जन्म: 23 सितम्बर 1908
निधन: 24 अप्रैल 1974
जन्म स्थान
ग्राम सिमरिया, जिला बेगूसराय, बिहार, भारत
विशेष 23 सितंबर 1908 को बिहार के मुंगेर ज़िले के सिमरिया गाँव में जन्मे रामधारी सिंह ‘दिनकर’ उस दौर के कवि हैं जब हिन्दी काव्य जगत् से छायावाद अपने अवसान पर था । पटना विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद दिनकर जी ने कुछ दिनों तक एक हाईस्कूल में अध्यापन कार्य किया । उसके बाद अनेक महत्वपूर्ण प्राशासनिक पदों पर रहते हुए आप मुज़फ्फ़रपुर कॉलेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष बने और बाद में भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति बने । सिमरिया की गलियों में आज भी दिनकर जी के बचपन की यादें कुलाचें भरती हैं। अपनी काव्य प्रतिभा के आधार पर गंगा तट का यह लाडला पुत्र पूरे विश्व में हिन्दी के एक चेहरे के रूप में जाना जाता है। रामधारीसिंह दिनकर को राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत, क्रांतिपूर्ण संघर्ष की प्रेरणा देने वाली ओजस्वी कविताओं के कारण असीम लोकप्रियता मिली । उन्हें 'राष्ट्रकवि' नाम से विभूषित किया गया . आपके लेखन में जो वैविध्य है वह केवल विधा के स्तर तक सीमित न रहकर रस के स्तर पर भी अत्यंत व्यापक है। एक ओर उर्वशी जैसी विशुध्द शृंगारी रचना और दूसरी ओर कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी और परशुराम की प्रतिज्ञा जैसी अग्निमुखी रचनाएँ। शोध करने चले तो ‘संस्कृति के चार अध्याय’ सरीखा अद्भुत ग्रंथ रच डाला । ।भारत के स्वतंत्र होने के पश्चात दिनकरजी मुख्य रूप से गद्य सृजन की ओर उन्मुख हो गए। उन्होंने स्वयं कहा भी है- 'सरस्वती की जवानी कविता है और उसका बुढ़ापा दर्शन है।' राष्ट्रभाषा की समस्या पर राष्ट्रकवि दिनकरजी का हृदय बहुत चिंतित था। उन्होंने इस विषय पर दो पुस्तकें लिखी हैं। 'राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता' तथा 'राष्ट्रभाषा आंदोलन और गाँधीजी।' दिनकर का कथन है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा इसलिए माना गया कि केवल वही भारत की सांस्कृतिक एकता व राजनीतिक अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने में समर्थ है। इन्होंने साहित्य की दोनों विधाओं में प्रचुर एवं महत्वपूर्ण लेखन किया . गद्य रचनाएँ : मिट्टी की ओर, अर्धनारीश्वर, रेती के फूल, वेणुवन, साहित्यमुखी, काव्य की भूमिका, प्रसाद पंत और मैथिलीशरणगुप्त, संस्कृति के चार अध्याय। पद्य रचनाएँ : रेणुका, हुंकार, रसवंती, कुरूक्षेत्र, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतिज्ञा, उर्वशी, हारे को हरिनाम। 'अर्धनारीश्वर', 'रेती के फूल', 'वेणुवन', 'वटपीपल', 'आधुनिक बोध', 'धर्म नैतिकता और विज्ञान' आदि दिनकरजी के ऐसे निबंध संग्रह हैं, जिनमें उन्होंने आधुनिकता और परंपरा, धर्म और विज्ञान, नैतिकता, राष्ट्रीयता-अंतरराष्ट्रीयता आदि विषयों के साथ काम, प्रेम, ईर्ष्या जैसी मनोवृत्तियों पर बड़ी गहराई से चिंतन किया है। दिनकर जी को भारत सरकार ने पद्मविभूषण से अलंकृत किया । '' संस्कृति के चार अध्याय'' के लिए दिनकर जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा उर्वशी के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कर प्रदान किए गए। २४ अप्रैल १९७४ को दिनकर जी का स्वर्गवास हुआ । आप के लिए दिनकर जी की कुछ चर्चित रचनाएँ - कविताएँ समर शेष है ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो , किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो ? किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से , भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से ? कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान ? तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान । फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले ! ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले ! सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है , दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है । मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार , ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार । वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज? अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है ? तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है ? सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में ? उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में ? समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा | समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं | कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना , सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे मंदिर औ' मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे || समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध | जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध ||
आग की भीख धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा, कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा। कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है; मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है? दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे, बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे। प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ। चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ। बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है, कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है? मँझधार है, भँवर है या पास है किनारा? यह नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा? आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा, भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा। तम-बेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ। ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ। आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है, बल-पुँज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है, अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ ढेर हो रहा है, है रो रही जवानी, अन्धेर हो रहा है। निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है। निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है। पंचास्य-नाद भीषण, विकराल माँगता हूँ। जड़ता-विनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ। मन की बँधी उमंगें असहाय जल रही हैं, अरमान-आरज़ू की लाशें निकल रही हैं। भीगी-खुली पलों में रातें गुज़ारते हैं, सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं। इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे, पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे। उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ। विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ। आँसू-भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे, मेरे श्मशान में आ श्रृंगी जरा बजा दे; फिर एक तीर सीनों के आर-पार कर दे, हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे। आमर्ष को जगाने वाली शिखा नई दे, अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे। विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ। बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ। ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे, जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे। गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे। इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे। हम दे चुके लहू हैं, तू देवता विभा दे, अपने अनल-विशिख से आकाश जगमगा दे। प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ, तेरी दया विपद् में भगवान, माँगता हूँ।
कलम, आज उनकी जय बोल जला अस्थियाँ बारी-बारी चिटकाई जिनमें चिंगारी, जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर लिए बिना गर्दन का मोल कलम, आज उनकी जय बोल। जो अगणित लघु दीप हमारे तूफानों में एक किनारे, जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल कलम, आज उनकी जय बोल। पीकर जिनकी लाल शिखाएँ उगल रही सौ लपट दिशाएं, जिनके सिंहनाद से सहमी धरती रही अभी तक डोल कलम, आज उनकी जय बोल। अंधा चकाचौंध का मारा क्या जाने इतिहास बेचारा, साखी हैं उनकी महिमा के सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल कलम, आज उनकी जय बोल।
शक्ति और क्षमा क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल सबका लिया सहारा पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो, कहाँ, कब हारा? क्षमाशील हो रिपु-समक्ष तुम हुये विनत जितना ही दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही। अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है पौरुष का आतंक मनुज कोमल होकर खोता है। क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो उसको क्या जो दंतहीन विषरहित, विनीत, सरल हो। तीन दिवस तक पंथ मांगते रघुपति सिन्धु किनारे, बैठे पढ़ते रहे छन्द अनुनय के प्यारे-प्यारे। उत्तर में जब एक नाद भी उठा नहीं सागर से उठी अधीर धधक पौरुष की आग राम के शर से। सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि करता आ गिरा शरण में चरण पूज दासता ग्रहण की बँधा मूढ़ बन्धन में। सच पूछो, तो शर में ही बसती है दीप्ति विनय की सन्धि-वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की। सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है।
वीर सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं सच् है , विपत्ति जब आती है , कायर को ही दहलाती है , सूरमा नहीं विचलित होते , क्षण एक नहीं धीरज खोते , विघ्नों को गले लगाते हैं , कांटों में राह बनाते हैं । मुहँ से न कभी उफ़ कहते हैं , संकट का चरण न गहते हैं , जो आ पड़ता सब सहते हैं , उद्योग - निरत नित रहते हैं , शुलों का मूळ नसाते हैं , बढ़ खुद विपत्ति पर छाते हैं । है कौन विघ्न ऐसा जग में , टिक सके आदमी के मग में ? ख़म ठोंक ठेलता है जब नर पर्वत के जाते पाव उखड़ , मानव जब जोर लगाता है , पत्थर पानी बन जाता है । गुन बड़े एक से एक प्रखर , हैं छिपे मानवों के भितर , मेंहदी में जैसी लाली हो , वर्तिका - बीच उजियाली हो , बत्ती जो नहीं जलाता है , रोशनी नहीं वह पाता है ।
रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है! उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है। जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ? मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते; और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते। आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का; आज उठता और कल फिर फूट जाता है; किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो? बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है। मैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली, देख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू? स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी? आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू? मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते, आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ, और उस पर नींव रखती हूँ नये घर की, इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ। मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी कल्पना की जीभ में भी धार होती है, वाण ही होते विचारों के नहीं केवल, स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है। स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे, "रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे, रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को, स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।"
स्वाधीनता और रोटी (1)
आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहाँ जुगाएगा ? मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा ? आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं, पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं। (2) हो रहे खड़े आजादी को हर ओर दगा देनेवाले, पशुओं को रोटी दिखा उन्हें फिर साथ लगा लेनेवाले। इनके जादू का जोर भला कब तक बुभुक्षु सह सकता है ? है कौन, पेट की ज्वाला में पड़कर मनुष्य रह सकता है ? (3) झेलेगा यह बलिदान ? भूख की घनी चोट सह पाएगा ? आ पड़ी विपद तो क्या प्रताप-सा घास चबा रह पाएगा ? है बड़ी बात आजादी का पाना ही नहीं, जुगाना भी, बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर-फिर दुहराना भी।
भारत का यह रेशमी नगर भारत धूलों से भरा, आंसुओं से गीला, भारत अब भी व्याकुल विपत्ति के घेरे में. दिल्ली में तो है खूब ज्योति की चहल-पहल, पर, भटक रहा है सारा देश अँधेरे में. रेशमी कलम से भाग्य-लेख लिखनेवालों, तुम भी अभाव से कभी ग्रस्त हो रोये हो? बीमार किसी बच्चे की दवा जुटाने में, तुम भी क्या घर भर पेट बांधकर सोये हो? असहाय किसानों की किस्मत को खेतों में, कया जल मे बह जाते देखा है? क्या खाएंगे? यह सोच निराशा से पागल, बेचारों को नीरव रह जाते देखा है? देखा है ग्रामों की अनेक रम्भाओं को, जिन की आभा पर धूल अभी तक छायी है? रेशमी देह पर जिन अभागिनों की अब तक रेशम क्या? साड़ी सही नहीं चढ़ पायी है. पर तुम नगरों के लाल, अमीरों के पुतले, क्यों व्यथा भाग्यहीनों की मन में लाओगे? जलता हो सारा देश, किन्तु, होकर अधीर तुम दौड़-दौड़कर क्यों यह आग बुझाओगे? चिन्ता हो भी क्यों तुम्हें, गांव के जलने से, दिल्ली में तो रोटियां नहीं कम होती हैं धुलता न अश्रु-बुंदों से आंखों से काजल, गालों पर की धूलियां नहीं नम होती हैं. जलते हैं तो ये गांव देश के जला करें, आराम नयी दिल्ली अपना कब छोड़ेगी? या रक्खेगी मरघट में भी रेशमी महल, या आंधी की खाकर चपेट सब छोड़ेगी.
परशुराम की प्रतीक्षा हे वीर बन्धु ! दायी है कौन विपद का ? हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का ? यह गहन प्रश्न; कैसे रहस्य समझायें ? दस-बीस अधिक हों तो हम नाम गिनायें। पर, कदम-कदम पर यहाँ खड़ा पातक है, हर तरफ लगाये घात खड़ा घातक है। घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है, लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है, जिस पापी को गुण नहीं; गोत्र प्यारा है, समझो, उसने ही हमें यहाँ मारा है। जो सत्य जान कर भी न सत्य कहता है, या किसी लोभ के विवश मूक रहता है, उस कुटिल राजतन्त्री कदर्य को धिक् है, यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं वधिक है। चोरों के हैं जो हितू, ठगों के बल हैं, जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं, जो छल-प्रपंच, सब को प्रश्रय देते हैं, या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं; यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है, भारत अपने घर में ही हार गया है। है कौन यहाँ, कारण जो नहीं विपद् का ? किस पर जिम्मा है नहीं हमारे वध का ? जो चरम पाप है, हमें उसी की लत है, दैहिक बल को रहता यह देश ग़लत है. नेता निमग्न दिन-रात शान्ति-चिन्तन में, कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में. यज्ञाग्नि हिन्द में समिध नहीं पाती है, पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है. ओ बदनसीब अन्धो ! कमजोर अभागो ? अब भी तो खोलो नयन, नींद से जागो. वह अघी, बाहुबल का जो अपलापी है, जिसकी ज्वाला बुझ गयी, वही पापी है. जब तक प्रसन्न यह अनल, सुगुण हँसते है; है जहाँ खड्ग, सब पुण्य वहीं बसते हैं. वीरता जहाँ पर नहीं, पुण्य का क्षय है, वीरता जहाँ पर नहीं, स्वार्थ की जय है. तलवार पुण्य की सखी, धर्मपालक है, लालच पर अंकुश कठिन, लोभ-सालक है. असि छोड़, भीरु बन जहाँ धर्म सोता है, पातक प्रचण्डतम वहीं प्रकट होता है. तलवारें सोतीं जहाँ बन्द म्यानों में, किस्मतें वहाँ सड़ती है तहखानों में. बलिवेदी पर बालियाँ-नथें चढ़ती हैं, सोने की ईंटें, मगर, नहीं कढ़ती हैं. पूछो कुबेर से, कब सुवर्ण वे देंगे ? यदि आज नहीं तो सुयश और कब लेंगे ? तूफान उठेगा, प्रलय-वाण छूटेगा, है जहाँ स्वर्ण, बम वहीं, स्यात्, फूटेगा. जो करें, किन्तु, कंचन यह नहीं बचेगा, शायद, सुवर्ण पर ही संहार मचेगा। हम पर अपने पापों का बोझ न डालें, कह दो सब से, अपना दायित्व सँभालें. कह दो प्रपंचकारी, कपटी, जाली से, आलसी, अकर्मठ, काहिल, हड़ताली से, सी लें जबान, चुपचाप काम पर जायें, हम यहाँ रक्त, वे घर में स्वेद बहायें. हम दें उस को विजय, हमें तुम बल दो, दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो. हों खड़े लोग कटिबद्ध वहाँ यदि घर में, है कौन हमें जीते जो यहाँ समर में ? हो जहाँ कहीं भी अनय, उसे रोको रे ! जो करें पाप शशि-सूर्य, उन्हें टोको रे ! जा कहो, पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में, या आग सुलगती रही प्रजा के मन में; तामस बढ़ता यदि गया ढकेल प्रभा को, निर्बन्ध पन्थ यदि मिला नहीं प्रतिभा को, रिपु नहीं, यही अन्याय हमें मारेगा, अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा.
हिमालय मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार, दिव्य, गौरव विराट्, पौरूष के पुन्जीभूत ज्वाल! मेरी जननी के हिम-किरीट! मेरे भारत के दिव्य भाल! मेरे नगपति! मेरे विशाल! युग-युग अजेय, निर्बन्ध, मुक्त, युग-युग गर्वोन्नत, नित महान, निस्सीम व्योम में तान रहा युग से किस महिमा का वितान? कैसी अखंड यह चिर-समाधि? यतिवर! कैसा यह अमर ध्यान? तू महाशून्य में खोज रहा किस जटिल समस्या का निदान? उलझन का कैसा विषम जाल? मेरे नगपति! मेरे विशाल! ओ, मौन, तपस्या-लीन यती! पल भर को तो कर दृगुन्मेष! रे ज्वालाओं से दग्ध, विकल है तड़प रहा पद पर स्वदेश। सुखसिंधु, पंचनद, ब्रह्मपुत्र, गंगा, यमुना की अमिय-धार जिस पुण्यभूमि की ओर बही तेरी विगलित करुणा उदार, जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त सीमापति! तू ने की पुकार, 'पद-दलित इसे करना पीछे पहले ले मेरा सिर उतार।' उस पुण्यभूमि पर आज तपी! रे, आन पड़ा संकट कराल, व्याकुल तेरे सुत तड़प रहे डस रहे चतुर्दिक विविध व्याल। मेरे नगपति! मेरे विशाल! कितनी मणियाँ लुट गईं? मिटा कितना मेरा वैभव अशेष! तू ध्यान-मग्न ही रहा, इधर वीरान हुआ प्यारा स्वदेश। वैशाली के भग्नावशेष से पूछ लिच्छवी-शान कहाँ? ओ री उदास गण्डकी! बता विद्यापति कवि के गान कहाँ? तू तरुण देश से पूछ अरे, गूँजा कैसा यह ध्वंस-राग? अम्बुधि-अन्तस्तल-बीच छिपी यह सुलग रही है कौन आग? प्राची के प्रांगण-बीच देख, जल रहा स्वर्ण-युग-अग्निज्वाल, तू सिंहनाद कर जाग तपी! मेरे नगपति! मेरे विशाल! रे, रोक युधिष्ठिर को न यहाँ, जाने दे उनको स्वर्ग धीर, पर, फिर हमें गाण्डीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर। कह दे शंकर से, आज करें वे प्रलय-नृत्य फिर एक बार। सारे भारत में गूँज उठे, 'हर-हर-बम' का फिर महोच्चार। ले अंगडाई हिल उठे धरा कर निज विराट स्वर में निनाद तू शैलीराट हुँकार भरे फट जाए कुहा, भागे प्रमाद तू मौन त्याग, कर सिंहनाद रे तपी आज तप का न काल नवयुग-शंखध्वनि जगा रही तू जाग, जाग, मेरे विशाल
नील कुसुम ‘‘है यहाँ तिमिर, आगे भी ऐसा ही तम है, तुम नील कुसुम के लिए कहाँ तक जाओगे ? जो गया, आज तक नहीं कभी वह लौट सका, नादान मर्द ! क्यों अपनी जान गँवाओगे ? प्रेमिका ! अरे, उन शोख़ बुतों का क्या कहना ! वे तो यों ही उन्माद जगाया करती हैं; पुतली से लेतीं बाँध प्राण की डोर प्रथम, पीछे चुम्बन पर क़ैद लगया करती हैं। इनमें से किसने कहा, चाँद से कम लूँगी ? पर, चाँद तोड़ कर कौन मही पर लाया है ? किसके मन की कल्पना गोद में बैठ सकी ? किसकी जहाज़ फिर देश लौट कर आया है ?’’ ओ नीतिकार ! तुम झूठ नहीं कहते होगे, बेकार मगर, पागलों को ज्ञान सिखाना है; मरने का होगा ख़ौफ़, मौत की छाती में जिसको अपनी ज़िन्दगी ढूँढ़ने जाना है ? औ’ सुना कहाँ तुमने कि ज़िन्दगी कहते हैं, सपनों ने देखा जिसे, उसे पा जाने को ? इच्छाओं की मूर्तियाँ घूमतीं जो मन में, उनको उतार मिट्टी पर गले लगाने को ? ज़िन्दगी, आह ! वह एक झलक रंगीनी की, नंगी उँगली जिसको न कभी छू पाती है, हम जभी हाँफते हुए चोटियों पर चढ़ते, वह खोल पंख चोटियाँ छोड़ उड़ जाती है। रंगीनी की वह एक झलक, जिसके पीछे है मच हुई आपा-आपी मस्तानों में, वह एक दीप जिसके पीछे है डूब रहीं दीवानों की किश्तियाँ कठिन तूफ़ानों में। डूबती हुई किश्तियाँ ! और यह किलकारी ! ओ नीतिकार ! क्या मौत इसी को कहते हैं ? है यही ख़ौफ़, जिससे डरकर जीनेवाले पानी से अपना पाँव समेटे रहते हैं ? ज़िन्दगी गोद में उठा-उठा हलराती है आशाओं की भीषिका झेलनेवालों को; औ; बड़े शौक़ से मौत पिलाती है जीवन अपनी छाती से लिपट खेलनेवालों को। तुम लाशें गिनते रहे खोजनेवालों की, लेकिन, उनकी असलियत नहीं पहचान सके; मुरदों में केवल यही ज़िन्दगीवाले थे जो फूल उतारे बिना लौट कर आ न सके। हो जहाँ कहीं भी नील कुसुम की फुलवारी, मैं एक फूल तो किसी तरह ले जाऊँगा, जूडे में जब तक भेंट नहीं यह बाँध सकूँ, किस तरह प्राण की मणि को गले लगाऊँगा ?
कुछ बाल कविताएँ चाँद का कुर्ता हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यह बोला, ‘‘सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला। सनसन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूँ, ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ। आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का, न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही कोई भाड़े का।’’ बच्चे की सुन बात कहा माता ने, ‘‘अरे सलोने! कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने। जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ, एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ। कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा, बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा। घटता-बढ़ता रोज किसी दिन ऐसा भी करता है, नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है। अब तू ही ये बता, नाप तेरा किस रोज़ लिवाएँ, सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए?’’
सूरज का ब्याह उड़ी एक अफवाह, सूर्य की शादी होने वाली है, वर के विमल मौर में मोती उषा पिराने वाली है। मोर करेंगे नाच, गीत कोयल सुहाग के गाएगी, लता विटप मंडप-वितान से वंदन वार सजाएगी! जीव-जन्तु भर गए खुशी से, वन की पाँत-पाँत डोली, इतने में जल के भीतर से एक वृद्ध मछली बोली- ‘‘सावधान जलचरो, खुशी में सबके साथ नहीं फूलो, ब्याह सूर्य का ठीक, मगर, तुम इतनी बात नहीं भूलो। एक सूर्य के ही मारे हम विपद कौन कम सहते हैं, गर्मी भर सारे जलवासी छटपट करते रहते हैं। अगर सूर्य ने ब्याह किय, दस-पाँच पुत्र जन्माएगा, सोचो, तब उतने सूर्यों का ताप कौन सह पाएगा? अच्छा है, सूरज क्वाँरा है, वंश विहीन, अकेला है, इस प्रचंड का ब्याह जगत की खातिर बड़ा झमेला है।’’
चूहे की दिल्ली यात्रा चूहे ने यह कहा कि चूहिया! छाता और घड़ी दो, लाया था जो बड़े सेठ के घर से, वह पगड़ी दो। मटर-मूँग जो कुछ घर में है, वही सभी मिल खाना, खबरदार, तुम लोग कभी बिल से बाहर मत आना! बिल्ली एक बड़ी पाजी है रहती घात लगाए, जाने वह कब किसे दबोचे, किसको चट कर जाए। सो जाना सब लोग लगाकर दरवाजे में किल्ली, आज़ादी का जश्न देखने मैं जाता हूँ दिल्ली। चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ, दिल्ली में देखूँगा आज़ादी का नया जमाना, लाल किले पर खूब तिरंगे झंडे का लहराना। अब न रहे, अंग्रेज, देश पर अपना ही काबू है, पहले जहाँ लाट साहब थे वहाँ आज बाबू है! घूमूँगा दिन-रात, करूँगा बातें नहीं किसी से, हाँ फुर्सत जो मिली, मिलूँगा जरा जवाहर जी से। गाँधी युग में कैन उड़ाए, अब चूहों की खिल्ली? आज़ादी का जश्न देखने मेैं जाता हूँ दिल्ली। चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ, पहन-ओढ़कर चूहा निकला चुहिया को समझाकर, इधर-उधर आँखें दौड़ाईं बिल से बाहर आकर। कोई कहीं नहीं था, चारों ओर दिशा थी सूनी, शुभ साइत को देख हुई चूहे की हिम्तत दूनी। चला अकड़कर, छड़ी लिये, छाते को सिर पर ताने, मस्ती मन की बढ़ी, लगा चूँ-चूँ करके कुछ गाने! इतने में लो पड़ी दिखाई कहीं दूर पर बिल्ली, चूहेराम भगे पीछे को, दूर रह गई दिल्ली। चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ,
मिर्च का मज़ा एक काबुली वाले की कहते हैं लोग कहानी, लाल मिर्च को देख गया भर उसके मुँह में पानी। सोचा, क्या अच्छे दाने हैं, खाने से बल होगा, यह जरूर इस मौसम का कोई मीठा फल होगा। एक चवन्नी फेंक और झोली अपनी फैलाकर, कुंजड़िन से बोला बेचारा ज्यों-त्यों कुछ समझाकर! ‘‘लाल-लाल पतली छीमी हो चीज अगर खाने की, तो हमको दो तोल छीमियाँ फकत चार आने की।’’ ‘‘हाँ, यह तो सब खाते हैं’’-कुँजड़िन बेचारी बोली, और सेर भर लाल मिर्च से भर दी उसकी झोली! मगन हुआ काबुली, फली का सौदा सस्ता पाके, लगा चबाने मिर्च बैठकर नदी-किनारे जाके! मगर, मिर्च ने तुरत जीभ पर अपना जोर दिखाया, मुँह सारा जल उठा और आँखों में पानी आया। पर, काबुल का मर्द लाल छीमी से क्यों मुँह मोड़े? खर्च हुआ जिस पर उसको क्यों बिना सधाए छोड़े? आँख पोंछते, दाँत पीसते, रोते औ रिसियाते, वह खाता ही रहा मिर्च की छीमी को सिसियाते! इतने में आ गया उधर से कोई एक सिपाही, बोला, ‘‘बेवकूफ! क्या खाकर यों कर रहा तबाही?’’ कहा काबुली ने-‘‘मैं हूँ आदमी न ऐसा-वैसा! जा तू अपनी राह सिपाही, मैं खाता हूँ पैसा।’’