म लिया था। सद्दूपुर मुहल्ले की एक गली—बँभन-टोली। गली के इस सिरे से उस सिरे तक ब्राह्मणों ही के मकान एक तरफ़ और दूसरी तरफ़ भी एक तेली तथा दो-तीन कोरियों के घरों को छोड़ बाकी ज़मीनें ब्राह्मणों की। दो-तीन घरों को छोड़ बाक़ी सभी ब्राह्मण खाते-पीते ख़ासे। एकाध तो पूँजीवाले भी। दक्खिनी नाके पर भानुप्रताप तिवारी, जिनके बड़े-बड़े दो-दो मकान। फिर ग़रीब मुसई पाठक, फिर मेरे पिता की योग-क्षेम गृहस्थी, चचा भी हमीं-जैसे लेकिन वैद्य होने से उनके हाथ में कल्पवृक्ष की डाल-जैसी अलौकिक विभूति हमेशा ही रही, जिससे वह प्रभाववाले और अभावहीन थे। इसके बाद हमारे पट्टीदार भाई विन्देश्वरी पाँडे का परिश्रमी, प्रसन्न परिवार। फिर ब्रह्मा मिश्र की हवेली। जयमंगल त्रिपाठी का घर और अंत में बेचू पाँडे का सहन। एक भानुप्रताप तिवारी को छोड़ बाकी सभी ब्राह्मण जजमानी वृत्ति वाले थे। हवेली वाले ब्रह्मा मिश्र की जजमानी सबसे ज्यादा थी। बाग-बगीचे, खेती-बाड़ी, लेन-देन भी होता था। बेचू पाँडे उनके आधे के भागीदार थे। हम लोगों की जजमानी यूँ ही जयसीताराम थी। कहिए हम शानदार भिखारी सड़क पर कपड़े फैला या गलियों में हाथ पसारकर भीख माँगता है, लेकिन हमें ग़रीब और बाह्मण जानकर जाने लोग हमारे घर भीख पहुँचा जाते थे। यह भीख भी शानदार थी, तब तक जब तक बाह्मणों के घर में बाह्मण पैदा होते थे। लेकिन जब ब्राह्मणों के घर में ब्रह्मराक्षस पैदा होने लगे तब तो यह जजमानी वृत्ति नितान्त कमीना धन्धा—सव्यं नीचातिनीच होकर भी दूसरों से चरण पुजवाना—रह गई थी। यह कथा आज से 55 वर्ष पूर्व की है। तभी तथाकथित सनातन धर्म के नाश का आरंभ उसी के अनुगामियों—धर्म के ठेकेदार ब्राह्मणों—द्वारा हो चुका था। मानो तो देव नहीं पत्थर ! धर्म विश्वास पर पनपता है। जिस जनरेशन में मेरे बड़े भाई साहब पैदा हुए थे उसका विश्वास धर्म से उठ रहा था। मुहल्ले के हरेक घर में एक-न-एक ऐसा जवान पैदा हो चुका था जो पुरानी मर्यादाओं और धर्म को ताक पर रखकर उच्छ्श्रृंखल आचरण में रत रहा रहता था। और घरवाले मारे मोह के परिवार के उस प्राणी का विरोध करने में असमर्थ थे। शास्त्रों में विधान है कि कुल-धर्म-विरुद्ध आचरण करनेवाले को सड़ी अँगुली की तरह काटकर समाज-जन से अलग कर देना चाहिए। हम जब तक ऐसा करते रहे तब तक समाज का स्वास्थ्य चुस्त–दुरुस्त था। ग़लतीवश, मोहवश, दुर्भाग्य जब से हमने गलितांग को अपना अंग जानकर काट फेंकने से इनकार कर गले से लगाना शुरू किया है, तभी से विष सारे शरीर में व्याप्त हो गया है। अब से पचास-साठ वर्ष पहले अखिल-भारतीय स्तर पर सहस्र-सहस्र ऐसे ब्रह्मराक्षस पैदा हुए थे, जिन्होंने कुकर्मों के स्लो - पॉयज़न द्वारा मारते-मारते सनातन धर्म को मार ही डाला। इस पूर्णता से कि वह सनातन धर्म तो अब पुन: जागने-जीनेवाला नहीं जिसके सरग़ना ब्राह्मण लोग थे। ब्राह्मण-कुल में मैं भी पैदा हुआ हूँ। कोई पूछ सकता है कि सनातन धर्म या ब्राह्मण धर्म के इस विनाश पर मेरी क्या राय है। मेरी क्या राय हो सकती है? मैं कोई व्यावसायिक ‘राय’ साहब नहीं। जो वस्तु नष्ट होने योग्य होती है, जिसकी उपयोगिता सर्वथा समाप्त हो जाती है, वही नष्ट होती है, उसी का अंत होता है। रहा मेरा बाह्मण-कुल में पैदा होना, सो उसे मैं नियति की भूल मानता हूँ। जब से पैदा हुआ तब से आज तक शूद्र-का-शूद्र हूँ। ‘जन्मना जायते शुद्र’; मनु का वाक्य है कि नहीं— ‘संस्कारात द्विज मुच्यते।’ जन्म से सभी शूद्र होते हैं, बाद को संस्कार द्वारा नव-प्रज्ञा प्राप्त कर द्विज बनते हैं। वह संस्कार पाण्डेय बेचन शर्मा के पल्ले न तो बचपन में पड़ा था, न जवानी में और न आज तक। आदि से आज तक एक दिन भी जो ब्राह्मण रहा हो, उसे फिर मनुष्य-जन्म मिले, फिर टट्टी की हाजत सताए, फिर राम-राम के पहर आबदस्त लेने की घृणित घड़ी उसके हाथ में आए। और अब इस साठ वर्ष की वय में यदि मैं शिकायत करूँ कि हाय रे, मैं सारे जीवन शूद्र-का-शूद्र ही रहा तो, मुझ-सा मतिमंद टॉर्च लाइट लेकर ढूँढ़ने पर भी दुनिया में नहीं मिलेगा। सो, जैस...