परिचय
जन्म : 28 जनवरी 1925, पकड़डीहा, गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)
निधन : 14 फरवरी, 2005 भाषा : हिंदी
विधाएँ : कविता, विबंध
मुख्य कृतियाँ
स्वरूप-विमर्श, कितने मोरचे, गांधी का करुण रस, चिड़िया रैन बसेरा, छितवन की छाँह, तुलसीदास भक्ति प्रबंध का नया उत्कर्ष, थोड़ी सी जगह दें, फागुन दुइ रे दिना, बसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं, भारतीय संस्कृति के आधार, भ्रमरानंद का पचड़ा, रहिमन पानी राखिए, राधा माधव रंग रंगी, लोक और लोक का स्वर, वाचिक कविता अवधी, वाचिक कविता भोजपुरी, व्यक्ति-व्यंजना, सपने कहाँ गए, साहित्य के सरोकार, हिंदी साहित्य का पुनरावलोकन, हिंदी और हम, आज के हिंदी कवि-अज्ञेय
सम्मान
पद्म भूषण, पद्मश्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार, कालिदास पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार,राज्यसभा सांसद मनोनीत
निधन : 14 फरवरी, 2005
रचनाएँ कविताएँ
निबंध - ‘सखा धर्ममय अस रथ जाके’
- आहो आहो संझा गोसाइँनि
- कँटीले तारों के आर-पार
- गऊचोरी
- घने नीम तरु तले
- चंद्रमा मनसो जात
- छितवन की छाँह
- जमुना के तीरे-तीरे
- टिकोरा
- तुम चंदन हम पानी
- तांडवं देवि भूयादभीष्ट्यै च हृष्ट् च न:
- दिया टिमटिमा रहा है
- धनवा पियर भइलें मनवा पियर भइलें
- प्यारे हरिचंद की कहानी रहि जाएगी
- बसंत न आवै
- मेरे राम का मुकुट भीग रहा है
- साँची कहौ व्रजराज तुम्हें रतिराज किधौ रितुराज कियौ है
- साँझ भई
- हरसिंगार
- हल्दी-दूब और दधि-अच्छत
- होरहा
विशेष पं. विद्यानिवास मिश्र का जन्म 28 जनवरी 1925 को उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जिले के पकडडीहा गाँव में हुआ था। वाराणसी और गोरखपुर में शिक्षा प्राप्त करने वाले श्री मिश्र ने गोरखपुर विश्वविद्यालय से वर्ष 1960-61 में ‘पाणिनीय व्याकरण की विश्लेषण पद्धति' पर डॉक्टरेट की उपाधि अर्जित की थी। लगभग दस वर्षों तक हिन्दी साहित्य सम्मेलन, रेडियो, विन्ध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के सूचना विभागों में नौकरी के बाद आप गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हुए । कुछ समय के लिए आप अमेरिका गये, वहाँ कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य एवं तुलनात्मक भाषा विज्ञान का अध्यापन किया एवं वाशिंगटन विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य का अध्यापन किया। आपने ‘वाणरासेय संस्कृत विश्वविद्यालय' में भाषा विज्ञान एवं आधुनिक भाषा विज्ञान के आचार्य एवं अध्यक्ष पद पर भी कार्य किया। राष्ट्र ने आपकी साहित्यिक सफलताओं को तरहीज देते हुए राज्य सभा सासंद नियुक्त किया । साथ ही देश ने उनकी सफलताओं और त्याग तथा ईमानदारी के लिए पद्य भूषण सम्मान से भी विभूषित किया। मिश्र जी ‘भारतीय ज्ञानपीठ के न्यासी बोर्ड के सदस्य थे और मूर्ति देवी पुरस्कार चयन समिति के अध्यक्ष सहित ज्ञानपीठ के न्यासी बोर्ड के सदस्य थे। संस्कृत के प्रकांड विद्वान, जाने-माने भाषाविद्, हिन्दी साहित्यकार और सफल सम्पादक (नवभारत टाइम्स) थे। उन्हें सन १९९९ में भारत सरकार ने साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया था । हिन्दी साहित्य के सर्जक विद्यानिवास मिश्र ने साहित्य की ललित निबंध की विधा को नए आयाम दिए। हिन्दी में ललित निबंध की विधा की शुरूआत प्रताप नारायण मिश्र और बालकृष्ण भट्ट ने की थी, किंतु इसे ललित निबंधों का पूर्वाभास कहना ही उचित होगा। ललित निबंध की विधा के लोकप्रिय नामों की बात करें तो हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र एवं कुबेरनाथ राय आदि चर्चित नाम रहे हैं। ललित निबंध परम्परा में ये आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी और कुबेरनाथ राय के साथ मिलकर मिश्र जी एक त्रयी रचते है। पं॰ हजारीप्रसाद द्विवेदी के बाद अगर कोई हिन्दी साहित्यकार ललित निबंधों को वांछित ऊँचाइयों पर ले गया तो हिन्दी जगत में डॉ॰ विद्यानिवास मिश्र का ही जिक्र होता है। आपकी विद्वता से हिन्दी जगत का कोना-कोना परिचित है। आप ने अमेरिका के बर्कले विश्वविद्यालय में भी शोध कार्य किया था तथा वर्ष 1967-68 में वाशिंगटन विश्वविद्यालय में अध्येता रहे थे। म.प्र. में भी सेवारत रहे कुछ समय के लिए। मध्यप्रदेश में सूचना विभाग में कार्यरत रहने के बाद वे अध्यापन के क्षेत्र में आ गए। वे 1968 से 1977 तक वाराणसी के सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में अध्यापक रहे। कुछ वर्ष बाद वे इसी विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। उनकी उपलब्धियों की लंबी श्रृंखला है। लेकिन वे हमेशा अपनी कोमल भावाभिव्यक्ति के कारण सराहे गए हैं। उनके ललित निबंधों की महक साहित्य- जगत में सदैव बनी रहेगी। आप हिन्दी के एक प्रतिष्ठित आलोचक एवं ललित निबन्ध लेखक हैं, साहित्य की इन दोनों ही विधाओं में आपका कोई विकल्प नहीं हैं। निबन्ध के क्षेत्र में मिश्र जी का योगदान सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित किया जाएगा। विद्यानिवास मिश्र के ललित निबन्धों की शुरूवात सन् 1956 ई0 से होती है। परन्तु आपका पहला निबन्ध संग्रह 1976 ई0 में ‘चितवन की छाँह' प्रकाश में आया है। आपने हिन्दी जगत को ललित निबन्ध परम्परा से अवगत कराया। निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि प्रो॰ मिश्र जी का लेखन आधुनिकता की मार देशकाल की विसंगतियों और मानव की यंत्र का चरम आख्यान है जिसमें वे पुरातन से अद्यतन और अद्यतन से पुरातन की बौद्धिक यात्रा करते हैं। ‘‘मिश्र जी के निबन्धों का संसार इतना बहुआयामी है कि प्रकृति, लोकतत्व, बौद्धिकता, सर्जनात्मकता, कल्पनाशीलता, काव्यात्मकता, रम्य रचनात्मकता, भाषा की उर्वर सृजनात्मकता, सम्प्रेषणीयता इन निबन्धों में एक साथ अन्तग्रंर्थित मिलती है। श्री विद्यानिवास मिश्र की हिन्दी और अंग्रेज़ी में दो दर्ज़न से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। इसमें "महाभारत का कव्यार्थ" और "भारतीय भाषादर्शन की पीठिका" प्रमुख हैं। ललित निबंधों में "तुम चंदन हम पानी", "वसंत आ गया" और शोधग्रन्थों में "हिन्दी की शब्द संपदा" चर्चित कृतियां हैं। लोक संस्कृति और लोक मानस उनके ललित निबंधों के अभिन्न अंग थे, उस पर भी पौराणिक कथाओं और उपदेशों की फुहार उनके ललित निबंधों को और अधिक प्रवाहमय बना देते थे। उनके प्रमुख ललित निबंध संग्रह हैं- 'राधा माधव रंग रंगी', 'मेरे राम का मुकुट भीग रहा है', 'शैफाली झर रही है', 'छितवन की छांह', 'बंजारा मन', 'तुम चंदन हम पानी', 'महाभारत का काव्यार्थ', 'भ्रमरानंद के पत्र', 'वसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं' और 'साहित्य का खुला आकाश' आदि आदि। वसंत ऋतु से विद्यानिवास मिश्र को विशेष लगाव था, इसके आलावा स्वरूप-विमर्श, कितने मोरचे, गांधी का करुण रस, चिड़िया रैन बसेरा, छितवन की छाँह, तुलसीदास भक्ति प्रबंध का नया उत्कर्ष, थोड़ी सी जगह दें, फागुन दुइ रे दिना, बसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं, भारतीय संस्कृति के आधार, भ्रमरानंद का पचड़ा, रहिमन पानी राखिए, , लोक और लोक का स्वर, वाचिक कविता अवधी, वाचिक कविता भोजपुरी, व्यक्ति-व्यंजना, सपने कहाँ गए, साहित्य के सरोकार, हिंदी साहित्य का पुनरावलोकन, हिंदी और हम, 'आज के हिंदी कवि-अज्ञेय' प्रमुख कृतियाँ हैं. विद्यानिवास मिश्र का 14 फरवरी, 2005 का सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया। उस वर्ष उनका प्रिय पर्व वसंत पंचमी 13 फरवरी को था। वसंत ऋतु में ही वे अपना शरीर त्यागकर इहलोक की यात्रा पर निकल पड़े। पं. विद्यानिवास मिश्र के इस दुनिया से जाने के बाद भी उनकी पत्रकारिता और साहित्य की सौरभ इस रचनाशील जगत को महकाती रहेगी। पत्रकारीय धर्म और उसकी सीमाओं को लेकर वे सदैव सचेत रहते थे। वे अकसर कहा करते थे कि-‘‘मीडिया का काम नायकों का बखान करना अवश्य है, लेकिन नायक बनाना मीडिया का काम नहीं है।” पने पत्रकारीय जीवन में भी विद्यानिवास मिश्र हिंदी के प्रति आग्रही बने रहे। वे अंग्रेजी के विद्वान थे, लेकिन हिंदी लिखते समय अंग्रेजी के शब्दों का घालमेल उन्हें पसंद नहीं था। मिश्र जी के कुछ प्रसिद्ध निबंध प्रस्तुत हैं--- राम का अयन वन -
निबंध रामकथा पर आधारित वाल्मीकि के ग्रंथ का नाम 'रामायण' देने का कारण क्या है, इसपर विचार-विमर्श करना चाहिए। अयन के दो अर्थ हैं - 'घर' भी है और 'चलना' भी है। राम के घर के बारे में तुलसीदासजी ने एक प्रसंग में कहा है कि वन में पहुँचने पर चित्रकूट वनमाला के द्वार पर वाल्मीकि मिले। उनसे राम ने पूछा कि मैं कहाँ घर बनाऊँ? वाल्मीकि ने उत्तर दिया कि कोई जगह तो नहीं है जहाँ तुम नहीं हो - पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ। जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावाँ ठाउँ।। फिर भी, मेरी दृष्टि में एक ऐसी जगह है जो सर्वथा तुम्हारा घर होने के योग्य है - जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।। भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।। लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलागे।। जहाँ कान हमेशा अतृप्त रहते हों, समुद्र की तरह अपूर, कोटिश: कथा-गंगाएँ आएँ और समुद्र जैसा-का-वैसा आकांक्षी बना रहे। इस रमणीय घर में एक विशेषता और होनी चाहिए। इसमें दूसरे के लिए किसी जगह की गुंजाइश न हो। जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई।। सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई।। जितनी भी वंचनाएँ होती हैं आदमी की- जाति-पाँत, धन-धर्म, बड़प्पन- सबको तजनेवाला मन, तुममें लवलीन रहनेवाला मन तुम्हारा निवास हो। इसके बाद वाल्मीकि ने चित्रकूट का एक रमणीय स्थल बताया है, जहाँ एक छोटी सी नदी है (वाल्मीकि रामायण मैं तो उसका नाम 'माल्यवती' है, तुलसीदास ने उसका नाम 'मंदाकिनी' दिया है)। उसी के किनारे पर्णशाला तैयार हुई। उस पर्णशाला की वास्तु-रचना राम, लक्ष्मण, सीता ने अपने श्रम से की। राम ने उसके लिए वास्तु-यज्ञ किया और तब उसमें प्रविष्ट हुए। पर वस्तुत: उनका घर रामकथा से अतृप्त मन ही बना रहा। वह अतृप्त मन भी असंख्य सहज मनोभावों के बीच में स्वावलंबन पर कहीं टिकता है। इस प्रकार सारा वन ही, वन जैसा सहज हृदय ही, भाँति-भाँति के जीवन का आश्रय मन ही राम का अयन है और हम कह सकते हैं कि वन बना मन या मन बना वन ही राम का अयन है। रामायण का मर्म समझने के लिए इस घर का मर्म समझना पहली शर्त है। अयन का दूसरा अर्थ 'गति' है, चलना है, एक निश्चित उद्देश्य से चलना है। वन में आकर राम पर्णशाला तक अपने को सीमित नहीं रखते, वे वनवासियों तक जाते हैं, उनका सुख-दुख बूझते हैं, वन में तपस्या करनेवाले ऋषियों-मुनियों के पास जाते हैं और उनकी रक्षा का भार भी लेते हैं। पिता द्वारा दिए गए कैकेयी के वचन का पालन तो व्याज था, राम को वन ही में अपना काम करना था। उनका काम है क्या, सिवाय इसके कि संतृप्त लोगों को आश्वासन देना, आश्वस्त लोगों को सविनय प्रीति का उपहार देना। और इस क्रम में वे एक से दूसरे वन को लाँघते-लाँघते दंडक वन में पहुँचते हैं, जहाँ राक्षसों द्वारा खाए गए और आग में पकाए गए ऋषियों की हड्डियाँ बिखरी पड़ी हैं। देखते ही राम का आक्रोश संकल्प बन जाता है कि मैं पृथ्वी को राक्षसविहीन कर दूँगा। वे वन से वन नापते हुए नगर में कभी प्रवेश नहीं करते - न किष्किंधा में प्रवेश करते हैं, न लंका में, वनवासी ही बने रहते हैं। वन से ही युद्ध का संचालन करते हैं, वन की राजनीति का संचालन करते हैं। और जब अयोध्या लौटते हैं तो कुछ ही वर्षों में अयोध्या वन से भी अधिक बनैली हो जाती है तथा एक ऐसा लांछन लगाती हैं कि राम तो अयोध्या में रहते हैं, लेकिन राम का मन, राम के मन और हृदय की अधिष्ठात्री सीता वन के आश्रय में चली जाती हैं। इस प्रकार अयन की पूरी यात्रा वन से वन की यात्रा है, एक तप से दूसरे तप की यात्रा है। एक तप वन में होता है और अंतिम वय का तप नगर में, एक वन बने नगर में होता है। इस प्रकार राम का अयन घर होते हुए भी वन है, गति है। 'रामायण' ग्रंथ की भी रचना वन में हैं, ग्रंथ का पहला पाठ भी वन में हैं, ग्रंथ की फलश्रुति भी यही है कि यह कथा प्रासादों में नहीं, लोक में बिहरेगी, लोकचित्त में बिहरेगी। इस कथा के और अंश जितने भी परिवर्तित रूप में मिलते हों, पर राम का वन में निर्वासन, सीता का अयोध्या लौटने के बाद निष्कासन इस कथा के प्रत्येक संस्करण में हैं। वन को जाती हुई राम-लक्ष्मण-सीता की छवि आज भी लोकचित्त में अंकित हैं। आज भी अनेक क्षेत्रों में, तीर्थयात्रा में इसी वनयात्रा के गीत गाए जाते हैं। प्रत्येक तीर्थयात्रा जैसे राम के पीछे-पीछे चलनेवाले अकिंचनों की ऐसे विजन की यात्रा है, जिसमें आदमी अपरिचित जन में भी स्वजन की पहचान पाता है और विजन सही अर्थों में सजन होता है। इसीलिए मैं कहता हूँ, राम का घर वन है। राम का निरंतर चलते रहना ही उनका जीवन है और जन-जन के पवित्र होने की यात्रा है, पवित्रता की गतिशीलता है। वन घर है तो वन संचरण भी है, जिसमें रास्ते के काँटे, रास्ते के कुश राम और सीता के पैरों में चुभकर धन्य हो जाते हैं। उस स्पर्श से - निराला से शब्द उधार लें तो -उपल 'उत्पल' बन जाते हैं, जो कंटक चुभते हैं वे जागरण बन जाते हैं। वन में संपादित यज्ञ के प्रसाद से राम गर्भ में आते हैं, वन में स्थित विश्वामित्र के आश्रम में राम सांगोपांग वेद की शिक्षा पाते हैं, विवाह का मुदमंगल अधिक दिनों तक नहीं रहता, राज्यभिषेक की चर्चा के अगले दिन ही वन-गमन होता है। राम पद छोड़कर वनगामी होते हैं, राजकुमार से वापस होते हैं ऐसे स्थान में, जहाँ नगर का प्रपंच नहीं है, जहाँ अर्थ की लिप्सा नहीं हैं, जहाँ प्रकृति के मुक्तदान से संतोष हैं, जहाँ छल नहीं है, सहज-सीधा व्यवहार है। वहाँ बीहड़ वन है, जंगली जानवर हैं; पर विचित्र प्रकार का अभय है, कोई किसी से डरता नहीं है, अपने रास्ते जाता है। इसीलिए कोई घेरा नहीं है, किसी सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है। राम की वनयात्रा एक सीधे-सादे आदमी की अपने पिता के सच की रक्षा में स्वयं ओढ़ी हुई यात्रा है। यह यात्रा किसी दुख के भोग के लिए नहीं हैं, एक ऐसे भोग के लिए है जिसमें सुख की प्राप्ति भी नहीं है, सुख एक-दूसरे का भाव-अभाव बाँटने में है और दुख देश और व्यापक देश-परिवार छोड़ने का, यदि है भी तो उसकी पूर्ति व्यापक देश और व्यापक परिवार बनाने से वन में होती है। वाल्मीकि ने वन का वर्णन बड़े रस के साथ किया है। वन में मीठी गंध भिनी हुई है - त्वया सह निवत्स्यामि वनेषु मधुगंधिषु। वाल्मीकि की वन की पहचान तरह-तरह के पखेरूओं की आवाज़ों से है, तरह-तरह के वृक्षों की छाया से शीतल तरह-तरह के नदी-झरनों के मीठे सुस्वादु जल से है और इन सबकी समग्र पहचान पत्तों के दोनों में वनवासियों द्वारा लाई गई वन-उपज की भेंट से है। राम अयोध्या के राज के निर्वासित हैं, पर विस्तृत वन-भाग के वन के महीप हैं। वन के उपांत भाग में या वन के बीच-बीच में जहाँ कहीं छोटे-छोटे टुकड़ों में खेती होती हैं, उनका दृश्य भी वाल्मीकि के रामायण में सज-धज से अंकित है। वाल्मीकि की वन की पहचान हेमंत की मलाईनुमा चाँदनी से है, उस चाँदनी में झरती हुई ओस से हैं, सुबह होते ही उस ओस के मोती बनने से हैं, कुहरे के कारण निश्वास के अदराए दर्पण सरीखे चंद्रमा के चेहरे से है -जिस दर्पण में रात अपना मुँह निहारना चाहती है, निहार नहीं पाती हैं, जुते खेतों में छोड़ी गई शरद् के ताप में झँवाई हुई हराई के धीरे-धीरे ओस से भीगकर स्नेह पिन्हाने से हैं, धान की भरी-पूरी बालियों में खजूर के फूल की दिखती हुई झाँई से हैं, प्यासे हाथी के द्वारा पुष्करिणी के जल को छूते ही तुरंत सूँड़ सिकोड़ लेने से है, उस सूर्य से है जो जैसे-तैसे घने कुहरे के बीच अपनी किरणों के सहारे उगता है तो चंद्रमा की तरह दिखता है और पूर्वाह्न में धूप तो ऐसी लगती है जैसे बेजान हो, मध्याह्न में मीठी लगती है और कुछ ललछाँही, पीली-पीली सी, पृथ्वी पर फैली हुई - अपराह्न में वह एक अलग आभा देती है। ओस और कुहरे से ढके हुए जंगल फूल-पत्तियों से विकसित होकर सोये से लगते हैं। नदियों की पहचान सारस की बीच-बीच में उठती हुई करुण ध्वनि और कुहरे के घने आवरण से ढके हुए जल तथा बर्फ से भी अधिक ठंडे बलुए तटों से होती है। सबसे अधिक हेमंती वनवास की पहचान राम की इसी चिंता से होती है, इस ठंड में भरत कैसे नंदिग्राम में रह रहे हैं। राज्य का सब सुख-भोग छोड़कर वे तपस्या करते हुए, एक बार मुठ्ठी भर कुछ खाकर ठंडी-ठंडी जमीन पर सो रहे होंगे। इस वनवास में राम को अपनी चिंता नहीं होती, अपने छोटे भाई भरत की चिंता होती है। यही वन की संस्कृति है और इस संस्कृति का काव्य है - 'रामायण'। इस वन-संस्कृति की सहजता को नष्ट करने के लिए रावण आता है। रावण के पहले शूर्पणखा आई हैं; उसके भी पहले जयंत आया। राम ने उन सबका समुचित सम्मान किया। रावण जब सीता को हर रहा था तो सीता ने वन का ही आवाहन किया, 'हे जनस्थान, हे कर्णिकर, हे गोदावरी, हे वन देवताओं, हे इस वन में रहनेवाले विविध पशु-पक्षी! राम से कहो कि रावण सीता का हरण करके जा रहा है।' इसी वन-संस्कृति का एक दूर दृष्टिवाला प्राणी है जटायु, जो रावण को चुनौती देता है, रावण को राजधर्म का उपदेश देता है कि राजा ही धर्म का पालक होता है। प्रजा शुभ की ओर उन्मुख है या अशुभ की ओर, इसका दायित्व राजा का होता है। राजा ही धर्म है, राजा ही धर्म-कर्म की धरोहर है। उस धरोहर के साथ विश्वासघात करना उचित नहीं। विलाप करती हुई सीता आकाश मार्ग से जनस्थान के उस पार जा रही हैं और उनके चमकते हुए स्वर्ण आभूषण टूट-टूटकर बजते हुए भूमि पर गिरते हैं। हार टूटकर गिरता है तो जैसे गंगा ही आकाश से उतर रही हों। उस समय वृक्ष कह रहे हैं कि डरो मत, डरो मत। पुष्करणियाँ सीता के समदुखभाव में खिन्न हो रही हैं, उनके कमल नष्ट हो रहे हैं, भीतर रहनेवाले जलचर त्रस्त हो रहे हैं। सारे वन के पशु-पक्षी सीता के पीछे-पीछे दौड़ते हैं, पर्वत जल-प्रपातों के व्याज से बाँह ऊँची करके चिल्ला रहे हैं, सूर्य मंद पड़ रहे हैं, सोचते हैं - धर्म नहीं रहा, सत्य कहाँ से रहेगा। समस्त प्राणी शोक मना रहे हैं। मृग के शावक ऊपर उचक-उचककर डरी हुई आँखों से देखते हैं, काँप रहे हैं और रो रहे हैं। वनदेवियाँ काँप उठी हैं, तुम्हारी रक्षा में रही सीता हरी जा रही हैं। इस प्रकार सीता के साथ संपूर्ण वन है, सीता का जैसे यह दूसरा मायका हो। वन जैसे इस बेटी के साथ घटी इस दारुण घटना से विक्षुब्ध हो उठा हो। वन-संस्कृति का दूसरा पक्ष है कि इस प्रकार की असहाय स्थिति में भी सीता की तेजस्विता अप्रतिहत रहती है और सीता रावण को ऐसे फटकार बताती है जैसे कि वह स्वतंत्र शासन करनेवाली हों। सीता के भीतर यह सहज अभयभाव वन के स्वभाव की देन है। इसी कारण उनमें पराजय का भाव नहीं; उनके भीतर कुछ है जो अजेय बना रहता है। बादलों के बीच बिजली सी छटपटाती सीता तमककर कहती हैं, 'नीच, तुम्हें लाज नहीं आती ऐसा गर्हित काम करते हुए। मैं अकेली कुटी में थी, चोर की तरह मेरा हरण किया और भागे जा रहे हों। छल करके मेरे पति को मृग के माध्यम से दूर कर दिया, इतने कायर तुम हो कि तुम्हें सामने लड़ने का साहस नहीं! यह तुम्हारा परम पराक्रम हैं, नीच राक्षस, कि अपना नाम उद्घोषित करके तुमने युद्ध में मुझे नहीं जीता है! धिक्कार है तुम्हारी वीरता को! धिक्कार है तुम्हारे सत्व को, तुम्हारे चरित्र को! तुम एक घड़ी रुक जाओ, ऐसे भागो मत तो तुम जीवित नहीं लौटोगे। अगर मेरे पति और मेरे देवर के दृष्टि-पथ में तुम आ जाओ तो अपनी सेना के साथ भी तुम बचकर नहीं जा सकते। उनके बाण का स्पर्श तुम सह नहीं पाओगे; जैसे पक्षी वन में लगी आग को सह नहीं पाता!' वन में पली हुई वनजा सीता का दुर्धर्ष तेज ही था कि सीता रावण के ऐश्वर्य-प्रलोभ में नहीं आईं। यही कहती रहीं कि 'तुम्हारे दिन अब लद गए। तुम्हारा सत्व क्षीण हो गया है। तुम्हारी सारी श्री चली गई। लंका विधवा होने वाली है।' सीता के इस प्रकार हर लिये जाने पर राम दुख से भर जाते हैं; सूनी कुटिया देख, शोक-विह्वल हो वन के एक-एक वृक्ष से पूछना शुरू करते हैं - 'तुम जानते हो, सीता कहाँ हैं। वह पीत कौशेय धारण करनेवाली हैं, जिसमें तुम्हारे फूलों की आभा झलकती है। स्निग्ध पल्लवों की तरह कोमल हैं वे। तुम जरूर जानते होगे कि सीता किस तरफ गई हैं। हे अर्जुन, तुम सीता की तरह से गोरे हो, तुम जरूर जानते होगे उनके बारे में कि वे जीवित हैं या नहीं। यह कुसुम का वृक्ष निश्चय ही सीता के बारे में जानता होगा। इतने भौंरे गूँज रहे हैं - ऐसा यह तिलक का वृक्ष तिलक को चाव से सिर पर धारण करनेवाली सीता के बारे में जानता होगा। हे अशोक वृक्ष, प्रिया के दर्श कराके मुझे भी अशोक बनाओ। हे तालवृक्ष, यदि तुम्हारी मुझपर कृपा है तो तुम्हारे फल से सादृश्य रखनेवाली सीता कहाँ हैं? तुम ऊँचे हो, तुमने देखा होगा। हे जामुन, यदि तुम जानते हो सुनहरी कांतिवाली मेरी प्रिया को कि कहाँ गई तो निर्भय बता दो। हे कनेर, फूले-फूले से दिखते हो, कनेर के फूल को प्यार करनेवाली सीता को, बोलो, तुमने देखा है?' इसी प्रकार राम ने आम, साल, कटहल और पुरइया जैसे वृक्षों के पास जा-जाकर पूछा; मौलश्री, चंपा, चंदन, केवड़े के पास जा-जाकर पूछा। राम जैसे पागल हो गए हों। सीता कहाँ हैं सीता हैं कहाँ? पेड़ नहीं कुछ उत्तर देते तो वन पशुओं से पूछना शुरू किया। मृग से पूछा, 'तुम्हारे जैसी दृष्टिवाली सीता कहीं मृगियों के साथ खेल तो नहीं रहीं? शार्दूल, दूर तक देखते हो, तुमने यदि देखा है तो भय न करो, धीरे से कान में बता दो।' कोई उत्तर नहीं देता तो सीता को ही संबोधित करके वे प्रलाप करते हैं और संदेह करने लगते हैं कि कहीं पुष्कर की खोज में पुष्करिणी तो नहीं पहुँच गई। कहीं किसी जंगल में तो नहीं छिप गई। इस प्रकार वनश्री में सीता का अन्वेषण करते हुए राम यह संकेत दे रहे हैं कि सीता वन की आत्मा हैं, वन की संस्कृति हैं। वे वन से बाहर कहाँ जाएँगी। वन से बाहर सीता का भागधेय है ही नहीं। लंका में रहते हुए भी वन में हैं और अयोध्या में वापस आने पर भी उस वनानुरागिनी सीता का मन नहीं लगता और दोहद की पूर्ति के लिए वन-विहार की अनुमति माँगती हैं। इसी व्याज से लक्ष्मण उन्हें गंगा-तमसा के संगम के पास वाल्मीकि आश्रम के परिसर में छोड़ने जाते हैं। वे ऋषियों की तपस्या का फल थीं, ऋषियों की तपस्या की साधक बनीं। ऋषियों की तपस्या की छाया में उन्होंने बच्चे जने, उनका पालन किया और उस छाँह से दूर अयोध्या बुलाए जाने पर माँ से ही प्रार्थना की कि ' हे माधवी देवी, विवर दो कि समा जाऊँ।' यह भूमि-प्रवेश अयोध्या में हुआ कि लोक -परंपरा के अनुसार वाल्मीकि आश्रम में ही हुआ, कौन जाने; पर सीता की पूरी कहानी तपोवन-परिक्रमा है। वाल्मीकि के मन में राम के राज्य या ऐश्वर्य से तपोवन का यह स्वातंत्र्य अधिक बसा हुआ है। उसके लिए उनके मन में विशेष आदरभाव है। तभी राम पर तो क्रोध कर सकते हैं, लेकिन सीता उनके लिए परम पवित्र हैं, साक्षात तपमूर्ति हैं। सीता की पवित्रता की प्रतिष्ठा के लिए वे जन्म-जन्मांतर का सुकृत, पुण्य दाँव पर रखने के लिए तैयार हैं। सीता निष्पाप हैं। तपोवन की कन्या को कोई दोष छू नहीं सकता, लग नहीं सकता। उसे पराजित नहीं किया जा सकता। इसी कारण 'रामायण' जितना रामचरित है उससे कहीं अधिक 'सीतायास्चरितं महत्' है। वन राम का घर हैं, क्योंकि वन ही सीता हैं। 'रामायण' का मर्म समझने के लिए वन की इस पृष्ठभूमि के भीतर झाँकने की जरूरत है।
हल्दी-दूब और दधि-अच्छत मेरे घर की संस्कृति के मांगलिक उपादान मूर्त रूप से हल्दी-दूब और दधि-अच्छत ही हैं, इसलिए शहर में एक लंबे अरसे तक बसने के बाद भी मन इन मंगल-द्रव्यों की शोभा के लिए ललक उठता है। बहुत दिनों से कोई अर्चन-पूजा नहीं की है, जिसको अर्चन का अधिकार सौंप दिया है, उससे भी कोसों और महीनों का व्यवधान है। वसंत की उदास बयार की लहक एक अजीब-सा अपनापन भर रही है, वर्षांत के कार्य का बोझ सिर पर लदा हुआ है। जिसे लोग उल्लास कहते हैं, वह जैसे पथरा गया है; पर कुछ बात है कि हल्दी से रंगी हथेली, दूब से पुलकित पूजा की थाली, अक्षत से भरा चौक और दधि से रंगी भाल, ये चित्र मन में उभर ही आते हैं। हृदय का वह प्रथम अनुराग बासी पड़ गया, उस नव-प्रणय की भाषा जूठी हो गई, उसके अंतर का वह रस सीठ गया, उस रस का वह आपूरित आनंद रीत गया, जिन नव दृग-पल्लवों की बंदनवार लगी, वे दृगपल्लव मुरझा गए, 'नयन सलोने अधर मधु' दोनों ही करुवा गए; पर क्या जादू है कि मन की कोर में लगी हल्दी नहीं छूटी, जीवन-प्रांतर में उगी हुई दूब और परिसर में बिछी हुई 'अच्छत' राशि क्षत-विक्षत नहीं हुई। यह जानते हुए भी कि गाँव की उस मांगलिक कल्पना में शहरी जीवन का कोई मेल नहीं हो सकता, मेरा अनागर मन उस कल्पना का पल्ला नहीं छोड़ना चाहता। किसी ने प्रतिगामी कहा और किसी ने अपनी काफी-हाउस या कोको-कोला सभ्यता में 'अखपनीय' मानकर दुराग्रही जनवादी या शिष्ट शब्दों का प्रयोग कर प्रगतिशील कहा; पर वह बिचारा गँवार चरवाहा ही बना रहा। उसकी काली कमली पर दूसरा रंग न चढ़ा। उसकी पुरानी बांसुरी से दूसरी टेर नहीं आई, उसके गीतों में दूसरे गोपाल नहीं आए। उसकी प्रत्येक नई प्राप्ति अपने शुभ के लिए अब भी हल्दी का वरदान मांगती है। उसकी प्रत्येक नई यात्रा दही का सगुन चाहती है। उसकी प्रत्येक नई साधना दूर्वा का अभिषेक माँगती है, और उसकी प्रत्येक नई आपूर्ति अक्षत से पूर्णता का आशीष चाहती है। मैं अवश हूँ। फीरोजी, सुरमई, मूंगिया और चंपई इन रंगों से घिरा हुआ भी नवांकुरित दूब की हरित-पीत आभा की ओर मेरा मन दौड़ ही जाता है और धरती, माटी, मानव और आस्था, ईमान, सत्य, चेतना और युगमानस - इन सभी उपासना-मंत्रों के कोलाहल में भी 'हरद दूब दधि अक्षत मूला' की गीतियों की स्फूर्ति के पीछे वह भटक जाता है। चारों ओर से लोग मुझसे प्रश्न पर प्रश्न करते हैं कि तुम अपनी प्रतिभा क्यों बिखरा रहे हो, क्यों नहीं हमारे पंक्ति-बंधन में आकर उसको एक दिशा में आगे बढ़ाते, युगपथ छोड़कर किन पिच्छिल पगवीथियों पर विभ्रांत हो? मैं किस-किस को और क्या जवाब दूँ? उन्हें कैसे समझाऊं कि मेरे ये संस्कार ही मेरे अस्तित्व हैं, मैं इनको छोड़कर कुछ नहीं। इस अनंत शून्य में तिरते हुए ये तिनके मिले हैं, उन्हें छोड़कर चलने पर मेरा आसरा टूट जाएगा। उन्हें कैसे दिखलाऊँ कि तुम्हारी योजना, तुम्हारा यज्ञ, तुम्हारी क्रांति, तुम्हारा वाद, तुम्हारी आस्था और तुम्हारा ईमान मुझे ही नहीं, मेरे जैसे हल्दी, दूब और दधि-अच्छत से अपने मन की मनौती पूरी करने वाले असंख्य गँवार भाइयों को भी छू नहीं पाते। तुम लोकगीत के तर्ज अपनाते हो, तुम गाथाओं की शैली अपनाते हो; पर तुम लोक का साक्षात्कार नहीं कर पाते। तुमसे क्या अपने घर की बात कहूँ, तुम समझ नहीं पाओगे। भाई, तुमने तो केवल वसन-भूषण ही देखे हैं, तुम शरीर तक नहीं देख पाये, आत्मा तो बहुत दूर की चीज है। एक भी धूलिकण न सह सकने वाले तुम्हारे ये पाहन-नयन कीच-कांदों में विकसन वाले नलिन-नयनों को कैसे निरख सकेंगे। पत्थर के चश्मे उतारकर अगर तुम अपने आस-पास सौ दो सौ बीघा भी देख सकते हो तो आओ मेरे साथ, मैं तुम्हें दिखलाऊँ कि बिना किसी अभियान, आंदोलन या क्रांति के उस धूमावृत पल्ली-समाज में एक अखंड यज्ञानल धधक रहा है, उसमें लपट नहीं, ज्वाला नहीं, दीप्ति नहीं; पर एक ऐसा ताप है जो अनाचार के कठोर-से-कठोर पाषाण को पिघला देगा, रोल्डगोल्ड की चमक को सँवार देगा, जो बुद्धि के अजीर्ण को पचा देगा और जो बुझी हुई ज्योति को उकसा देगा। वह आग हल्दी तथ दूब-भरी अर्चना और दधि-अच्छतमयी सिद्धि की साक्षी है, जिसमें 'साठी के चउरा' और 'लहालरि दूब' से भरी अंजलि 'लाख बरिस' की आयुष्म-वृद्धि करती है। वह आग उस बंधन की साक्षी है, जो वन के एकांत की मांग नहीं करता, जो गृह के संकुल में अपनी एकाग्रता सुरक्षित रख सकता है, वह आग जीवन के उस दर्शन का साक्षी है, जो विचल होना जानता नहीं, वह आग उस सिंदूर-दान की साक्षी है, जिसमें सिंदूर भरने वाला अपने प्राणों का आलोक किसी की माँग में भर देता है। मैं आज भी उस आग की आँच अपनी असीम जड़ता के अंतरतम में अनुभव करता हूँ। मेरे मन में वह याद अब भी ताजा है, जब मैं दूर्वाक्षतों से सौ बार चूमा गया था, तीस-पैंतीस कुल कन्याओं की सेना मस्तक से लेकर जानु तक अपनी उँगलियों से दूब-अक्षत लेकर वय, शक्ति और उमंग के अनुरूप बल लगा-लगाकर एक के बाद एक दबाती जा रही थी। इसी व्यापार को चूमने की संज्ञा देकर गीत उच्चरित हो रहे थे। मैं इस चूमने से खीझता जा रहा था, ऊपर से थोड़ा-बहुत शहरी संस्कारों के प्रभाव-वश पानी-पानी हो रहा था; पर भीतर-ही-भीतर मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे दूब-अच्छत के संयोग के द्वारा अक्षय हरियाली की शुभ कामना मेरे अंग-अंग को अभिमंत्रित कर रही हो। उस चूमने में अधर नहीं मिले, पर जाने कितने बाल, किशोर, तरुण और प्रौढ़ हृदयों को अपने-अपने ढंग से मंगल-चेतना का संस्पर्श अवश्य मिला, उस चूमने से मादकता नहीं आई; पर जाने विश्व भर के सहयोग का एक ऐसा आश्वासन मिल गया कि मन में मीठी-सी सिहरन पैदा हुई। उस चूमने में शोले नहीं भड़के, नसें नहीं पिघलीं और प्यास नहीं बढ़ी, बल्कि एक ऐसी शीतलता जड़िमा और परितृप्ति आई कि लगा व्यक्ति का प्रणय समष्टि ही स्नेहच्छाया के लिए युगों से तरसता आया हो और अब पाकर परितुष्ट हो गया हो। आषाढ़ चढ़ते ही मंजरियों में झूम उठनेवाली साठर के वे लहराते खेत बरसों से देखने को नहीं मिलते; पर उसके हल्दी-रंगे अक्षतों का एक अंजलि से दूसरी अंजलि में अर्पण-प्रत्यर्पण और उन अक्षतों के मिस हृदय की एक-एक करके समस्त सुकुमार भावनाओं के अर्पण-प्रत्यर्पण की स्मृति आज भी हरी है। साठी के धान वैशाख-जेठ में रोपे जाते हैं और चिलबिलाती धूप से वे जीवनरस ग्रहण करते हैं। दूब भी पशुओं के खुर से कुचली जाती है, खुरपी से छीली जाती है, कुदाली से खोदी जाती है, हल की नोक से उलटी जाती है, अहिंस्र कहे जाने वाले पशुओं से निर्ममता के साथ चरी जाती है और मानवों की सबसे उत्तम वृत्ति रखने वाले खेतिहर से सतायी जाती है; पर वह प्रत्येक जीवन-यात्री को वर्षा में फिसलने से बचाने के लिए पाँवड़े बिछाती है। वह दो खेतों की परस्पर छीना-छोरी की नाशिनी स्पर्धा को रोकने के लिए शांति-रेखा बन जाती है। जरा-सा भी मौका मिल जाए, तौ फैलकर मखमली फर्श बन जाती है। पनघट के मंगलगीतों का उच्छ्वास पाकर वह मरकत की राशि बन जाती है, शरद का प्रसन्न आकाश जब रीझकर मोती बरसाता है, तब वह धरती की छितरायी आंचर बन जाती है और जब ग्रीष्म का कुपित रवि आग बरसाता है, तब वह धरती के धीरज की छांह बन जाती है। उस दूब को यदि नारी पूजा की थाली में सजाती है तो उन समस्त अत्याचारों का क्षण भर के लिए उपशम हो जाता है, जिन्हें दूब प्रतिक्षण सहती रहती है। भारतीय संस्कृति का मूल आधार है तितिक्षा, जिसकी सही अर्थ में मूर्त व्यंजना ही दूर्वा है। दूर्वा चढ़ाने का जो वैदिक मंत्र है, वह भी इसी सत्य को दुहराता है, 'कांडात्कांडत्प्ररोहन्ती, परुष: परुषस्परि। एवानो दूर्वे प्रतनु सहस्त्रेण शतेन च'। तितिक्षा ही के कारण उस संस्कृति की एक शाखा उच्छिन्न होते ही दूसरी शाखा निकल आई है। जितने ही उस पर मार्मिक आघात हुए हैं, उतने ही शत-सहस्त्र उमंगों के साथ वह पनपी है। इसी के कारण उसे अप्रतिहत मांगलिक स्वरूप प्राप्त हुआ है और इसी के कारण वह भारत की धरती से इतनी हियलगी बन रही है कि बिना उसके उसका कोई मांगलिक छिड़काव नहीं संपन्न होता। दूर्वा की नोक से जब हल्दी छिड़की जाती है तो ऐसा लगता है कि तितिक्षा के अग्रभाव से साक्षात सौभाग्य छिड़का जा रहा हो। हल्दी-दूब का यह संयोग सत्व को चिद् और आनंद का मंगलमय परिधान देता है, नहीं तो अपने में सत्व निरापद और अशिव है। उसको अपना गौरव चिद् और आनंद के सुखद संयोग में ही प्राप्त होता है। शायद इसीलिए वह सत्व राष्ट्र के प्रतीक में हल्दी और दूब के योग का मध्यमान बन गया है। हल्दी जब तक नहीं लगती, तब तक श्वेत-से-श्वेत वस्त्र अपरिधेय ही बना रहता है। हल्दी जब तक नहीं चढ़ती, तब तक कौमार्य अपरिणेय ही रहता है। हल्दी जब तक नहीं पड़ती, तब तक रसवती अप्रेय ही रहती है। इसलिए जब अक्षय तृतीया को पहला हल खेत में जाने लगता है, तब हल, बैल और हलवाहा तीनों ही हल्दी से टीके जाते हैं। जब पहला बीज धरती में पड़ने जाता है, तब खेतिहर, खेत, बीज और कुदाली चारों हल्दी से छिड़के जाते हैं, जब मातृत्व की सफलता में नारी उतरने को होती है, तब उसके नैहर से आई हुई हल्दी-रंगी पियरी और हल्दी-रंगी झंगुली ही उसको तथा उसके लाल को कुल के समक्ष प्रस्तुत करती हैं। जब कुमारी सुहागिन बनने को होती है, तब उसके अंग-अंग को हल्दी की असीस देती है और नख-शिख हल्दी से रंग कर ही सौंदर्य सौभाग्य का सिंदूरदान पाता है। जिसको हल्दी नहीं लगती, वह धरती परती पड़ जाती है। जिस पर हल्दी नहीं खिलती, वह नारी सौंदर्य का अभिशाप बन जाती है। जिसको हल्दी नहीं चढ़ती वह कन्या आकांक्षा की अछोर डोर बन जाती है, क्योंकि हल्दी के ही गर्भ में धरती का सच्चा अनुराग तत्त्व छिपा रहता है, हल्दी की ही गाँठ में स्नेह का अशेष हृदय से आमंत्रण बँधा रहता है, हल्दी में ही रंगकर श्याम दूर्वाभिराम हो जाते हैं और हल्दी के छूने ही से मंगल की प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है। इसी से यद्यपि उसके लिए वेद ने आग्रह नहीं किया; पर लोक के अंतर का आग्रह था, वह हल्दी मंगल-विधि में अपरिहार्य बन गई, उस हल्दी को संस्कृत वालों ने इसी से 'वर्णक' संज्ञा दी, मानो वर्ण की सार्थकता हल्दी में ही अर्पित हो गई हो, दूसरे वर्ण इसके आगे अपार्थ हो गए हों। हल्दी वस्तुत: उस लोक-हृदय की सुरक्षित थाती है, जिसने नए-नए देव और मंत्र तो स्वीकार किए; पर जिसने उपासना के उपादान वैसे ही संजोये रहे और जिसकी आस्था के रंग वैसे ही चटकीले बने रहे। हल्दी, दूब इस देश की संस्कृति को रूप और सौंदर्य स्पर्श देते रहे हैं, कमल गंध देता रहा है; पर दधि-अच्छत, रस तथा शब्द देते रहे हैं। जिस प्रकार शब्द से आकाश भर जाता है, उसी प्रकार से अक्षत से अर्चन की थाली भर जाती है। जिस देश के बाहर-भीतर सभी आकाशों में युगों से अक्षर ब्रह्मा का नाद आपूरित होता रहा हो, उस देश की जनकल्याणी अंतरात्मा को आसन देने के लिए इसी से अक्षत से बढ़कर कोई सामग्री उपयुक्त नहीं समझी गई और वह अक्षत संस्कृत व्याकरण की महिमा से बराबर बहुवचन में केवल इसीलिए प्रयुक्त होता रहा कि बहुजन-हिताय का बोध उससे होता रहे। दही उस संस्कृति की कपिला वाणी की साक्षात रसमयी प्रतिमा है। दूध से यौवन के उफान का बोध भले ही होता रहे, माखन से मन की एकता भी और घृत से आयुष्म की लक्षणा भी बनती रहे; पर इष्टता की प्राप्ति दही में होती आई है और इसीलिए सही माने में गोरस केवल दही ही है। जिस दही के दान के लिए इस देश के परब्रह्म हाथ पसारते रहे हों, जिस दही के मटके के लिए मंगलविधि तरसती रही हो, वह दही अपने समस्त गुणों में इस देश की सांस्कृतिक विवर्तनशीलता तथा अंतर्ग्रहणशीलता का प्रतिमान है। दूध मे खटाई पड़ते ही वह फट जाता है, दूध में नमक की एक छोटी-सी डली भी पड़े तो वह विषतुल्य हो जाता है; पर दही खटाई, मिठाई, लुनाई सभी स्वादों से समरस होनेवाला एक विलक्षण आस्वादन है। उसमें दूध के उफान या घी के पिघलने से अधिक धीमी आँच में तपने के कारण एक स्थिररूपता है। ठीक यही बात उस दही से अभिव्यज्यमान संस्कृति के बारे में भी कही जा सकती है, सभी रसों से मेल रखती हुई भी अपने रस में सबको समाविष्ट करती हुई और क्षणिक उत्ताप या द्रवण से अप्रभावित रहकर साम्य निदर्शन करती हुई वह सच्चे अर्थ में दधि से अधिक 'उर ईठी' बन गई है। उसकी ऐसी महिमा है कि उसके छाछ के लिए तो इंद्र तक तरसते ही हैं, स्वयं सच्चिदानंद तक को 'अहीर की छोहरियाँ तक छछिया भर छाछ पर नाच' नचा देती हैं। उसके मंथन से केवल अमृतमय नवनीत निकलता है। सौभाग्य, तितिक्षा, स्नेह तथा परिपूर्णता के लिए आग्रह-रूप में उस संस्कृति की पूजा की थाली हल्दी, दूब और दधि-अच्छत से सजायी जाती रही है और सजायी जाती रहेगी, पर उस पूजा का मर्म उसी को खुलेगा, जो लोक-जीवन की मंगल-साधना में अपने को तन्मय कर सकेगा और वह तन्मयता ग्रामसेवक या गाँव साथी बनने से नहीं आएगी, उसे पाने के लिए मन से गँवार बनना होगा, शहरी संस्कारों को एकदम धो देना होगा। बिना उसके, हल्दी, दूब और दहि अर्थशून्य आडंबर ही लगेंगे। ये सभी मंगलद्रव्य अभिव्यंजन हैं, अभिधान नहीं। अभिधान को प्रकट करने में हम दोष मानते हैं और अभिव्यंजन के लिए सहृदयता की जरूरत पड़ती है, बिना उसके उसका उल्लास बनकर आस्वाद्य नहीं होता। आज संस्कृति का अभिधान तो है, जो न होता तो अच्छा होता; पर उसका अभिव्यंजन नहीं है, उस अभिव्यंजन को न पाकर ही साहित्य रिक्त है, सांस्कृतिक जीवन भी मृदंग की भाँति मुखर होते हुए भी खोखला है। आज जीवन में उस अभिव्यंजन को भरने की ललक इसीलिए सबसे अधिक है और इसी से हल्दी, दूब और दधि-अच्छत का मान अधिक दिनों तक उपेक्षित नहीं रह सकेगा।
तुम चंदन हम पानी घर में पिताजी और दो पितृव्य पूजा-पाठ बहुत निष्ठापूर्वक करते हैं, इसलिए तीन होरसे तो कम-से-कम घर में हैं ही प्रतिदिन इन पर चंदन और प्राय: मलयागिरि चंदन ही घिसा जाता है। रक्तचंदन या देवी चंदन तो नवरात्र में या रविवार को ही इन होरसों पर घिसता है। इसलिए चंदन से बड़ी पुरानी जान-पहचान है। पाँच-छह वर्ष का था, मैं अपने बड़े पितृव्य के पास जाकर चुपचाप बैठ जाता था और उनका महिम्न स्त्रोत्र पूर्वक चंदन घिसना देखा करता था। पूजा उनकी घण्टों चलती थी। बीच-बीच में किसी वस्तु की आवश्यकता हुई, तो वे देव भाषा में ही संकेत करते और मैं ला देता। पूजा समाप्त होने पर गौरी, गणेश, पार्थिव शिव, एकादश रुद्र और श्री दुर्गासप्तशती तथा श्रीमद्भागवत पर चढ़ने से जो चंदन अवशिष्ट रहता था, उसको पितृव्य मेरे भाल पर या ग्रीवा में चर्चित करते और तब अपने भाल पर तिलक लगाते। इसके बाद प्रसाद देते, जिसके लोभ से मैं इतनी देर तक बैठा रहता था। उस चंदन-तिलक से भाल चर्चित करने के सुअवसर अब नहीं मिलते, पर उसकी सुरभिमन में यत्न से सुरक्षित है। कारण शायद यह हो कि जो उस समय मेरी जिज्ञासा के समाधान में पितृव्य चरण ने बतलाया था कि चंदन अपने-आप घिसकर बिना देवता को चढ़ाये अपने सिर पर लगाने से पाप होता है, उस वाक्य के पीछे युग की शिक्षा पर संघृष्ट महान् सत्य की पावन स्मृति हो कि मनुष्य को अपने जीवन-संघर्ष से सुरभि अर्जित करने का अधिकार तभी मिलता है, जब वह अर्पित भाव से संघर्ष में रत होता है। या शायद चंदन के आमोद में पार्थिव आनदं के चरम उत्कर्ष की प्राप्ति होने के कारण जगदात्मा की उस चंदन से एकाकारता का भान हो, जिससे प्रेरित होकर किसी संत कवि ने गाया था-'प्रभुजी तुम चंदन हम पानी' या शायद चंदन के तिलक से उभरे हुए उन गुरुजनों के व्यक्तित्व की मन पर गहरी छाप हो। बहराल, भाल चंदन-चर्चित हो न हो, मन मलयज से अब भी सुवासित है। सोचता हूँ प्रभुजी चंदन क्यों हैं? हम जिनके प्रति अपने को अर्पित कर रहे हैं, उन्हें अपने जीवन के साथ घिसने में सार्थकता क्या है? मुझे कभी-कभी तब यह ध्यान आता है कि काठ के टुकड़े की तरह सामान्य रूप से हमारे अंतस् के कोने में पड़ा हुआ चिदंश जब तक हमारे जीवन के साथ सम्पृक्त नहीं होता, तब तक वह निर्गुण, निरामोद और निर्व्यक्त बना रहता है ज्यों ही वह इस पार्थिव शरीर के शिलाखंड पर जीवन के छिड़काव से बार-बार रगड़ खाने लगता है, त्यों ही उसका गुण, उसका आमोद और उसका चैतन्य अभिव्यक्त हो उठते हैं। विश्वात्मा की सुषुप्त शक्ति स्फुरित हो जाती है। पर जो अभागा आदमी इस चंदन को घिसकर अपनी प्रेयसी का अंगराग बना डालता है, या अपने शारीरिक ताप का उपशम-साधन मात्र समझने लगता है, उसका जागरित, परिस्फुरित और प्रमुदित चिदंश पुन: उसकी प्रिया की विलासश्रमबिंदुओं या उसकी ही कायिक, मलिनताओं में घुलकर विलुप्त हो जाता है। जब विश्वात्मा के आंनद का वह लव कायिक धरातल से सुरभिकण के रूप में ऊपर उठता है तब चराचर विश्व में अभिव्याप्त आनंद-पारावार से एक होने के लिए, इसलिए इस सुरभि के अभ्युत्थान की सार्थकता इस पूर्णता की प्राप्ति में है, पूर्णता की प्राप्ति अर्थात् एकांशिता से विमुक्त। नए मानवीय मानों पर बल देने वाले अभिनव मलयानिलों से मैंने यह संकेत पाया है कि मनुष्य महान है, वह दूसरे किसी महत्तर के प्रति अर्पित क्यों हो। भुजंगों से लिपटा हुआ चंदन का वृक्ष ही स्वत: महान् है, वह आस-पास के कंकोल, निम्ब और कुटुज तक को चंदन बना डालता है। विषयों से परिवृत मानव अपने यश से अपने परिवेश में प्रत्येक युग में सुरभि भरता आया है, उसे अर्पित होने की क्या आवश्यकता है। ये मलयानिल दक्षिण से नहीं पश्चिम से आए हैं, अर्थात् दाएँ से नहीं पीछे से आए हैं। इनकी पुकार इसलिए पीछे मुड़कर सुनने की सबके मन में उत्कंठा-सी जग जाती है। सबसे बड़ा सृष्टि में मूर्धन्य कौन है? यह मनुष्य है। वह तब क्यों स्फीत होकर न चले, क्यों वह विनीत होने को विवश हो ? इस प्रश्न का उत्तर देने का साहस कौन करे? मुझे तो जय देव के प्रसिद्ध विरह-गीत की कड़ियाँ बरबस याद आ जाती हैं : निंदति चंदनमिंदुकिरणमनुविंदति खेदमधीरम् व्यालनिलयमिलनेनगरलमिव कलयति मलयसमीरम् सा विरहे तव दीना माधव मनसिजविशिखभयादिव भावनया त्वयि लीना माधव के विरह में राधा अंग में आलिप्त चंदन को अधिक्षिप्त करती हैं और चंद्रमा की शीतल किरणों से दुख पाती हैं। सर्पों के वास से सम्पर्क होन के कारण मलय-समीर को विषतुल्य अनुभव करने लगती हैं, क्योंकि ये माधव के विरह में दीन हैं और पुष्पधंवा के बाणों से भयभीत होकर भावना के द्वारा माधव में ही लीन होने का उपाय रच रही हैं। तो ऐसा समय भी आता है, जब चंदन की निंदा होती है, जब माधव, अपने प्रत्यगात्मा, अपने पारमार्थिक रूप, अपनी विश्वप्रसृत क्षमता और अपने आदर्श से बिछुड़ जाते हैं, मलयज का मान तभी है, जब मलयज भारवाही पवन सागर-प्रक्षालित चरणों से हिम मण्डित मुकुट तक उत्तर यान के लिए ललित गति से सतत प्रवहमान है। चंद्रिका का मान तभी है , जब मन में अविकल और पूर्ण काम चंद्रप्रकाश मान है, मनुष्य का गौरव भी तभी है तब वह अपने आप में अधिष्ठित है। जिस क्षण वह आत्म-विश्लिष्ट हो जाता है, उस क्षण वह अत्यंत हेय बन जाता है। इसलिए जब वह अपने को परात्पर के लिए अर्पित करता है, तब उस समय वह सचमुच बिकता नहीं है। उल्टे उसी समय उसका गिरा हुआ मूल्य एकदम ऊँचे चढ़ जाता है, क्योंकि उसके लघुतर और क्षुद्रतर अंश स्वयं उसी के बृहत्तर और महत्तर अंशी के प्रति प्रणत होते ही उसे बृहत्तर और महत्तर सत्ता से एकाकार कर देते हैं। जो नर के नियत भावी उत्कर्ष में विश्वास करेगा, वही नारायण में भी विश्वास करेगा, क्योंकि 'नराणां नरोत्तम' और नारायण दोनों वंदनीयता की समान कोटि में आते हैं। 'नार' का अर्थ पुराणों और स्मृतियों में जल अर्थात आदि सृष्टि कहा गया है, इस आदि सृष्टि में अभिव्याप्त सत्ता का नाम ही नारायण कहा गया है। इसलिए नरों में जो नरोत्तम होना चाहता है, उसे स्वभावत: नारायाणा भिमुख होना ही पड़ता है, क्योंकि नर का अर्थ ही है अपने में सिमटा हुआ। जिन लोगों ने मनुष्य मात्र को नमो नारायण कहकर प्रणाम करने की परंपरा चलायी, वे मनुष्य की अंतर्निहित शक्ति के सबसे बड़े दृष्टा थे, वे मनुष्य के विस्तार शील रूप को आवाहित करना जानते थे, इसलिए सामान्य से सामान्य जन को देखकर वे यही कहते थे, नारायण को नमस्कार है, तुम्हारे अंदर जो विश्व-भावना तत्त्व है, उसे नमस्कार करता हूँ ताकि वह तत्त्व तुम्हारी क्षुद्रता और संकीर्ण्ता के बहिरावण को फोड़कर बाहर आए। शायद कुछ लोग 'प्रभुजी हम चंदन, तुम पानी' कहकर मानव की क्षुद्रता और दुर्बलता को गौरव देना चाहें और कहें कि जरा-सा-उलट दिया, बात तो वही है, चाहे खरबूज गिरे छुरी पर या छुरी गिरे खरबूजे पर, खरबूजे का कटना अवश्यम्भावी है, चाहे प्रभुजी चंदन हों और हम पानी हों चाहे हम चंदन हों, प्रभुजी पानी हों, घिसना तो अवश्यम्भावी है, तो उनका तर्क तो बहुत ठीक है; परंतु चंदन तब नहीं घिसेगा। तो जरा-सा हमारा पानी लगता है और प्रभु का चंदन पसीज जाता है; पर हमार छोटा-सा चंदन प्रभु के अपार कृपा सिंधु में होरसा समेत बह निकलेगा, फिर चंदन घिसने की बात भी समाप्त हो जाएगी। इस सम्भावना को वे लोग एकदम भूल जाते हैं वस्तुत: छोटाई-बड़ाई की यह सापेक्षता किसी बाहरी वस्तु की तुलना में नहीं की गई है। प्रत्येक मनुष्य स्वयं अपने में ही छोटाई-बड़ाई दोनों से समवेत है और दोनों की सापेक्षता अपने में ही वह अल्प-मात्र आयास से अनुभव कर सकता है। मेरे बड़े दादा मिट्टी सानकर पार्थिव शिव की सुंदर आकृति बनाते, उनके आस-पास मिट्टी का ही गौरी गणेश रचते और चारों ओर ग्यारह रुद्रों की पंक्ति मिट्टी की ही खड़ी करते, तदनंतर इनके ऊपर रुद्राभिषेक के मंत्रों से जलाभिसिंचन करते और इन पर चंदन चढ़ाते। चंदन-चर्चित हो जाने पर ही उन्हें वे अन्य गंध-मालय, धूप-दीप और नैवेद्यादि का अधिकारी मानते। मैं समझता हूँ कि वे अपनी पार्थिव सीमा में बँधे महादेवता को अपने पवित्रतम जीवन से रससिक्त करने के अनंतर अपने जीवन के साथ संघृष्ट उत्कृष्टतम महत्त्व वासना का आमोद चढ़ाकर रही अपने महादेवता को पूर्ण प्रतिष्ठा दे पाते थे, या यों कहें अपने में दूर फैलने की महान बनने की और निर्माण करने की जो भी शक्ति सन्निहित है, उसको अपूर्णरूप से जगाकर ही मनुष्य अपने को प्रकाश का अधिकारी बना सकता है। निवेदनीय पात्र बनकर नैवेद्यका भोक्ता बना सकता है। इज्य बनकर धूप अर्थात-आहुति का अधिकारी बना सकता है। इसलिए पहले चंदन को, जो प्रभु का ही जड़ीभूत रूप है, जीवन के संस्पर्श से शरीर को शिला की तरह दृढ़ आधान बनाकर घिसो; तब तक घिसो , जब तक नख न घिस जाएँ। "चंदन घिसत-घिसत घिस गयो नख मेरो, वासना न पूरत माँग को सँवार।" तानसेन के इस ध्रुपद की यह पुकार है कि जब तक वासना न पूरे तब तक नख घिस भी जाए, घिसने की प्रक्रिया न रुके, वासना पूरी तरह से जब तक इस चंदन के साथ घिसकर उतर न आए, तब तक वह चंदन अर्पणीय कैसे होगा! और यदि इस पूर्ण तल्लीनता के साथ चंदन घिसते ही तो चंदन बिना चढ़ाये ही जहाँ चढ़ाना है चढ़ जाएगा और तुम चंदन घिसते ही रहोगे, तुम्हारे चंदन का अर्चनीय तुम्हें तुम्हारे अनजाने में चंदन से तिलक कर जाएगा, "तुलसीदास चंदन घिसें तिलक देत रघुवीर।" यह न हो कि चंदन तो उतारते जाओ, पर उसी को भूल जाओ, जिसके लिए तुम चंदन उतारने बैठे थे, जैसा कि मेरे एक संबंधी के यहाँ के एक ब्राह्मण देवता किया करते हैं। निष्काम-भाव से वे छटाँक-छटाँक भर चंदन उतार डालते हैं और जब चंदन उनकी आवश्यकता से कहीं अधिक उतर जाता है, तो कई घर जाकर अनेक पुजारियों को इस लोभ में दे आते हैं कि चंदन घिसने में उनका जो परिश्रम बचा, उसके बदले में वे कुछ दे दें। मैं जानता हूँ ऐसे परार्थ-घटकों का, कहीं भी जाइए, अभाव नहीं है। साहित्य के क्षेत्र में जाइए तो कई एक ऐसे साहित्य के सेवी मिलेंगे, जो किसी-न-किसी पुजारी के लिए रात-दिन चंदन उतारते ही रहते हैं। बदले में कुछ दान-दक्षिणा मिल ही जाती है। राजनीति के क्षेत्र में तो बड़ा पुजारी केवल आरती के समय ही आता है। चंदन उतारना तो हमेशा टुकड़खोरों के कर्तव्य-वितरण की सूची में आता है। हाँ, केवल रक्तचंदन उतारने वाला पुजारी निष्काम भाव से चंदन नहीं घिसता। वह तो शक्ति का पुजारी होता है। जिसके मस्तक पर वह रक्तचंदन का तिलक लगा देगा , वह या तो पशु होगा या फिर वीर ही होगा। पशु होगा, तो बलि होगा और वीर होगा, तो मुक्त होगा। मलयज घिसा जाता है, तो गंध जगती है; पर रक्त चंदन जब घिसा जाता है, तब राग जगता है। इस राग से रंजित होकर या तो मनुष्य बिल्कुल अध:पतित ही होता है, या फिर ऊँचे उठता है, या तो उसका उठान निस्सीम हो जाता है। मलयज में प्रभु की कृपा अधिक घिसती है और अपना जीवन यापन अल्पमात्र लगता है; रक्तचंदन उतरने में देवी की प्रेरणा कम, अपने जीवन का रस अधिक लगता है। इसलिए यह वक्रपंथगामियों की उपासना में ही अधिक उपयोगी माना जाता है। राजमार्ग पर चलने वाले धवल वेशधारियों के मस्तक पर यह फब ही नहीं सकता। यह तो सुनसान अंधकारित पथों पर निर्भय विचरण करने वाले नीलकंचुक धारियों के उज्ज्बल भाल का श्रंगार है। काव्य में एक पथ के पांथ हैं तुलसीदास और दूसरे के कालिदास। तुलसी शील की छँह में छँहाते चलते हैं, और कालिदास बिजलियों की कौंध से आँखें मिलाते चलते हैं तुलसी में मलयज की तरह ताप-निवारण की क्षमता है, कालिदास में लोहित चंदन की तरह उन्मादन राग-विवर्धन की शक्ति है। एक तीसरा भी पंथ है, केशर या हल्दी के रंग में मलयज को संसक्त करके तिलक देने वालों का। रागात्मिका भक्ति के द्वारा दक्षिण और वाम पंथ के बीच सहज समाधान प्राप्त करने वालों का। इनके तिलक में बंकिमा और सादगी दोनों होती है। सूरदास, हितहरिवंश, व्यास आदि इसी पंथ के प्रणेता हैं। और एक चौथा चंदन भी है, जिसको वैष्णव जन गोपी-चंदन कहते हैं। मेरी एक परम वैष्णव चाची हैं, वे बतलाती हैं कि जिस सरोवर में गोपियों ने स्नान करके अपने प्रेष्ठ भगवान का साक्षात्कार पाया, उस सरोवर की मिट्टी ही समर्पित गोपी के अंग से लगकर चंदन बन गई है। सम्भवत: जितने भी दुराव, आवरण और आत्मसंकोच आदि कृपणभाव हो सकते हैं, उन सबसे मुक्त होकर अपने को निश्शेष भाव से जो अपने सर्वश्रष्ठ काम के लिए अर्पण करते हैं, तो मलयाचल की तरह अपने आश्रय-मात्र को चंदन बनाने में वे समर्थ हो ही जाते हैं हाँ, यह गोपी-चंदन बहुत ही उच्चतर भूमिका वाले सिद्ध भक्तों के लिए ही है। पर मैं तो यह मानता हूँ कि चंदन जो भी हो, किसी रंग में भी सना हो, वह हमारी विश्वभावना का ही एक शुष्कप्राय खंड है , जिसे रस-सिक्त करना हमारा सतत कर्तव्य है। जिस किसी भी शिला का हम होरसा बनवाएँ, वह धरती पर टिकी हो, संघर्षण में वह डगमागाने वाली न हो। हम जो कोई भी जल सींच-सींचकर चंदन को आद्र करें; वह शुचि हो, स्वच्छ हो और अभिमंत्रित हो। हम तिलक जो भी लगाएँ, वह अर्पित चंदन का तिलक हो, स्वार्थ संघृष्ट न हो, सुविस्तृत विश्व को सुरभित करने से जो बचा हो, वही हम अपने सिर-आँखों लें, इसी में हमारी भव्य परंपरा की अभिवृद्धि और हम सभी के अंत:करणों का सौमन्य सन्निहित है तत्त्वत: हमीं चंदन हैं, हमीं पानी हैं। हमीं होरसा हैं, हमी कटोरी हैं, जिसमें चंदन रखा जाता है। हमीं अर्चनीय देवता हैं और हमीं अर्चक भक्त हैं; पर यह हमारा विस्तार बोध भी तभी जगता है, जब हम प्रभु को चंदन और अपने को पानी मानकर चलते हैं। उदात्त रूपों का आकार सामने रखकर उनसे उनका सार ग्रहण करते हुए जीवन में उतारना है, यह ध्येय सामने रखकर चलते हैं और जो भी उदात्त गुण हम अर्जित करते हैं, उनको विश्वहित में विनियोजित करने का संकल्प लेकर चलते हैं। यही हमारी चंदन-चर्चा की पारमार्थिक परिभाषा है और इसी से हमारे गंधहीन, नि:स्व, रिक्त सांस्कृतिकम्मन्य जीवन में चंदन मांगल्य का अंग बना हुआ है। लिलार हमारा चाहे चंदन लगाने से चर्राने लगे और चंदन लगाते ही हम अपने को दशहरे के हाथी जैसा उपहसनीय प्राणी मानने लगें; पर हमारे अंतर्मन में चंदन का छिड़काव अभी गीला है, क्योंकि हमारे अक्षर अज्ञान के भीतर वह रागिनी अभी जागती है, जिसके किवाड़ चंदन के बनते हैं, जिसकी चौकी चंदन से गढ़ी जाती है, जिसके द्वार पर चंदन का बिरवा रोपा जाता है, जिसके गलहार भी चंदन के ही बनते हैं और जिस पर चंदन लिप्त हथेलियों की छाप पड़े बिना मंगल विधि नहीं पूरी होती। वह रागिनी ही जनता-जनार्दन की चंदन-खण्डिका है, जो एक कठोर विचार पीठिका पर बराबर ग्राम देवता की विलीयमान आनंदाश्रु बिंदुओं से परिषिक्त होकर घिसी जा रही है, घिसते-घिसते वह अब सूत मात्र रह गई है। उसकी सुरभि बिखर रही है; पर देवता नहीं उठ रहा है। कारण मैं नहीं जानता केवल इतना जानता हूँ कि निर्ममता से इस चंदन के छोटी-सी टुकड़ी को न घिसो। इसे सँभालकर घिसो. देवता को जगाओ, जिसके उद्बोधन से प्रत्येक काष्ठ चंदन बन लहक उठे। जिन भुजंगों के विष के भय से पेड़-के-पेड़ सूख-से गए, उनको भुजदंड बजाने वाले हिमवासी शंकर का इस तप्त मिट्टी के पिंड में आवाहन करो। वे चंदन स्वीकारें, जिससे जन-चेतना और उमंगित होकर पसरे, चंदन की महक प्रत्येक दिशा में फैले और चंदन का छिड़काव प्रत्येक पथ पर हो जाय। तभी हमारा बचा-खुचा पानी सार्थक होगा और तभी चंदन की प्रचुरता हमें इतना उदार बनने की प्रेरणा देगी कि चंदन की कुटी छवाकर निंदक को भी अपने निकट रख सकें। तभी चंदन-चर्चित संस्कृति का मंगलास्पद रूप अपना नवोत्कर्ष पा सकेगा।
चंद्रमा मनसो जातः चंद्रमा के जन्म–कर्म के संबंध में अनेक कथाएँ हैं, कहीं वे महर्षि अत्रि की संतान हैं, कहीं त्रिपुरसुंदरी की बाँईं आँख से समुद्भूत कहे गए हैं और कहीं उदधि के वे पुत्र कहे गए हैं, पर इन सब से अलग और विचक्षण कल्पना है कि ‘चंद्रमा मनसो जात:’ चंद्रमा विराट पुरुष के मन से उत्पन्न हुए हैं। मन से उत्पन्न हुए हैं तभी तो बुध के पिता हैं और मनोभव के अभिन्न मित्र। और तभी तो अंतर्जगत के समस्त सौंदर्य के और जीवन के निश्शेष अमृतत्व के अकेले प्रतीक हैं। चंद्रमा का कलंक है और उनकी क्षीणता भी मानव मन की क्षीणता है। अमृत-साधना का मंत्र चंद्रमा ने मन से ही तो पाया है, मन भी पार्थिव मन। चंद्रमा का पथ पृथ्वी की परिक्रमा के साथ-साथ मनुष्य की ऊँची उड़ान की लकीर है। ‘कारण गुणा:कार्यगुणारारभंते, (कारण के गुणों से कार्य के गुण होते हैं) यह न्यायशास्त्र के लिए चाहे सच हो, पर मैंने तो देखा है कि चंद्रमा कार्य होते हुए भी अपने कारण मन में अपने-अपने गुणों का प्रतिक्षेप करता रहता है। मन की पर्तों को समझने के लिए इसीलिए चंद्रमा की पर्तों को समझना आवश्यक हो जाता है। माउंट विल्सन की वेधशाला वाली दूरबीन के लिए सुना है कि चंद्रमा की दूरी केवल पचीस मील रह गई है और वहाँ से चंद्रमा का चप्पा-चप्पा जमीन की पैमाइश कर ली गई है। चंद्रमा क के नक्शे में पहाड़ों और खोहों को टेढ़े-मेढ़े जबड़ातोड़ नाम भी दिए जा चुके हैं। चंद्रमा को रसाकर मानने वालों को बड़ी निराशा हुई है यह जान कर कि रस की वहाँ एक बूँद भी नहीं है, जो कुछ सुंदरता है वह बीहड़ और उजाड़, जीवन का वहाँ सर्वथा अभाव है। इसीलिए चंद्रमा की चढ़ाई में इधर लोगों को रस नहीं मालूम होता। मन के लिए भी दूरबीन आल्प्स की घाटियों में खड़ी करने का प्रयत्न फ्रायड, जुंग और एड्लर ने किया है, पर इन की दूरबीन और रंगीन है। मन की विषमताओं के केवल अधूरे पक्ष इसकी परिधि में आ सके हैं। मन का जीवन से कितना बिलगाव है यह तो पता चल गया है, पर मन की अंदरूनी नाप-जोख अभी ठीक-ठीक नहीं हो सका है। चंद्रमा छिछोरा रहा है, उसका भेद देने के लिए अश्विनी, भरणी, कृत्तिका आदि-आदि सत्ताइस चमकने वाली पत्नियाँ हैं, जो सौतियाडाह से दहकती रहती हैं। मन की गहराई अतलस्पर्शिनी है, उसका भेद लेने के लिए सुषुप्ति तक पहुँचना पड़ता है और ‘सुन्न महल में दिअना’ जलाना पड़ता है। ‘न यत्र सूर्योभाति न चंद्र तारका नेमा विधुती भांति कुतोऽयमग्रि:’ (जहाँ सूर्य का प्रकाश नहीं, चंद्रमा का प्रकाश नहीं, आग की कोई चर्चा ही क्या उठेगी) मन का लोक पृथ्वी के परमाणु में समेट कर समस्त ब्रह्मांड से बड़ा है, उससे भी अधिक दुर्ज्ञेय है, अज्ञेय मैं न कहूँगा, क्योंकि अपने को अज्ञेय घोषित कराने वाला तो ज्ञान को चुनौती दे देकर ज्ञेय हो जाता है। मन की पैमाइश इसलिए अभी पश्चिमी मनीषी तक नहीं कर पाए हैं इतना ध्रुव है। सूक्ष्म को स्थूल बना कर देखने का जिसे अभ्यास हो, वह स्थूल से सूक्ष्म तक का साक्षात्कार कर भी नहीं सकता। पश्चिम से हमारा अभ्यास भिन्न है, हम ससीम से असीम की ओर जाने का प्रयास करते हैं, सरूप से अरूप की ओर जाने की चाहना करते हैं, और वैखरी से परा तक पहुँचने की सीढ़ी लगाते हैं, इसलिए हमने सोचा-समझा और कह दिया ‘चंद्रमा मनसो जात:’ चंद्रमा मन से उत्पन्न हुआ। मन की खोज चंद्रमा के सूत्र से ही की जा सकती है, इसी सूत्र के सहारे खोज हमने की है और चंद्रमा की पर्त चाहे न उघारी हो पर मन की गाँठ हमने खोली। सो कैसे? चंद्रमा की अमृत-साधना की बदौलत। कभी किसी ने कृष्ण पक्ष की अष्टमी के शशि को देखा है। साँझ से नीरव निशीथ तक अनंत आकाश में अनंत झिलमिलाते नक्षत्र पुंज में अपना दुविधा सुधा को बाँट बिखरा कर वारुणी के अंचल में मुँह ऊँचा कर के झाँकते हुए महासाधक को किसी ने देखा है? आधी रात के झाँय-छाँय करते हुए सूनेपन में अपनी आधी कला लुटा कर शेष आधी कला की बंकिमा में खिलते हुए इस बेला के फूल को किसी ने देखा? जिसने देखा होगा, वह मन की उस साधना का मर्म भी समझ सकेगा, जिसमें जवानी अपने हृदय का आधे-आध करके आधा हृदय हथेली पर रख कर आधे हृदय से ही उमगती रहती है। कुछ और स्थूल जगत में चलें तो इनका एक चित्र देखें। एक किशोरी के मन में एक किशोर के लिए चाह उकसती है और उसका मनचाहा उसे मिल भी जाता है, वह खुद मनचाहे की मनचाही बन जाती है। यहाँ तक कि मनचाहा उसके हाथ बिक जाता है। अंत में बीच जवानी में जब मनचाही पूरे तौर से उसका मन हथिया लेती है तब धीरे-धीरे वह एक-एक करके उस चाहे मन के पंख नोच-नोच कर अलग करने लगती है, अपनी एक-एक मुस्कान पर उसकी सौ-सौ मुरकानि करती हुई उसे निपाख और पंगु बना देती है। किंतु स्नेही का बिका हुआ मन आह नहीं भरता है, हाँ विषभरी मुस्कान की एक चोट में घायल होकर गा भर देता है। उस गान की अमृत स्वर-लहरी में जगत उसके बलिदान का प्रतिपादन पा जाता है। भर रात ठूँठ गुलाब के काँटे से अपने को छिदा कर अपने रक्त से सींच कर उस ठूँठ में सुमन खिलाने वाली आस्कर वाइल्ड की बुलबुल का बलिदान भी इस बलिदान के आगे हलका पड़ता है क्योंकि बुलबुल का बलिदान कम से कम गुलाब की हँसी मूठ में लिए रहता है और गुलाब ज्यों-ज्यों ठूँठ से हरा हो जाता है, ज्यों-ज्यों पल्लवित से किसलयित होता जाता है और ज्यों-ज्यों किसलयित से कोरकित होता जाता है त्यों-त्यों कृतज्ञता के आभार में वह तो अपने काँटे सिमटाता रहता है। बुलबुल स्वयं अपने नन्हें पैरों से खींच-खींच कर अपना हृदय काँटे में घुमाती चली जाती है। यहाँ तो मानव जगत में भरी जवानी में प्रेयसियाँ सरबस लेकर भौं सीधी नही करतीं और छटपटाते हुए मन-पँछी को मरोरती चली जाती हैं। तुलसी की सात्विक मंजरित सुरभि का स्वाद रत्नावली को नहीं मिला होगा, कालिदास की कामार्त्त विरहव्यथा की घटा उनकी विद्योत्तमा के आँगन में नहीं उनई होगी शेक्सपीयर की विरसतामई थकान की अनुभूति उनकी चतुर्दशपादियों की अज्ञात आराध्या को नहीं हुई होगी, दांते की प्रेम-यात्रा का अंदाज भी बीट्रिस को नहीं लगा होगा, घनानंद की सुजान या दूर क्यों शरत बाबू की पियारी को उनके स्वोत्सर्ग की झाईं भी न दीखी होगी। हवाई जहाज और राकेट तक पहुँच कर भी, अणु के खंड-खंड करने के बाद भी ध्वंस-शक्ति का महाजाल बिछाने के बाद भी मन के क्षेत्र में जगत लगभग वहीं है, जहाँ गुहावासी रहा होगा। मन की साधना भी लगभग वहीं है और इसलिए फ्रायड पढ़े बिना ही कालिदास का नीवीबंधोच्छ्वास समझ में आ जाता है, भवभूति का हरिचंदन पल्लवों का आश्च्योतन भी समझ में आ जाता है और देव की वियोगिनी की योगसाधना भी। मानव मन का यही बलिदान उसकी अमृत-साधना है। बिना इस सँकरे में आए वह अमृत हो नहीं पाता, बिना अमृत हुए अमृत दे भी नहीं पाता। पुराणों में कथा है कि कृष्णपक्ष में पितर लोग चंद्र की एक-एक कला पीते हैं और शुक्ल पक्ष में देवता, पर चंद्रमा पिया जाता है दोनों पक्षों में, अमावस्या के दिन सबसे बड़ा उत्सव होता है पितरों का और पूर्णिमा के दिन देवताओं का। और साल भर में अमावस्याओं में भी सबसे पुण्यवत...