मैथिलीशरण गुप्त
परिचय
जन्म: 03 अगस्त 1885 निधन: 12 दिसम्बर 1964 जन्म स्थान
चिरगाँव, झांसी, उत्तर प्रदेश, भारत
कुछ प्रमुख कृतियाँ
महाकाव्य- साकेत
खंड काव्य- जयद्रथ वध, भारत-भारती, पंचवटी, यशोधरा, द्वापर, सिद्धराज, नहुष, अंजलि और अर्ध्य, अजित, अर्जन और विसर्जन, काबा और कर्बला, किसान, कुणाल गीत, गुरु तेग बहादुर, गुरुकुल, जय भारत, झंकार, पृथ्वीपुत्र, मेघनाद वध, नाटक - रंग में भंग, राजा-प्रजा, वन वैभव, विकट भट, विरहिणी व्रजांगना, वैतालिक, शक्ति, सैरन्ध्री, स्वदेश संगीत, हिडिम्बा, हिन्दू अनूदित- मेघनाथ वध, वीरांगना, स्वप्न वासवदत्ता, रत्नावली, रूबाइयात उमर खय्यामपुरस्कार-उपाधि
राज्य सभा सांसद रहे, पद्मभूषण , हिन्दुस्तानी अकादमी पुरस्कार, मंगला प्रसाद पारितोषिक, साहित्य वाचस्पति, डी.लिट्. की उपाधि राष्ट्रकवि,
विशेष
पवित्रता, नैतिकता और परंपरागत मानवीय सम्बन्धों की रक्षा गुप्त जी के काव्य के प्रथम गुण हैं, जो पंचवटी से लेकर जयद्रथ वध, यशोधरा और साकेत तक में प्रतिष्ठित एवं प्रतिफलित हुए हैं। साकेत उनकी रचना का सवोर्च्च शिखर है। मैथिलीशरण गुप्त को साहित्य जगत में 'दद्दा' नाम से सम्बोधित किया जाता था। 'भारत-भारती', मैथिलीशरण गुप्तजी द्वारा स्वदेश प्रेम को दर्शाते हुए वर्तमान और भावी दुर्दशा से उबरने के लिए समाधान खोजने का एक सफल प्रयोग कहा जा सकता है। भारत दर्शन की काव्यात्मक प्रस्तुति 'भारत-भारती' निश्चित रूप से किसी शोध से कम नहीं आंकी जा सकती। गुप्त जी का जन्म पिता सेठ रामचरण कनकने और माता कौशिल्या बाई की तीसरी संतान के रुप में उत्तर प्रदेश में झांसी के पास चिरगांव में हुआ । माता और पिता दोनों ही वैष्णव थे , विद्यालय में खेलकूद में अधिक ध्यान देने के कारण पढ़ाई अधूरी ही रह गयी। घर में ही हिन्दी, बंगला, संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया। 12 वर्ष की अवस्था में ब्रजभाषा में कविता रचना आरम्भ किया । आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आने के बाद खड़ी बोली में लेखन । उनकी कवितायें खड़ी बोली में मासिक "सरस्वती" में प्रकाशित होना प्रारम्भ हो गई । प्रथम काव्य संग्रह "रंग में भंग' तथा बाद में "जयद्रथ वध प्रकाशित हुई। उन्होंने बंगाली के काव्य ग्रन्थ "मेघनाथ वध", "ब्रजांगना" का अनुवाद भी किया। सन् 1914 ई. में राष्टीय भावनाओं से ओत-प्रोत "भारत भारती" का प्रकाशन किया । उनकी लोकप्रियता सर्वत्र फैल गई। इसी समय वे गांधी जी के निकट सम्पर्क में आये । 'यशोधरा' सन् 1932 ई. में लिखी। गांधी जी ने उन्हें "राष्टकवि" की संज्ञा प्रदान की । सन् 1941 ई. में व्यक्तिगत सत्याग्रह के अंतर्गत जेल गये। आगरा विश्वविद्यालय से उन्हें डी.लिट. से सम्मानित किया गया। 1952-1964 तक राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुये। सन् 1953 ई. में भारत सरकार ने उन्हें "पद्म विभूषण' से सम्मानित किया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद ने सन् 1962 ई. में "अभिनन्दन ग्रन्थ' भेंट किया तथा हिन्दू विश्वविद्यालय के द्वारा डी.लिट. से सम्मानित किये गये । 12 दिसम्बर 1964 ई. को दिल का दौरा पड़ा और साहित्य का जगमगाता तारा अस्त हो गया।78 वर्ष की आयु में दो महाकाव्य, 19 खण्डकाव्य, काव्यगीत, नाटिकायें आदि लिखी। उनके काव्य में राष्ट्रीय चेतना, धार्मिक भावना और मानवीय उत्थान प्रतिबिम्बित है। "भारत भारती' के तीन खण्ड में देश का अतीत, वर्तमान और भविष्य चित्रित है। वे मानववादी, नैतिक और सांस्कृतिक काव्यधारा के विशिष्ट कवि थे। प्रस्तुत हैं उनकी कुछ लोकप्रिय रचनाएँनर हो न निराश करो मन को
नर हो न निराश करो मन को कुछ काम करो कुछ काम करो जग में रहके निज नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो न निराश करो मन को । संभलो कि सुयोग न जाए चला कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला समझो जग को न निरा सपना पथ आप प्रशस्त करो अपना अखिलेश्वर है अवलम्बन को नर हो न निराश करो मन को । जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो उठके अमरत्व विधान करो दवरूप रहो भव कानन को नर हो न निराश करो मन को । निज गौरव का नित ज्ञान रहे हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे सब जाय अभी पर मान रहे मरणोत्तर गुंजित गान रहे कुछ हो न तजो निज साधन को नर हो न निराश करो मन को । आर्य
हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है, इसके निवासी आर्य हैं विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े वे आर्य ही थे जो कभी, अपने लिये जीते न थे वे स्वार्थ रत हो मोह की, मदिरा कभी पीते न थे वे मंदिनी तल में, सुकृति के बीज बोते थे सदा परदुःख देख दयालुता से, द्रवित होते थे सदा संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी निश्चेष्ट हो कर किस तरह से, बैठ सकते थे कभी फैला यहीं से ज्ञान का, आलोक सब संसार में जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार में वे मोह बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे स्वाधीन थे सम्पूर्ण सुख संयुक्त थे, वे शांति शिखरासीन थे मन से, वचन से, कर्म से, वे प्रभु भजन में लीन थे विख्यात ब्रह्मानंद नद के, वे मनोहर मीन थे नहुष का पतन
मत्त-सा नहुष चला बैठ ऋषियान में व्याकुल से देव चले साथ में, विमान में पिछड़े तो वाहक विशेषता से भार की अरोही अधीर हुआ प्रेरणा से मार की दिखता है मुझे तो कठिन मार्ग कटना अगर ये बढ़ना है तो कहूँ मैं किसे हटना? बस क्या यही है बस बैठ विधियाँ गढ़ो? अश्व से अडो ना अरे, कुछ तो बढ़ो, कुछ तो बढ़ो बार बार कन्धे फेरने को ऋषि अटके आतुर हो राजा ने सरौष पैर पटके क्षिप्त पद हाय! एक ऋषि को जा लगा सातों ऋषियों में महा क्षोभानल आ जगा भार बहे, बातें सुने, लातें भी सहे क्या हम तु ही कह क्रूर, मौन अब भी रहें क्या हम पैर था या सांप यह, डस गया संग ही पमर पतित हो तु होकर भुंजग ही राजा हतेज हुआ शाप सुनते ही काँप मानो डस गया हो उसे जैसे पिना साँप श्वास टुटने-सी मुख-मुद्रा हुई विकला "हा ! ये हुआ क्या?" यही व्यग्र वाक्य निकला जड़-सा सचिन्त वह नीचा सर करके पालकी का नाल डूबते का तृण धरके शून्य-पट-चित्र धुलता हुआ सा दृष्टि से देखा फिर उसने समक्ष शून्य दृष्टि से दीख पड़ा उसको न जाने क्या समीप सा चौंका एक साथ वह बुझता प्रदीप-सा - "संकट तो संकट, परन्तु यह भय क्या ? दूसरा सृजन नहीं मेरा एक लय क्या ?" सँभला अद्मय मानी वह खींचकर ढीले अंग - "कुछ नहीं स्वप्न था सो हो गया भला ही भंग. कठिन कठोर सत्य तो भी शिरोधार्य है शांत हो महर्षि मुझे, सांप अंगीकार्य है" दुख में भी राजा मुसकराया पूर्व दर्प से मानते हो तुम अपने को डसा सर्प से होते ही परन्तु पद स्पर्श भुल चुक से मैं भी क्या डसा नहीं गया हुँ दन्डशूक से मानता हुँ भुल हुई, खेद मुझे इसका सौंपे वही कार्य, उसे धार्य हो जो जिसका स्वर्ग से पतन, किन्तु गोत्रीणी की गोद में और जिस जोन में जो, सो उसी में मोद में काल गतिशील मुझे लेके नहीं बेठैगा किन्तु उस जीवन में विष घुस पैठेगा फिर भी खोजने का कुछ रास्ता तो उठायेगें विष में भी अमर्त छुपा वे कृति पायेगें मानता हुँ भुल गया नारद का कहना दैत्यों से बचाये भोग धाम रहना आप घुसा असुर हाय मेरे ही ह्रदय में मानता हुँ आप लज्जा पाप अविनय में मानता हुँ आड ही ली मेने स्वाधिकार की मुल में तो प्रेरणा थी काम के विकार की माँगता हुँ आज में शची से भी खुली क्षमा विधि से बहिर्गता में भी साधवी वह ज्यों रमा मानता हुँ और सब हार नहीं मानता अपनी अगाति आज भी मैं जानता आज मेरा भुकत्योजित हो गया है स्वर्ग भी लेके दिखा दूँगा कल मैं ही अपवर्ग भी तन जिसका हो मन और आत्मा मेरा है चिन्ता नहीं बाहर उजेला या अँधेरा है चलना मुझे है बस अंत तक चलना गिरना ही मुख्य नहीं, मुख्य है सँभलना गिरना क्या उसका उठा ही नहीं जो कभी मैं ही तो उठा था आप गिरता हुँ जो अभी फिर भी ऊठूँगा और बढ़के रहुँगा मैं नर हूँ, पुरुष हूँ, चढ़ के रहुँगा मैं चाहे जहाँ मेरे उठने के लिये ठौर है किन्तु लिया भार आज मेने कुछ और है उठना मुझे ही नहीं बस एक मात्र रीते हाथ मेरा देवता भी और ऊंचा उठे मेरे साथ सखि, वे मुझसे कहकर जाते
सखि, वे मुझसे कहकर जाते कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते? मुझको बहुत उन्होंने माना फिर भी क्या पूरा पहचाना? मैंने मुख्य उसी को जाना जो वे मन में लाते। सखि, वे मुझसे कहकर जाते। स्वयं सुसज्जित करके क्षण में प्रियतम को, प्राणों के पण में हमीं भेज देती हैं रण में क्षात्र-धर्म के नाते। सखि, वे मुझसे कहकर जाते। हुआ न यह भी भाग्य अभागा किस पर विफल गर्व अब जागा? जिसने अपनाया था, त्यागा रहे स्मरण ही आते सखि, वे मुझसे कहकर जाते। नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते पर इन से जो आँसू बहते सदय हृदय वे कैसे सहते गये तरस ही खाते सखि, वे मुझसे कहकर जाते। जायें, सिद्धि पावें वे सुख से दुखी न हों इस जन के दुख से उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से आज अधिक वे भाते सखि, वे मुझसे कहकर जाते। गये, लौट भी वे आवेंगे कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे रोते प्राण उन्हें पावेंगे पर क्या गाते-गाते सखि, वे मुझसे कहकर जाते। दोनों ओर प्रेम पलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है सखि पतंग भी जलता है हा दीपक भी जलता हैसीस हिलाकर दीपक कहता बंधु वृथा ही तू क्यों दहता पर पतंग पड़कर ही रहता कितनी विह्वलता है दोनों ओर प्रेम पलता है बचकर हाय पतंग मरे क्या प्रणय छोड़कर प्राण धरे क्या जले नही तो मरा करें क्या क्या यह असफलता है दोनों ओर प्रेम पलता है कहता है पतंग मन मारे तुम महान मैं लघु पर प्यारे क्या न मरण भी हाथ हमारे शरण किसे छलता है दोनों ओर प्रेम पलता है दीपक के जलने में आली फिर भी है जीवन की लाली किन्तु पतंग भाग्य लिपि काली किसका वश चलता है दोनों ओर प्रेम पलता है जगती वणिग्वृत्ति है रखती उसे चाहती जिससे चखती काम नही परिणाम निरखती मुझको ही खलता है दोनों ओर प्रेम पलता है
मनुष्यता
विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी, मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी। हुई न यों सु-मृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए, मरा नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे। उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती, उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती। उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती, तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती। अखंड आत्म भाव जो असीम विश्व में भरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे। सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है वही, वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही। विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा, विनीत लोक वर्ग क्या न सामने झुका रहे? अहा! वही उदार है परोपकार जो करे, वहीं मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे। अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े, समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े-बड़े। परस्परावलम्ब से उठो तथा बढ़ो सभी, अभी अमर्त्य-अंक में अपंक हो चढ़ो सभी। रहो न यों कि एक से न काम और का सरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे। "मनुष्य मात्र बन्धु है" यही बड़ा विवेक है, पुराण पुरुष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है। फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद है, परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं। अनर्थ है कि बंधु हो न बंधु की व्यथा हरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे। चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए, विपत्ति विप्र जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए। घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी, अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी। तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
प्रतिशोध
किसी जन ने किसी से क्लेश पाया नबी के पास वह अभियोग लाया। मुझे आज्ञा मिले प्रतिशोध लूँ मैं। नही निःशक्त वा निर्बोध हूँ मैं। उन्होंने शांत कर उसको कहा यों स्वजन मेरे न आतुर हो अहा यों। चले भी तो कहाँ तुम वैर लेने स्वयं भी घात पाकर घात देने क्षमा कर दो उसे मैं तो कहूँगा तुम्हारे शील का साक्षी रहूँगा दिखावो बंधु क्रम विक्रम नया तुम यहाँ देकर वहाँ पाओ दया तुम।
कुशलगीत
हाँ, निशान्त आया, तूने जब टेर प्रिये, कान्त, कान्त, उठो, गाया--- चौँक शकुन-कुम्भ लिये हाँ, निशान्त गाया । आहा! यह अभिव्यक्ति, द्रवित सार-धार-शक्ति । तृण तृण की मसृण भक्ति भाव खींच लाया । तूने जब टेर प्रिये, "कान्त, उठो" गाया ! मगध वा सूत गये, किन्तु स्वर्ग-दूत नये, तेरे स्वर पूत अये,
अर्जुन की प्रतिज्ञा
उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उसका लगा, मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा । मुख-बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ, प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित हुआ ? युग-नेत्र उनके जो अभी थे पूर्ण जल की धार-से, अब रोश के मारे हुए, वे दहकते अंगार-से । निश्चय अरुणिमा-मिस अनल की जल उठी वह ज्वाल ही, तब तो दृगों का जल गया शोकाश्रु जल तत्काल ही । साक्षी रहे संसार करता हूँ प्रतिज्ञा पार्थ मैं, पूरा करूँगा कार्य सब कथानुसार यथार्थ मैं । जो एक बालक को कपट से मार हँसते हैँ अभी, वे शत्रु सत्वर शोक-सागर-मग्न दीखेंगे सभी । अभिमन्यु-धन के निधन से कारण हुआ जो मूल है, इससे हमारे हत हृदय को, हो रहा जो शूल है, उस खल जयद्रथ को जगत में मृत्यु ही अब सार है, उन्मुक्त बस उसके लिये रौख नरक का द्वार है । उपयुक्त उस खल को न यद्यपि मृत्यु का भी दंड है, पर मृत्यु से बढ़कर न जग में दण्ड और प्रचंड है । अतएव कल उस नीच को रण-मघ्य जो मारूँ न मैं, तो सत्य कहता हूँ कभी शस्त्रास्त्र फिर धारूँ न मैं । अथवा अधिक कहना वृथा है, पार्थ का प्रण है यही, साक्षी रहे सुन ये बचन रवि, शशि, अनल, अंबर, मही । सूर्यास्त से पहले न जो मैं कल जयद्रथ-वधकरूँ, तो शपथ करता हूँ स्वयं मैं ही अनल में जल मरूँ ।
चारु चंद्र की चंचल किरणें
चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में, स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में। पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से, मानों झूम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना, जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर-वीर निर्भीकमना, जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है? भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥ किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये, राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये। बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है, जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है! मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है, तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है। वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी, विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥ कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता; आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता। बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी, मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई- क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा; है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा? बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप, पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप! है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर, रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर। और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है, शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है। सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है, अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है! अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है, पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥ तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात, वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात। अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की। किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की! और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे, व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे। कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक; पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक!
बाल कविता
माँ कह एक कहानी
"माँ कह एक कहानी।" बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?" "कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी? माँ कह एक कहानी।""तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे, तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभि मनमानी।" "जहाँ सुरभि मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।" वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिंदु झिले थे, हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी।" "लहराता था पानी, हाँ-हाँ यही कहानी।"
भारत माता का मंदिर यह
भारत माता का मंदिर यह समता का संवाद जहाँ, सबका शिव कल्याण यहाँ है पावें सभी प्रसाद यहाँ ।जाति-धर्म या संप्रदाय का, नहीं भेद-व्यवधान यहाँ, सबका स्वागत, सबका आदर सबका सम सम्मान यहाँ । राम, रहीम, बुद्ध, ईसा का, सुलभ एक सा ध्यान यहाँ, भिन्न-भिन्न भव संस्कृतियों के गुण गौरव का ज्ञान यहाँ । नहीं चाहिए बुद्धि बैर की भला प्रेम का उन्माद यहाँ सबका शिव कल्याण यहाँ है, पावें सभी प्रसाद यहाँ । सब तीर्थों का एक तीर्थ यह ह्रदय पवित्र बना लें हम आओ यहाँ अजातशत्रु बन, सबको मित्र बना लें हम । रेखाएँ प्रस्तुत हैं, अपने मन के चित्र बना लें हम । सौ-सौ आदर्शों को लेकर एक चरित्र बना लें हम । बैठो माता के आँगन में नाता भाई-बहन का समझे उसकी प्रसव वेदना वही लाल है माई का एक साथ मिल बाँट लो अपना हर्ष विषाद यहाँ सबका शिव कल्याण यहाँ है पावें सभी प्रसाद यहाँ । मिला सेव्य का हमें पुज़ारी सकल काम उस न्यायी का मुक्ति लाभ कर्तव्य यहाँ है एक एक अनुयायी का कोटि-कोटि कंठों से मिलकर उठे एक जयनाद यहाँ सबका शिव कल्याण यहाँ है पावें सभी प्रसाद यहाँ ।
मातृभूमि
नीलांबर परिधान हरित तट पर सुन्दर है। सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥ नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं। बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है॥ करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की। हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥ जिसके रज में लोट-लोट कर बड़े हुये हैं। घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुये हैं॥ परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये। जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाये॥ हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में। हे मातृभूमि! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में? पा कर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा। तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा? तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है। बस तेरे ही सुरस-सार से सनी हुई है॥ फिर अन्त समय तू ही इसे अचल देख अपनायेगी। हे मातृभूमि! यह अन्त में तुझमें ही मिल जायेगी॥ निर्मल तेरा नीर अमृत के से उत्तम है। शीतल मंद सुगंध पवन हर लेता श्रम है॥ षट्ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है। हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है॥ शुचि-सुधा सींचता रात में, तुझ पर चन्द्रप्रकाश है। हे मातृभूमि! दिन में तरणि, करता तम का नाश है॥ सुरभित, सुन्दर, सुखद, सुमन तुझ पर खिलते हैं। भाँति-भाँति के सरस, सुधोपम फल मिलते है॥ औषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली। खानें शोभित कहीं धातु वर रत्नों वाली॥ जो आवश्यक होते हमें, मिलते सभी पदार्थ हैं। हे मातृभूमि! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं॥ क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है। सुधामयी, वात्सल्यमयी, तू प्रेममयी है॥ विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुःखहर्त्री है। भय निवारिणी, शान्तिकारिणी, सुखकर्त्री है॥ हे शरणदायिनी देवि, तू करती सब का त्राण है। हे मातृभूमि! सन्तान हम, तू जननी, तू प्राण है॥ जिस पृथ्वी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे। उससे हे भगवान! कभी हम रहें न न्यारे॥ लोट-लोट कर वहीं हृदय को शान्त करेंगे। उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे॥ उस मातृभूमि की धूल में, जब पूरे सन जायेंगे। होकर भव-बन्धन- मुक्त हम, आत्म रूप बन जायेंगे॥
किसान
हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम हैहो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में अधपेट खाकर फिर उन्हें है काँपना हेमंत में बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है
गुणगान
तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किसमें हो कर आऊं मैं? सब द्वारों पर भीड़ मची है, कैसे भीतर जाऊं मैं?द्बारपाल भय दिखलाते हैं, कुछ ही जन जाने पाते हैं, शेष सभी धक्के खाते हैं, क्यों कर घुसने पाऊं मैं? तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किसमें हो कर आऊं मैं? तेरी विभव कल्पना कर के, उसके वर्णन से मन भर के, भूल रहे हैं जन बाहर के कैसे तुझे भुलाऊं मैं? तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किसमें हो कर आऊं मैं? बीत चुकी है बेला सारी, किंतु न आयी मेरी बारी, करूँ कुटी की अब तैयारी, वहीं बैठ गुन गाऊं मैं। तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किसमें हो कर आऊं मैं? कुटी खोल भीतर जाता हूँ तो वैसा ही रह जाता हूँ तुझको यह कहते पाता हूँ- 'अतिथि, कहो क्या लाउं मैं?' तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किसमें हो कर आऊं मैं?