श्याम नरायण पाण्डेय
परिचय श्यामनारायण पाण्डेय जन्म: 1907 निधन: 1991 जन्म स्थान मऊ, उत्तर प्रदेश, भारत कुछ प्रमुख कृतियाँ हल्दीघाटी, जौहर,तुमुल,रूपान्तर,आरती,जय-पराजय,गोरा-वध,जय हनुमान,शिवाजी (महाकाव्य) विशेष श्याम नारायण पाण्डेय का जन्म श्रावण कृष्ण पंचमी सम्वत् 1964, तदनुसार ईसवी सन् 1907 में ग्राम डुमराँव, मऊ, आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। आरम्भिक शिक्षा के बाद आप संस्कृत अध्ययन के लिए काशी चले आये। यहीं रहकर काशी विद्यापीठ से आपने हिन्दी में साहित्याचार्य किया। पाण्डेय जी के तीन विवाह हुए । पहली पत्नी से एक लड़की `सर्वदा' हुई । दूसरी पत्नी से एक पुत्र भूदेव हुआ । तीसरी पत्नी रमावती जी से एक पुत्र छविदेव और चारपुत्रियाँ हुईं । पाण्डेयजी वीर रस के अनन्य गायक हैं। इन्होंने चार महाकाव्य रचे, जिनमें 'हल्दीघाटी और 'जौहर विशेष चर्चित हुए। 'हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के जीवन और 'जौहर में रानी पद्मिनी के आख्यान हैं। 'हल्दीघाटी पर इन्हें देव पुरस्कार प्राप्त हुआ। अपनी ओजस्वी वाणी के कारण ये कवि सम्मेलनों में बडे लोकप्रिय थे। डुमराँव में अपने घर पर रहते हुए ईसवी सन् 1991 में 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। मृत्यु से तीन वर्ष पूर्व आकाशवाणी गोरखपुर में अभिलेखागार हेतु उनकी आवाज में उनके जीवन के संस्मरण रिकार्ड किये गये। श्याम नारायण पाण्डेय जी ने चार उत्कृष्ट महाकाव्य रचे, जिनमें हल्दीघाटी (काव्य) सर्वाधिक लोकप्रिय और जौहर (काव्य) विशेष चर्चित हुए। हल्दीघाटी में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के जीवन और जौहर में चित्तौड की रानी पद्मिनी के आख्यान हैं। हल्दीघाटी के नाम से विख्यात राजस्थान की इस ऐतिहासिक वीर भूमि के लोकप्रिय नाम पर लिखे गये हल्दीघाटी महाकाव्य पर उनको उस समय का सर्वश्रेष्ठ सम्मान देव पुरस्कार प्राप्त हुआ था। अपनी ओजस्वी वाणी के कारण आप कवि सम्मेलन के मंचों पर अत्यधिक लोकप्रिय हुए। उनकी आवाज मरते दम तक चौरासी वर्ष की आयु में भी वैसी ही कड़कदार और प्रभावशाली बनी रही जैसी युवावस्था में थी । उनका लिखा हुआ महाकाव्य जौहर भी अत्यधिक लोकप्रिय हुआ । उन्होंने यह महाकाव्य चित्तौड की महारानी पद्मिनी के वीरांगना चरित्र को चित्रित करने के उद्देश्य को लेकर लिखा था ।.जौहर महाकाव्य 'जौहर' पाण्डेय जी का द्वितीय महाकाव्य है। कुल 21 चिनगारियों का यह प्रबन्ध चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी को कथाधार बनाकर रचा गया है। इस ग्रंथ में वीर-रस के साथ करुण का भी गम्भीर पुट है। 'जौहर' की कहानी राजस्थान के इतिहास के लोमहर्षक आत्म-बलिदान की ज्वलंत कथा है। उत्साह और करुणा, शौर्य और विवशता, रूप और नश्वरता, भोग और आत्म-सम्मान के भावों के प्रवाह काव्य को हर्ष और विषाद की अनोखी गहनता प्रदान करते हैं। 'जौहर' में पाण्डेय जी ने एक मौलिक वीर-रस शैली का उद्घाटन किया है। छन्दों में 'हल्दी घाटी' से अधिक वेग एवं भावानुकूल गति है। डोले का वर्णन एवं चिता-वर्णन की चिनगारियाँ अत्यंत प्रभावभूर्ण एवं मर्मस्पर्शी हैं। लोक-छन्दों के सहारे नवीन लयों एवं गतियों को पकड़ने का सफल प्रयास स्तुत्य है । प्रारम्भ में प्रस्तुत है पाण्डेय की कुछ रचनाएँ उनके खंडकाव्य हल्दीघाटी से व अन्य रचनाएँ घास की रोटी अपनी तुतली भाषा में वह सिसक–सिसककर बोली¸ जलती थी भूख तृषा की उसके अन्तर में होली।।32।। 'हा छही न जाती मुझछे अब आज भूख की ज्वाला। कल छे ही प्याछ लगी है हो लहा हिदय मतवाला।।33।। मां ने घाछों की लोती मुझको दी थी खाने को¸ छोते का पानी देकल वह बोली भग जाने को।।34।। अम्मा छे दूल यहीं पल छूकी लोती खाती थी। जो पहले छुना चुकी हूं¸ वह देछ–गीत गाती थी।।35।। छच कहती केवल मैंने एकाध कवल खाया था। तब तक बिलाव ले भागा जो इछी लिए आया था।।36।। छुनती हूं तू लाजा है मैं प्याली छौनी तेली। क्या दया न तुझको आती यह दछा देखकल मेली।।37।। लोती थी तो देता था¸ खाने को मुझे मिठाई। अब खाने को लोती तो आती क्यों तुझे लुलाई।।38।। वह कौन छत्रु है जिछने छेना का नाछ किया है? तुझको¸ मां को¸ हंम छभको¸ जिछने बनबाछ दिया है।।39।। यक छोती छी पैनी छी तलवाल मुझे भी दे दे। मैं उछको माल भगाऊं छन मुझको लन कलने दे।।40।। कन्या की बातें सुनकर रो पड़ी अचानक रानी। राणा की आंखों से भी अविरल बहता था पानी।।41।। चेतक की वीरता रण बीच चौकड़ी भर-भर कर चेतक बन गया निराला था राणाप्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा का पाला था जो तनिक हवा से बाग हिली लेकर सवार उड़ जाता था राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड़ जाता था गिरता न कभी चेतक तन पर राणाप्रताप का कोड़ा था वह दौड़ रहा अरिमस्तक[1] पर वह आसमान का घोड़ा था था यहीं रहा अब यहाँ नहीं वह वहीं रहा था यहाँ नहीं थी जगह न कोई जहाँ नहीं किस अरिमस्तक पर कहाँ नहीं निर्भीक गया वह ढालों में सरपट दौडा करबालों में फँस गया शत्रु की चालों में बढ़ते नद-सा वह लहर गया फिर गया गया फिर ठहर गया विकराल वज्रमय बादल-सा अरि[2] की सेना पर घहर गया भाला गिर गया गिरा निसंग हय[3] टापों से खन गया अंग बैरी समाज रह गया दंग घोड़े का ऐसा देख रंग राणा प्रताप की तलवार चढ़ चेतक पर तलवार उठा, रखता था भूतल पानी को। राणा प्रताप सिर काट काट, करता था सफल जवानी को॥ कलकल बहती थी रणगंगा, अरिदल को डूब नहाने को। तलवार वीर की नाव बनी, चटपट उस पार लगाने को॥ वैरी दल को ललकार गिरी, वह नागिन सी फुफकार गिरी। था शोर मौत से बचो बचो, तलवार गिरी तलवार गिरी॥ पैदल, हयदल, गजदल में, छप छप करती वह निकल गई। क्षण कहाँ गई कुछ पता न फिर, देखो चम-चम वह निकल गई॥ क्षण इधर गई क्षण उधर गई, क्षण चढ़ी बाढ़ सी उतर गई। था प्रलय चमकती जिधर गई, क्षण शोर हो गया किधर गई॥ लहराती थी सिर काट काट, बलखाती थी भू पाट पाट। बिखराती अवयव बाट बाट, तनती थी लोहू चाट चाट॥ क्षण भीषण हलचल मचा मचा, राणा कर की तलवार बढ़ी। था शोर रक्त पीने को यह, रण-चंडी जीभ पसार बढ़ी॥ चलो दिल्ली रगों में खूँ उबलता है, हमारा जोश कहता है। जिगर में आग उठती है, हमारा रोष कहता है। उधर कौमी तिरंगे को, संभाले बोस कहता है। बढ़ो तूफ़ान से वीरों, चलो दिल्ली ! चलो दिल्ली! अभी आगे पहाड़ों के, यहीं बंगाल आता है, हमारा नवगुरुद्वारा, यही पंजाब आता है। जलाया जा रहा काबा, लगी है आग काशी में, युगों से देखती रानी, हमारी राह झांसी में। जवानी का तकाजा है, रवानी का तकाजा है, तिरंगे के शहीदों की कहानी का तकाजा है। बुलाती है हमें गंगा, बुलाती घाघरा हमको। हमारे लाडलो आओ, बुलाता आगरा हमको। …… ने पुकारा है, हमारे देश के लोहिया, उषा, जय ने पुकारा है। गुलामी की कड़ी तोड़ो, तड़ातड़ हथकड़ी तोड़ो। लगा कर होड़ आंधी से, जमीं से आसमां जोड़ो। शिवा की आन पर गरजो, कुँवर बलिदान पर गरजो, बढ़ो जय हिन्द नारे से, कलेजा थरथरा दें हम। किले पर तीन रंगों का, फरहरा फरफरा दें हम। शीत रजनी हेमन्त-शिशिर का शासन, लम्बी थी रात विरह-सी। संयोग-सदृश लघु वासर, दिनकर की छवि हिमकर-सी।। निर्धन के फटे पुराने पट के छिद्रों से आकर, शर-सदृश हवा लगती थी पाषाण-हृदय दहला कर।। लगती चन्दन-सी शीतल पावक की जलती ज्वाला। वाड़व भी काँप रहा था। पहने तुषार की माला।। जग अधर विकल हिलते थे चलदल के दल से थर-थर। ओसों के मिस नभ-दृग से बहते थे आँसू झर-झर।। यव की कोमल बालों पर, मटरों की मृदु फलियों पर, नभ के आँसू बिखरे थे तीसी की नव कलियों पर।। घन-हरित चने के पौधे, जिनमें कुछ लहुरे जेठे, भिंग गये ओस के बल से सरसों के पीत मुरेठे।। यह शीत काल की रजनी कितनी भयदायक होगी। पर उसमें भी करता था तप एक वियोगी योगी। जौहर [खंडकाव्य ] मंगलाचरण गगन के उस पार क्या, पाताल के इस पार क्या है? क्या क्षितिज के पार? जग जिस पर थमा आधार क्या है? दीप तारों के जलाकर कौन नित करता दिवाली? चाँद - सूरज घूम किसकी आरती करते निराली? चाहता है सिन्धु किस पर जल चढ़ाकर मुक्त होना? चाहता है मेघ किसके चरण को अविराम धोना? तिमिर - पलकें खोलकर प्राची दिशा से झाँकती है; माँग में सिन्दूर दे ऊषा किसे नित ताकती है? गगन में सन्ध्या समय किसके सुयश का गान होता? पक्षियों के राग में किस मधुर का मधु - दान होता? पवन पंखा झल रहा है, गीत कोयल गा रही है। कौन है? किसमें निरन्तर जग - विभूति समा रही है? तूलिका से कौन रँग देता तितलियों के परों को? कौन फूलों के वसन को, कौन रवि - शशि के करों को? कौन निर्माता? कहाँ है? नाम क्या है? धाम क्या है? आदि क्या निर्माण का है? अन्त का परिणाम क्या है? खोजता वन - वन तिमिर का ब्रह्म पर पर्दा लगाकर। ढूँढ़ता है अन्ध मानव ज्योति अपने में छिपाकर॥ बावला उन्मत्त जग से पूछता अपना ठिकाना। घूम अगणित बार आया, आज तक जग को न जाना॥ सोचता जिससे वही है, बोलता जिससे वही है। देखने को बन्द आँखें खोलता जिससे वही है॥ आँख में है ज्योति बनकर, साँस में है वायु बनकर। देखता जग - निधन पल - पल, प्राण में है आयु बनकर॥ शब्द में है अर्थ बनकर, अर्थ में है शब्द बनकर। जा रहे युग - कल्प उनमें, जा रहा है अब्द बनकर॥ यदि मिला साकार तो वह अवध का अभिराम होगा। हृदय उसका धाम होगा, नाम उसका राम होगा॥ सृष्टि रचकर ज्योति दी है, शशि वही, सविता वही है। काव्य - रचना कर रहा है, कवि वही, कविता वही है॥ पहली चिनगारी थाल सजाकर किसे पूजने चले प्रात ही मतवाले? कहाँ चले तुम राम नाम का पीताम्बर तन पर डाले? कहाँ चले ले चन्दन अक्षत बगल दबाए मृगछाला? कहाँ चली यह सजी आरती? कहाँ चली जूही माला? ले मुंजी उपवीत मेखला कहाँ चले तुम दीवाने? जल से भरा कमंडलु लेकर किसे चले तुम नहलाने? मौलसिरी का यह गजरा किसके गज से पावन होगा? रोम कंटकित प्रेम - भरी इन आँखों में सावन होगा? चले झूमते मस्ती से तुम, क्या अपना पथ आए भूल? कहाँ तुम्हारा दीप जलेगा, कहाँ चढ़ेगा माला - फूल? इधर प्रयाग न गंगासागर, इधर न रामेश्वर, काशी। कहाँ किधर है तीर्थ तुम्हारा? कहाँ चले तुम संन्यासी? क्षण भर थमकर मुझे बता दो, तुम्हें कहाँ को जाना है? मन्त्र फूँकनेवाला जग पर अजब तुम्हारा बाना है॥ नंगे पैर चल पड़े पागल, काँटों की परवाह नहीं। कितनी दूर अभी जाना है? इधर विपिन है, राह नहीं॥ मुझे न जाना गंगासागर, मुझे न रामेश्वर, काशी। तीर्थराज चित्तौड़ देखने को मेरी आँखें प्यासी॥ अपने अचल स्वतंत्र दुर्ग पर सुनकर वैरी की बोली निकल पड़ी लेकर तलवारें जहाँ जवानों की टोली, जहाँ आन पर माँ - बहनों की जला जला पावन होली वीर - मंडली गर्वित स्वर से जय माँ की जय जय बोली, सुंदरियों ने जहाँ देश - हित जौहर - व्रत करना सीखा, स्वतंत्रता के लिए जहाँ बच्चों ने भी मरना सीखा, वहीं जा रहा पूजा करने, लेने सतियों की पद-धूल। वहीं हमारा दीप जलेगा, वहीं चढ़ेगा माला - फूल॥ वहीं मिलेगी शान्ति, वहीं पर स्वस्थ हमारा मन होगा। प्रतिमा की पूजा होगी, तलवारों का दर्शन होगा॥ वहाँ पद्मिनी जौहर-व्रत कर चढ़ी चिता की ज्वाला पर, क्षण भर वहीं समाधि लगेगी, बैठ इसी मृगछाला पर॥ नहीं रही, पर चिता - भस्म तो होगा ही उस रानी का। पड़ा कहीं न कहीं होगा ही, चरण - चिह्न महरानी का॥ उस पर ही ये पूजा के सामान सभी अर्पण होंगे। चिता - भस्म - कण ही रानी के, दर्शन - हित दर्पण होंगे॥ आतुर पथिक चरण छू छूकर वीर - पुजारी से बोला; और बैठने को तरु - नीचे, कम्बल का आसन खोला॥ देरी तो होगी, पर प्रभुवर, मैं न तुम्हें जाने दूँगा। सती - कथा - रस पान करूँगा, और मन्त्र गुरु से लूँगा॥ कहो रतन की पूत कहानी, रानी का आख्यान कहो। कहो सकल जौहर की गाथा, जन जन का बलिदान कहो॥ कितनी रूपवती रानी थी? पति में कितनी रमी हुई? अनुष्ठान जौहर का कैसे? संगर में क्या कमी हुई? अरि के अत्याचारों की तुम सँभल सँभलकर कथा कहो। कैसे जली किले पर होली? वीर सती की व्यथा कहो॥ नयन मूँदकर चुप न रहो, गत–व्याधि, समाधि लगे न कहीं। सती - कहानी कहने की, अन्तर से चाह भगे न कहीं॥ आकुल कुल प्रश्नों को सुनकर मुकुलित नयनों को खोला। वीर – करुण – रस - सिंचित स्वर से सती – तीर्थ - यात्री बोला॥ क्या न पद्मिनी – जौहर का आख्यान सुना प्राचीनों से? क्या न पढ़ा इतिहास सती का विद्या – निरत नवीनों से? यदि न सुना तो सुनो कहानी सती – पद्मिनी – रानी की। पर झुक झुककर करो वन्दना, पहले पहल भवानी की॥ रूपवान था रतन, पद्मिनी रूपवती उसकी रानी। दम्पति के तन की शोभा से जगमग जगमग रजधानी॥ रानी की कोमलता पर कोमलता ही बलिहारी थी। छुईमुई – सी कुँभला जाती, वह इतनी सुकुमारी थी॥ राजमहल से छत पर निकली, हँसती शशि - किरणें आईं। मलिन न छवि छूने से हो, इससे विहरीं बन परछाईं॥ मलयानिल पर रहती थी, वह कुसुम – सुरभि पर सोती थी। जग की पलकों पर बसकर, प्राणों से प्राण सँजोती थी॥ ऊषा की स्वर्णिम किरणों के झूले पर झूला करती। राजमहल के नंदन - वन में, बेला सी फूला करती॥ बिखरे केशों में अँधियाली, मुख पर छायी उजियाली। राका – अमा – मिलन होता था, भरी माँग की ले लाली॥ बालों में सिन्दूर चिह्न ही था दो प्राणों का बंधन। मानो घनतम तिमिर चीरकर, हँसी उषा की एक किरन॥ बालमृगी - सी आँखों में आकर्षण ने डेरा डाला। सुधा - सिक्त विद्रुम - अधरों पर मदिरा ने घेरा डाला॥ मधुर गुलाबी गालों पर, मँडराती फिरती मधुपाली। एक घूँट पति साथ पिया मधु, चढ़ी गुलाबी पर लाली॥ आँखों से सरसीरुह ने सम्मोहन जा जाकर सीखा। रानी का मधुवर्षी स्वर कोयल ने गा गाकर सीखा॥ घूँघट – पट हट गया लाज से, मुसकाई जग मुसकाया। निःश्वासों की सरस सुरभि से फूलों में मधुरस आया॥ अरुण कमल ने जिनके तप से इतनी सी लाली पाई। फूलों पर चलने से जिनमें नवनी - सी मृदुता आई॥ फैल रही थी दिग्दिगन्त में जिनकी नख - छबि मतवाली, उन पैरों पर सह न सकी लाक्षारस की कृत्रिम लाली॥ नवल गुलाबों ने हँस हँसकर सुरभि रूप में भर डाली। कमल - कोष से उड़ उड़कर भौंरों ने भी भाँवर डाली॥ जैसी रूपवती रानी थी, वैसा ही था पति पाया। मानो वासव साथ शची का रूप धरातल पर आया॥ भरे यहीं से तंत्र – मंत्र मनसिज ने अपने बाणों में। पति के प्राणों में पत्नी थी, पति पत्नी के प्राणों में॥ दो मुख थे पर एक मधुरध्वनि, दो मन थे पर एक लगन। दो उर थे पर एक कल्पना, एक मगन तो अन्य मगन॥ विरह नाम से ही व्याकुलता, जीवन भर संयोग रहा। एक मनोहर सिंहासन पर, सूर्य - प्रभा का योग रहा॥ रानी कहती नव वसन्त में कोयल किसको तोल रही। पति के साथ सदा राका यह कुहू कुहू क्यों बोल रही? सावन के रिमझिम में पापी डाल – डाल पर डोला क्यों? पी तो मेरे साथ – साथ ‘पी कहाँ’ पपीहा बोला क्यों? त्रिभुवन के कोने कोने में, रूप - राशि की ख्याति हुई। रूपवती के पातिव्रत पर गर्वित नारी – जाति हुई॥ ग्राम – ग्राम में, नगर – नगर में, डगर – डगर में, घर - घर में पति - पत्नी का ही बखान मुखरित था अवनी - अम्बर में॥ सुनी अलाउद्दीन राहु ने चन्द्रमुखी की तरुणाई। उसे विभव का लालच देकर, की ग्रसने की निठुराई॥ जितने अत्याचार किए उन सबका क्या वर्णन होगा! सुनने पर वह करुण कहानी विकल तुम्हारा मन होगा॥ बोला वह पथिक पुजारी से, पावन गाथा आरम्भ करो। चाहे जो हो पर दम्पति का मेरे अन्तर में त्याग भरो॥ दलबल लेकर खिलजी ने क्या गढ़ पर ललकार चढ़ाई की? क्या रावल के नरसिंहों से रानी के लिए लड़ाई की? उस संगर का आख्यान कहो, तुम कहो कहानी रानी की। समझा समझा इतिहास कहो, तुम कहो कथा अभिमानी की॥ जप जप माला निर्भय वर्णन जौहर का करने लगा यती। आख्यान - सुधा अधिकारी के अन्तर में भरते लगा यती॥ दूसरी चिनगारी निशि चली जा रही थी काली प्राची में फैली थी लाली। विहगों के कलरव करने से, थी गूँज रही डाली डाली॥ सरसीरुह ने लोचन खोले, धीरे धीरे तरु-दल डोले। फेरी दे देकर फूलों पर, गुन-गुन गुन-गुन भौंरे बोले॥ सहसा घूँघट कर दूर हँसी सोने की हँसी उषा रानी। मिल मिल लहरों के नर्तन से चंचल सरिता सर का पानी॥ मारुत ने मुँह से फूँक दिया, बुझ गए दीप नभ - तारों के। कुसुमित कलियों से हँसने को, मन ललचे मधुप - कुमारों के॥ रवि ने वातायन से झाँका, धीरे से रथ अपना हाँका। तम के परदों को फेंक सजग, जग ने किरणों से तन ढाँका॥ दिनकर – कर से चमचम बिखरे, भैरवतम हास कटारों के। चमके कुन्तल – भाले – बरछे, दमके पानी तलवारों के॥ फैली न अभी थी प्रात - ज्योति, आँखें न खुली थीं मानव की। तब तक अनीकिनी आ धमकी, उस रूप लालची – दानव की॥ क्षण खनी जा रही थी अवनी घोड़ों की टप - टप टापों से। क्षण दबी जा रही थी अवनी रण – मत्त मतंग – कलापों से॥ भीषण तोपों के आरव से परदे फटते थे कानों के। सुन – सुन मारू बाजों के रव तनते थे वक्ष जवानों के॥ जग काँप रहा था बार – बार अरि के निर्दय हथियारों से। थल हाँफ रहा था बार – बार हय – गज – गर्जन हुंकारों से। भू भगी जा रही थी नभ पर, भय से वैरी - तलवारों के। नभ छिपा जा रहा था रज में, डर से अरि - क्रूर - कटारों के॥ कोलाहल - हुंकृति बार – बार आई वीरों के कानों में। बापा रावल की तलवारें बंदी रह सकीं न म्यानों में॥ घुड़सारों से घोड़े निकले, हथसारों से हाथी निकले। प्राणों पर खेल कृपाण लिए गढ़ से सैनिक साथी निकले॥ बल अरि का ले काले कुंतल विकराल ढाल ढाले निकले। वैरी – वर छीने बरछी ने, वैरी – भा ले भाले निकले॥ हय पाँख लगाकर उड़ा दिए नभ पर सामंत सवारों ने। जंगी गज बढ़ा दिए आगे अंकुश के कठिन प्रहारों ने॥ फिर कोलाहल के बीच तुरत खुल गया किले का सिंहद्वार। हुं हुं कर निकल पड़े योधा, धाए ले – ले कुंतल कटार॥ बोले जय हर हर ब्याली की, बोले जय काल कपाली की। बोले जय गढ़ की काली की, बोले जय खप्परवाली की॥ खर करवालों की जय बोले, दुर्जय ढालों की जय बोले, खंजर - फालों की जय बोले, बरछे - भालों की जय बोले॥ बज उठी भयंकर रण - भेरी, सावन - घन - से धौंसे गाजे। बाजे तड़ - तड़ रण के डंके, घन घनन घनन मारू बाजे॥ पलकों में बलती चिनगारी, कर में नंगी करवाल लिए। वैरी - सेना पर टूट पड़े, हर - ताण्डव के स्वर - ताल लिए॥ भैरव वन में दावानल - सम, खग - दल में बर्बर - बाज - सदृश, अरि - कठिन - व्यूह में घुसे वीर, मृग - राजी में मृगराज - सदृश॥ आँखों से आग बरसती थी, थीं भौंहें तनी कमानों - सी। साँसों में गति आँधी की थी, चितवन थी प्रखर कृपानों - सी॥ तलवार गिरी वैरी - शिर पर, धड़ से शिर गिरा अलग जाकर। गिर पड़ा वहीं धड़, असि का जब भिन गया गरल रग रग जाकर॥ गज से घोड़े पर कूद पड़ा, कोई बरछे की नोक तान। कटि टूट गई, काठी टूटी, पड़ गया वहीं घोड़ा उतान॥ गज - दल के गिर हौदे टूटे, हय - दल के भी मस्तक फूटे। बरछों ने गोभ दिए, छर छर शोणित के फौवारे छूटे॥ लड़ते सवार पर लहराकर खर असि का लक्ष्य अचूक हुआ। कट गया सवार गिरा भू पर, घोड़ा गिरकर दो टूक हुआ॥ क्षण हाथी से हाथी का रण, क्षन घोड़ों से घोड़ों का रण। हथियार हाथ से छूट गिरे, क्षण कोड़ों से कोड़ों का रण॥ क्षण भर ललकारों का संगर, क्षण भर किलकारों का संगर। क्षण भर हुंकारों का संगर, क्षण भर हथियारों का संगर॥ कटि कटकर बही, कटार बही, खर शोणित में तलवार बही। घुस गए कलेजों में खंजर, अविराम रक्त की धार बही॥ सुन नाद जुझारू के भैरव, थी काँप रही अवनी थर थर। घावों से निर्झर के समान बहता था गरम रुधिर झर झर॥ बरछों की चोट लगी शिर पर, तलवार हाथ से छूट पड़ी। हो गए लाल पट भीग भीग, शोणित की धारा फूट पड़ी॥ रावल - दल का यह हाल देख वैरी - दल संगर छोड़ भगा। हाथों के खंजर फेंक फेंक खिलजी से नाता तोड़ भगा॥ सेनप के डर से रुके वीर, पर काँप रहे थे बार - बार। डट गए तान संगीन तुरत, पर हाँफ रहे थे वे अपार॥ खूँखार भेड़ियों के समान भट अरि - भेड़ों पर टूट पड़े। अवसर न दिया असि लेने का शत - शत विद्युत् से छूट पड़े॥ लग गए काटने वैरी - शिर, अपनी तीखी तलवारों से। लग गए पाटने युद्धस्थल, बरछों से कुन्त-कटारों से॥ अरि - हृदय - रक्त का खप्पर पी थीं तरज रही क्षण क्षण काली। दाढ़ों में दबा दबाकर तन वह घूम रही थी मतवाली॥ चुपचाप किसी ने भोंक दिया, उर - आरपार कर गया छुरा। झटके से उसे निकाल लिया, अरि - शोणित से भर गया छुरा॥ हय - शिर उतार गज - दल विदार, अरि - तन दो दो टुकड़े करती। तलवार चिता - सी बलती थी, थी रक्त - महासागर तरती॥ तीसरी चिनगारी शीशमहल की दीवालों पर शोभित नंगी तसवीरें। चित्रकार ने लिखीं बेगमों की बहुरंगी तस्वीरें॥ घूमीं परियाँ आँगन में, प्रतिबिम्ब दिवालों में घूमे। झूमी सुन्दरियाँ मधु पी, प्रतिबिम्ब दीवालों में झूमे॥ देह – सुरभि फैली गज – गति में, छूकर छोर कुलाबों के। मधुमाते चलते फिरते हों, मानो फूल गुलाबों के॥ छमछम दो डग चलीं, नूपुरों की ध्वनि महलों में गूँजी। बोली मधुरव से, नखरे से, कोयल डालों पर कूजी॥ उस पर दो दो रति – प्रतिमाएँ तिरछी चितवन से जीतीं। उनसे पूछो, उन्हें देखने में कितनी रातें बीतीं॥ कटि मृणाल - सी ललित लचीली, नाभी की वह गहराई। त्रिबली पर अंजन रेखा - सी, रोम – लता – छवि लहराई॥ भरी जवानी में तन की क्या पूछ रहे हो सुघराई! पथिक, थकित थी उनके तन की सुघराई पर सुघराई॥ साकी ने ली कनक – सुराही, कमरे में महकी हाला। भीनी सुरभि उठी मदिरा की, बना मधुप – मन मतवाला॥ मह मह सकल दिशाएँ महकीं, महके कण दीवालों के। सुरा – प्रतीक्षा में चेतन क्या, हिले अधर मधु - प्यालों के॥ हँसी बेगमों की आँखें, मुख भीतर रसनाएँ डोलीं। गंध कबाबों की गमकी, ‘मधु चलो पियें’ सखियाँ बोलीं॥ बड़े नाज से झुकी सुराही, कुल कुल कुल की ध्वनि छाई। सोने – चाँदी के पात्रों में लाल लाल मदिरा आई॥ एक घूँट, दो घूँट नहीं, प्यालों पर प्याले टकराए। और भरो मधु और पियो मधु के रव महलों में छाए॥ मधु पी मत्त हुईं सुन्दरियाँ, आँखों में सुर्खी छाई। वाणी पर अधिकार नहीं अब, गति में चंचलता आई॥ दो सखियों का वक्ष - मिलन, मन-मिलन, पुलक-सिहरन-कम्पन। दो प्राणों के मधु मिलाप से अलस नयन, उर की धड़कन॥ खुली अधखुली आँखों में, उर – दान – वासना का नर्तन। एक – दूसरे को नर समझा, सजल नयन, अर्पित तन – मन॥ डगमग डगमग पैर पड़े, हाथों से मधु ढाले छूटे। गिरे संगमरमर के गच पर, नीलम के प्याले फूटे॥ गिरे वक्ष से वसन रेशमी, गुँथे केश के फूल गिरे। मस्त बेगमों के कन्धों से धीरे सरक दुकूल गिरे॥ मिल मिल नाच उठीं सुन्दरियाँ, हार मोतियों के टूटे। तसवीरों के तरुणों ने अनिमेष दृगों के फल लूटे॥ माणिक की चौकी से भू पर, मधु के पात्र गिरे झन झन। बिखरे कंचन के गुलदस्ते, गिरे धरा पर मणि - कंगन॥ मदिरा गिरी बही अवनी पर, हँसीं युवतियाँ मतवाली। कमरे के गिर शीशे टूटे, बजी युवतियों की ताली॥ नीलम मणि के निर्मल गच पर गिरी सुराही चूर हुई। कलकल से मूर्च्छित खिलजी की कुछ कुछ मूर्च्छा दूर हुई॥ हँसीं, गा उठीं, वेणु बजे, स्वर निकले मधुर सितारों से। राग – रागिनी थिरकीं, मुखरित वीणा के मृदु तारों से॥ परियों के मुख से स्वर – लहरी निकली मधुर मधुर ताजी। सारंगी के ताल ताल पर छम छम छम पायल बाजी॥ एक साथ गा उठीं युवतियाँ, मूर्च्छित के खुल गए नयन। कर्कश स्वर के तारतम्य से उठा त्याग कर राजशयन॥ बोला कहाँ मधुर मदिरा है? कहाँ घूँट भर पानी है? कहाँ पद्मिनी, कहाँ पद्मिनी, कहाँ पद्मिनी रानी है? हाव – भाव से चलीं युवतियाँ सुन उन्मादी की बोली। राग – रागिनी रुकी, रुका स्वर, बन्द हुई मधु की होली॥ आकर उसे रिझाया हिलमिल, सुरा - पात्र दे दे खेला। हाथों में उसके हाथों की अंगुलियों को ले खेला॥ नयन – कोर से क्षण देखा, क्षण होंठों पर ही मुसकायीं, जिधर अंग हिल गया उधर ही, परियों की आँखें धायीं॥ उन्मादी के खुले वक्ष पर कर रख कोई अलसाई। तोड़ तोड़कर अंग हाव से रह रहकर ली जमुहाई॥ आलिंगन के लिए मनोहर, मृदुल भुजाएँ फैलाईं। खिलजी की गोदी में गिर गिर, आँख मूँद, ली जमुहाई॥ उन्मादी ने करवट बदली, छम छम नखरे से घूमीं। उसकी पलकों को चूमा, मधु – मस्ती में झुक झुक झूमीं॥ पर इनका कुछ असर न देखा तुरत तरुणियाँ मुरझाईं, अरुण कपोलों पर विषाद की रेखा झलकी, कुँभलाईं॥ अपनी कजरारी आँखों पर, अपने गोल कपोलों पर, अरुण अधर पर, नाहर कटि – पर, सुधाभरे मधु बोलों पर, अपने तन के रूप - रंग पर, अपने तन के पानी पर, अपने नाजों पर, नखरों पर, अपनी चढ़ी जवानी पर, घृणा हुई, गड़ गईं लाज से, मादक यौवन से ऊबीं। भरी निराशा में सुन्दरियाँ चिन्ता – सागर में डूबीं॥ बोल उठा उन्मादी फिर, मुझको थोड़ा सा पानी दो। कहाँ पद्मिनी, कहाँ पद्मिनी, मुझे पद्मिनी रानी दो॥ बोलो तो क्या तुम्हें चाहिए, उसे ढूँढकर ला दूँ मैं। रूपराशि के एक अंश पर ही, साम्राज्य लुटा दूँ मैं॥ कब अधरों के मधुर हास से विकसित मेरा मन होगा! कब चरणों के नख - प्रकाश से जगमग सिंहासन होगा॥ बरस रहा आँखों से पानी, उर में धधक रही ज्वाला। मुझ मुरदे पर ढुलका दो अपनी छबि – मदिरा का प्याला॥ प्राणों की सहचरी पद्मिनी, वह देखो हँसती आई। ज्योति महल में फैल गई, लो बिखरी तन की सुघराई॥ आज छिपाकर तुम्हें रखूँगा, अपने मणि के हारों में; अपनी आँखों की पुतली में, पुतली के लघु तारों में॥ हाय पद्मिनी कहाँ गई? फिर क्यों मुझसे इतनी रूठी। अभी न मैंने उसे पिन्हा पाई हीरे की अंगूठी॥ किस परदे में कहाँ छिपी मेरे प्राणों की पहचानी। हाय पद्मिनी, हाय पद्मिनी, हाय पद्मिनी, महरानी॥ इतने में चित्तौड़ नगर से, गुप्त दूत आ गया वहाँ। उन्मादी ने आँखें खोलीं, भगीं युवतियाँ जहाँ तहाँ॥ बड़े प्रेम से खिलजी बोला, कहो यहाँ कब आए हो। दूर देश चित्तौड़ नगर से समाचार क्या लाए हो? मुझे विजय मिल सकती क्या रावल – कुल के रणधीरों से? मुझे पद्मिनी मिल सकती क्या सदा अर्चिता वीरों से॥ सुनो पद्मिनी के बारे में चुप न रहो कुछ कहा करो। जब तक पास रहो उसकी ही मधु – मधु बातें कहा करो॥ किया दूत ने नमस्कार फिर, कहने को रसना डोली। निकल पड़ी अधरों के पथ से विनय भरी मधुमय बोली॥ जहाँ आप हैं, वहीं विजय है, जहाँ चरण सुख स्वर्ग वहीं। जहाँ आप हैं वहीं पद्मिनी, जहाँ आप अपवर्ग वहीं॥ अभी आप इंगित कर दें, नक्षत्र आपके घर आवें। रखा पद्मिनी में क्या, नभ से सूरज – चाँद उतर आवें॥ जिधर क्रोध से आप देख दें, उधर प्रलय की ज्वाला हो। जिधर प्रेम से आप देख दें, उधर फूल हो, माला हो॥ महापुरुष चित्तौड़ नगर के पास परी सी चित्तौड़ी। सौत पद्मिनी को न चाहती, वहीं मानिनी सी पौढ़ी॥ उसकी लेकर मदद आप चाहें तो पहनें जय - माला। उससे ही खिंच आ सकती है, गढ़ की प्रभा रतन – बाला॥ और रानियाँ हो सकतीं उसके पैरों की धूल नहीं। सच कहता उसके समान हँसते उपवन के फूल नहीं॥ रोम – रोम लावण्य भरा है, रोम – रोम माधुर्य भरा। बोल – बोल में सुधा लहरती, शब्द शब्द चातुर्य भरा॥ हिम – माला है, पर ज्वाला भी, लक्ष्मी है, पर काली भी। दो डग चलना दुर्लभ, पर अवसर पर रण - मतवाली भी॥ कानों से सुनकर आँखों से देखा, जाना, पहचाना। रतन – रूप की दीप – शिखा का समझें उसको परवाना॥ इससे पहले जाल प्रेम के आप बिछावें बिछवावें। इस पर मिले न तरुणी तब फिर, रण के बाजे बजवावें॥ इस प्रयत्न से कठिन न उसका विवश अंक में आ जाना। शरद – चाँदनी सी आकर प्राणों में बिखर समा जाना॥ बड़े ध्यान से वचन सुने ये, खिलजी ने अँगड़ाई ली। बोला कहो सजे सेना अब, भैरव सी जमुहाई ली॥ क्षण भर में ही बजे नगाड़े, गरज उठे रण के बाजे। निकल पड़ीं झनझन तलवारें, सजे वीर हय - गज गाजे॥ उधर दुर्ग - सन्निधि अरि आया, रूप – ज्वाल को रख प्राणो में। रतन चला आखेट खेलने, इधर भयद वन के झाड़ों में॥ मृग – दम्पति को मार विपिन में रावल ने जो पुण्य कमाया। वनदेवी का तप्त शाप ले खिलजी से उसका फल पाया॥ वीर पुजारी विपिन – कहानी लगा सुनाने चिंतित होकर। सुनने लगा पथिक दंपति की करुण – सुधा से सिंचित होकर॥ बोला पथिक पुजारी से, क्यों वनदेवी ने शाप दिया था। क्यों कैसे अपराध हुआ, क्या रावल को जो ताप दिया था॥ कहो न देर करो, अब मेरी उत्कंठा बढ़ती जाती है। सुनने को विस्मित गाथा वह मेरी इच्छा अकुलाती है॥ हल्दीघाटी [खंडकाव्य ] प्रथम सर्ग वण्डोली है यही¸ यहीं पर है समाधि सेनापति की। महातीर्थ की यही वेदिका¸ यही अमर–रेखा स्मृति की।।1।। एक बार आलोकित कर हा¸ यहीं हुआ था सूर्य अस्त। चला यहीं से तिमिर हो गया अन्धकार–मय जग समस्त।।2।। आज यहीं इस सिद्ध पीठ पर फूल चढ़ाने आया हूँ। आज यहीं पावन समाधि पर दीप जलाने आया हूँ।।3।। आज इसी छतरी के भीतर सुख–दुख गाने आया हूँ। सेनानी को चिर समाधि से आज जगाने आया हूँ।।4।। सुनता हूँ वह जगा हुआ था जौहर के बलिदानों से। सुनता हूँ वह जगा हुआ था बहिनों के अपमानों से।।5।। सुनता हूँ स्त्री थी अँगड़ाई अरि के अत्याचारों से। सुनता हूँ वह गरज उठा था कड़ियों की झनकारों से।।6।। सजी हुई है मेरी सेना¸ पर सेनापति सोता है। उसे जगाऊँगा¸ विलम्ब अब महासमर में होता है।।7।। आज उसी के चरितामृत में¸ व्यथा कहूँगा दीनों की। आज यही पर रूदन–गीत में गाऊँगा बल–हीनों की।।8।। आज उसी की अमर–वीरता व्यक्त करूँगा गानों में। आज उसी के रणकाशल की कथा कहूँगा कानों में।।9।। पाठक! तुम भी सुनो कहानी आँखों में पानी भरकर। होती है आरम्भ कथा अब बोलो मंगलकर शंकर।।10।। विहँस रही थी प्रकृति हटाकर मुख से अपना घूँघट–पट। बालक–रवि को ले गोदी में धीरे से बदली करवट।।11।। परियों सी उतरी रवि–किरण्ों घुली मिलीं रज–कन–कन से। खिलने लगे कमल दिनकर के स्वर्णिम–कर के चुम्बन से।।12।। मलयानिल के मृदु–झोकों से उठीं लहरियाँ सर–सर में। रवि की मृदुल सुनहली किरण्ों लगीं खेलने निझर्र में।।13।। फूलों की साँसों को लेकर लहर उठा मारूत वन–वन। कुसुम–पँखुरियों के आँगन में थिरक–थिरक अलि के नर्तन।।14।। देखी रवि में रूप–राशि निज ओसों के लघु–दर्पण में। रजत रश्मियाँ फैल गई गिरि–अरावली के कण–कण में।।15 इसी समय मेवाड़–देश की कटारियाँ खनखना उठीं। नागिन सी डस देने वाली तलवारें झनझना उठीं।।16।। धारण कर केशरिया बाना हाथों में ले ले भाले। वीर महाराणा से ले खिल उठे बोल भोले भाले।।17।। विजयादशमी का वासर था¸ उत्सव के बाजे बाजे। चले वीर आखेट खेलने उछल पड़े ताजे–ताजे।।18।। राणा भी आलेट खेलने शक्तसिंह के साथ चला। पीछे चारण¸ वंश–पुरोहित भाला उसके हाथ चला।।19।। भुजा फड़कने लगी वीर की अशकुन जतलानेवाली। गिरी तुरत तलवार हाथ से पावक बरसाने वाली।।20।। बतलाता था यही अमंगल बन्धु–बन्धु का रण होगा। यही भयावह रण ब्राह्मण की हत्या का कारण होगा।।21।। अशकुन की परवाह न की¸ वह आज न रूकनेवाला था। अहो¸ हमारी स्वतन्त्रता का झण्डा झुकनेवाला था।।22।। घोर विपिन में पहुँच गये कातरता के बन्धन तोड़े। हिंसक जीवों के पीछे अपने अपने घोड़े छोड़े।।23।। भीषण वार हुए जीवों पर तरह–तरह के शोर हुए। मारो ललकारों के रव जंगल में चारों ओर हुए।।24।। चीता यह¸ वह बाघ¸ शेर वह¸ शोर हुआ आखेट करो। छेको¸ छेको हृदय–रक्त ले निज बरछे को भेंट करो।।25।। लगा निशाना ठीक हृदय में रक्त–पगा जाता है वह। चीते को जीते–जी पकड़ो रीछ भगा जाता है वह।।26।। उडे. पखेरू¸ भाग गये मृग भय से शशक सियार भगे। क्षण भर थमकर भगे मत्त गज हरिण हार के हार भगे।।27।। नरम–हृदय कोमल मृग–छौने डौंक रहे थे इधर–उधर। एक प्रलय का रूप खड़ा था मेवाड़ी दल गया जिधर।।28।। किसी कन्दरा से निकला हय¸ झाड़ी में फँस गया कहीं। दौड़ रहा था¸ दौड़ रहा था¸ दल–दल में धँस गया कहीं।।29।। लचकीली तलवार कहीं पर उलझ–उलझ मुड़ जाती थी। टाप गिरी¸ गिरि–कठिन शिक्षा पर चिनगारी उड़ जाती थी।।30।। हय के दिन–दिन हुंकारों से¸ भीषण–धनु–टंकारों से¸ कोलाहल मच गया भयंकर मेवाड़ी–ललकारों से।।31।। एक केसरी सोता था वन के गिरि–गह्वर के अन्दर। रोओं की दुर्गन्ध हवा से फैल रही थी इधर उधर।।32।। सिर के केसर हिल उठते जब हवा झुरकती थी झुर–झुर; फैली थीं टाँगे अवनी पर नासा बजती थी घुरघुर।।33।। नि:श्वासों के साथ लार थी गलफर से चूती तर–तर। खून सने तीखे दाँतों से मौत काँपती थी थर–थर।।34।। अन्धकार की चादर ओढ़े निर्भय सोता था नाहर।। मेवाड़ी–जन–मृगया से कोलाहल होता था बाहर।।35।। कलकल से जग गया केसरी अलसाई आँखें खोलीं। झुँझलाया कुछ गुर्राया जब सुनी शिकारी की बोली।।36।। पर गुर्राता पुन: सो गया नाहर वह आझादी से। तनिक न की परवाह किसी की रंचक डरा न वादी से।।37 पर कोलाहल पर कोलाहल¸ किलकारों पर किलकारें। उसके कानों में पड़ती थीं ललकारों पर ललकारें।।38।। सो न सका उठ गया क्रोध से अँगड़ाकर तन झाड़ दिया। हिलस उठा गिरि–गह्वर जब नीचे मुख कर चिग्धाड़ दिया।।39।। शिला–शिला फट उठी; हिले तरू¸ टूटे व्योम वितान गिरे। सिंह–नाद सुनकर भय से जन चित्त–पट–उत्तान गिरे।।40।। धीरे–धीरे चला केसरी आँखों में अंगार लिये। लगे घेरने राजपूत भाला–बछरी–तलवार लिये।।41।। वीर–केसरी रूका नहीं उन क्षत्रिय–राजकुमारों से। डरा न उनकी बिजली–सी गिरने वाली तलवारों से।।42।। छका दिया कितने जन को कितनों को लड़ना सिखा दिया। हमने भी अपनी माता का दूध पिया है दिखा दिया।।43।। चेत करो तुम राजपूत हो¸ राजपूत अब ठीक बनो। मौन–मौन कह दिया सभी से हम सा तुम निभीर्क बनो।।44 हम भी सिंह¸ सिंह तुम भी हो¸ पाला भी है आन पड़ा। आओ हम तुम आज देख लें हम दोनों में कौन बड़ा।।45। घोड़ों की घुड़दौड़ रूकी लोगों ने बंद शिकार किया। शक्तसिंह ने हिम्मत कर बरछे से उस पर वार किया।।46।। आह न की बिगड़ी न बात चएड़ी के भीषण वाहन की। कठिन तड़ित सा तड़प उठा कुछ भाले की परवाह न की।।47।। काल–सदृश राणा प्रताप झट तीखा शूल निराला ले¸ बढ़ा सिंह की ओर झपटकर अपना भीषण–भाला ले।।48।। ठहरो–ठहरो कहा सिंह को¸ लक्ष्य बनाकर ललकारा। शक्तसिंह¸ तुम हटो सिंह को मैंने अब मारा¸ मारा।।49।। राजपूत अपमान न सहते¸ परम्परा की बान यही। हटो कहा राणा ने पर उसकी छाती उत्तान रही।।50।। आगे बढ़कर कहा लक्ष्य को मार नहीं सकते हो तुम। बोल उठा राणा प्रताप ललकार नहीं सकते हो तुम।।51।। शक्तसिंह ने कहा बने हो शूल चलानेवाले तुम। पड़े नहीं हो शक्तसिंह सम किसी वीर के पाले तुम।।52 क्यों कहते हो हटो¸ हटो¸ हूँ वीर नहीं रणधीर नहीं? क्या सीखा है कहीं चलाना भाला–बरछी–तीर नहीं?।।53।। बोला राणा क्या बकते हो¸ मैंने तो कुछ कहा नहीं। शक्तसिंह¸ बखरे का यह आखेट¸ तुम्हारा रहा नहीं।।54।। राजपूत–कुल के कलंक¸ धिक्कार तुम्हारी वाणी पर¸ बिना हेतु के झगड़ पड़े जो वज` गिरे उस प्राणी पर।।55।। राणा का सत्कार यही क्या¸ बन्धु–हृदय का प्यार यही? क्या भाई के साथ तुम्हारा है उत्तम व्यवहार यही?।।56।। अब तक का अपराध क्षमा आगे को काल निकाला यह तेरा काम तमाम करेगा मेरा भीषण भाला यह।।57।। बात काटकर राणा की यह शक्तसिंह फिर बोल उठा बोल उठा मेवाड़ देश इस बार हलाहल घोल उठा।।58।। धार देखने को जिसने तलवार चला दी उँगली पर। उस अवसर पर शक्तसिंह वह खेल गया अपने जी पर।।59।। बार–बार कहते हो तुम क्या अहंकार है भाले का? ध्यान नहीं है क्या कुछ भी मुझ भीषण–रण–मतवाले का।।60।। राजपूत हूँ मुझे चाहिए ऐसी कभी सलाह नहीं। तुष्ट रहो या रूष्ट रहो¸ मुझको इसकी परवाह नहीं।।61।। रूक सकता है ऐ प्रताप¸ मेरे उर का उद््गार नहीं। बिना युद्ध के अब कदापि है किसी तरह उद्धार नहीं।।62।। मुख–सम्मुख ठहरा हूँ मैं¸ रण–सागर में लहरा हूँ मैं। हो न युद्ध इस नम्र विनय पर आज बना बहरा हूँ मैं।।63।। विष बखेर कर बैर किया राणा से ही क्या¸ लाखों से। लगी बरसने चिनगारी राणा की लोहित आँखों से।।64।। क्रोध बढ़ा¸ आदेश बढ़ा¸ अब वार न रूकने वाला है। कहीं नहीं पर यहीं हमारा मस्तक झुकने वाला है।।65।। तनकर राणा शक्तसिंह से बोला – ठहरो ठहरो तुम। ऐ मेरे भीषण भाला¸ भाई पर लहरो लहरो तुम।।66।। पीने का है यही समय इच्छा भर शोणित पी लो तुम। बढ़ो बढ़ो अब वक्षस्थल में घुसकर विजय अभी लो तुम।।67।। शक्तसिंह¸ आखेट तुम्हारा करने को तैयार हुआ। लो कर में करवाल बचो अब मेरा तुम पर वार हुआ।।68।। खड़े रहो भाले ने तन को लून किया अब लून किया! खेद¸ महाराणा प्रताप ने¸ आज तुम्हारा खून किया।।69।। देख भभकती आग क्रोध की शक्तसिंह भी क्रुद्ध हुआ। हा¸ कलंक की वेदी पर फिर उन दोनों का युद्ध हुआ।।70।। कूद पड़े वे अहंकार से भीषण–रण की ज्वाला में। रण–चण्डी भी उठी रक्त पीने को भरकर प्याला में।।71।। होने लगे वार हरके से एकलिंग प्रतिकूल हुए। मौत बुलानेवाले उनके तीक्ष्ण अग्रसर शूल हुए।।72।। क्षण–क्षण लगे पैतरा देने बिगड़ गया रुख भालों का। रक्षक कौन बनेगा अब इन दोनों रण–मतवालों का।।73।। दोनों का यह हाल देख वन–देवी थी उर फाड़ रही। भाई–भाई के विरोध से काँप उठी मेवाड़–मही।।74।। लोग दूर से देख रहे थे भय से उनके वारों को। किन्तु रोकने की न पड़ी हिम्मत उन राजकुमारों को।।75।। दोनों की आँखों पर परदे पड़े मोह के काले थे। राज–वंश के अभी–अभी दो दीपक बुझनेवाले थे।।76।। तब तक नारायण ने देखा लड़ते भाई भाई को। रूको¸ रूको कहता दौड़ा कुछ सोचो मान–बड़ाई को।।77।। कहा¸ डपटकर रूक जाओ¸ यह शिशोदिया–कुल–धर्म नहीं। भाई से भाई का रण यह कर्मवीर का कर्म नहीं।।78।। राजपूत–कुल के कलंक¸ अब लज्जा से तुम झुक जाओ। शक्तसिंह¸ तुम रूको रूको¸ राणा प्रताप¸ तुम रूक जाओ।।79।। चतुर पुरोहित की बातों की दोनों ने परवाह न की। अहो¸ पुरोहित ने भी निज प्राणों की रंचक चाह न की।।80।। उठा लिया विकराल छुरा सीने में मारा ब्राह्मण ने। उन दोनों के बीच बहा दी शोणित–धारा ब्राह्मण ने।।81।। वन का तन रँग दिया रूधिर से दिखा दिया¸ है त्याग यही। निज स्वामी के प्राणों की रक्षा का है अनुराग यही।।82।। ब्राह्मण था वह ब्राह्मण था¸ हित राजवंश का सदा किया। निज स्वामी का नमक हृदय का रक्त बहाकर अदा किया।।83।। जीवन–चपला चमक दमक कर अन्तरिक्ष में लीन हुई। अहो¸ पुरोहित की अनन्त में जाकर ज्योति विलीन हुई।।84।। सुनकर ब्राह्मण की हत्या उत्साह सभी ने मन्द किया। हाहाकार मचा सबने आखेट खेलना बन्द किया।।85।। खून हो गया खून हो गया का जंगल में शोर हुआ। धन्य धन्य है धन्य पुरोहित – यह रव चारों ओर हुआ।।86।। युगल बन्धु के दृग अपने को लज्जा–पट से ढाँप उठे। रक्त देखकर ब्राह्मण का सहसा वे दोनों काँप उठे।।87।। धर्म भीरू राणा का तन तो भय से कम्पित और हुआ। लगा सोचने अहो कलंकित वीर–देश चित्तौर हुआ।।88।। बोल उठा राणा प्रताप – मेवाड़–देश को छोड़ो तुम। शक्तसिंह¸ तुम हटो हटो¸ मुझसे अब नाता तोड़ो तुम।।89।। शिशोदिया–कुल के कलंक¸ हा जन्म तुम्हारा व्यर्थ हुआ। हाय¸ तुम्हारे ही कारण यह पातक¸ महा अनर्थ हुआ।।90।। सुनते ही यह मौन हो गया¸ घूँट घूँट विष–पान किया। आज्ञा मानी¸ यही सोचता दिल्ली को प्रस्थान किया।।91 हाय¸ निकाला गया आज दिन मेरा बुरा जमाना है। भूख लगी है प्यास लगी पानी का नहीं ठिकाना है।।92 मैं सपूत हूँ राजपूत¸ मुझको ही जरा यकीन नहीं। एक जगह सुख से बैठूँ¸ दो अंगुल मुझे जमीन नहीं।।93 अकबर से मिल जाने पर हा¸ रजपूती की शान कहाँ! जन्मभूमि पर रह जायेगा हा¸ अब नाम–निशान कहाँ।।94।। यह भी मन में सोच रहा था¸ इसका बदला लूँगा मैं। क्रोध–हुताशन में आहुति मेवाड़–देश की दूँगा मैं।।95।। शिशोदिया में जन्म लिया यद्यपि यह है कर्तव्य नहीं। पर प्रताप–अपराध कभी क्षन्तव्य नहीं¸ क्षन्तव्य नहीं।।96।। शक्तसिंह पहुँचा अकबर भी आकर मिला कलेजे से। लगा छेदने राणा का उर कूटनीति के तेजे से।।97।। युगल–बन्धु–रण देख क्रोध से लाल हो गया था सूरज। मानों उसे मनाने को अम्बर पर चढ़ती थी भू–रज।।98।। किया सुनहला काम प्रकृति ने¸ मकड़ी के मृदु तारों पर। छलक रही थी अन्तिम किरण्ों राजपूत–तलवारों पर।।99।। धीरे धीरे रंग जमा तक का सूरज की लाली पर। कौवों की बैठी पंचायत तरू की डाली डाली पर।।100।। चूम लिया शशि ने झुककर। कोई के कोमल गालों को। देने लगा रजत हँस हँसकर¸ सागर–सरिता–नालों को।।101। हिंस्त्र जन्तु निकले गह्वर से घ्ोर लिया गिरि झीलों को। इधर मलिन महलों में आया लाश सौंपकर भीलों को।।102।। वंश–पुरोहित का प्रताप ने दाह कर्म करवा डाला। देकर घन ब्राह्मण–कुल के खाली घर को भरवा डाला।।103।। जहाँ लाश थी ब्राह्मण की जिस जगह त्याग दिखलाया था। चबूतरा बन गया जहाँ प्राणों का पुष्प चढ़ाया था।।104।। गया बन्ध¸ पर गया न गौरव¸ अपनी कुल–परिपाटी का। पर विरोध भी कारण है भीषण–रण हल्दीघाटी का।।105।। मेवाड़¸ तुम्हारी आगे अब हा¸ कैसी गति होगी। हा¸ अब तेरी उन्नति में क्या पग पग पर यति होगी?।।106।। द्वितीय सर्ग कर उन्मत्त प्रेम के लेन–देन का मृदु–व्यापार। ज्ञात न किसको था अकबर की छिपी नीति का अत्याचार।।1।। अहो¸ हमारी माँ–बहनों से सजता था मीनाबाज़ार। फैल गया था अकबर का वह कितना पीड़ामय व्यभिचार।।2।। अवसर पाकर कभी विनय–नत¸ कभी समद तन जाता था। गरम कभी जल सा¸ पावक सा कभी गरम बन जाता था।।3।। मानसिंह की फूफी से अकबर ने कर ली थी शादी। अहो¸ तभी से भाग रही है कोसों हमसे आजादी।।4।। हो उठता था विकल देखकर मधुर कपोलों की लाली। पीता था अiग्न–सा कलियों के अधरों की मधुमय प्याली।।5।। करता था वह किसी जाति की कान्त कामिनी से ठनगन। कामातुर वह कर लेता था किसी सुंदरी का चुम्बन।।6।। था एक समय कुसुमाकर का लेकर उपवन में बाल हिरन। वन छटा देख कुछ उससे ही गुनगुना रही थी बैठ किरन।।7।। वह राका–शशि की ज्योत्स्ना सी वह नव वसन्त की सुषमा सी। बैठी बखेरती थी शोभा छवि देख धन्य थे वन–वासी।।8।। आँखों में मद की लाली थी¸ गालों पर छाई अरूणाई। कोमल अधरों की शोभा थी विद्रुम–कलिका सी खिल आई।।9।। तन–कान्ति देखने को अपलक थे खुले कुसुम–कुल–नयन बन्द। उसकी साँसों की सुरभि पवन लेकर बहता था मन्द–मन्द।।10।। पट में तन¸ तन में नव यौवन नव यौवन में छवि–माला थी। छवि–माला के भीतर जलती पावन–सतीत्व की ज्वाला थी।।11।। थी एक जगह जग की शोभा कोई न देह में अलंकार। केवल कटि में थी बँधी एक शोणित–प्यासी तीखी कटार।।12।। हाथों से सुहला सुहलाकर नव बाल हिरन का कोमल–तन विस्मित सी उससे पूछ रही वह देख देख वन–परिवर्तन।।13।। "कोमल कुसुमों में मुस्काता छिपकर आनेवाला कौन? बिछी हुई पलकों के पथ पर छवि दिखलानेवाला कौन?।।14।। बिना बनाये बन जाते वन उन्हें बनानेवाला कौन? कीचक के छिद्रों में बसकर बीन बजाने वाला कौन?।।16।। कल–कल कोमल कुसुम–कुंज पर मधु बरसाने वाला कौन? मेरी दुनिया में आता है है वह आने वाला कौन है?।।16। छुमछुम छननन रास मचाकर बना रहा मतवाला कौन? मुसकाती जिससे कलिका है है वह किस्मत वाला कौन?।।17।। बना रहा है मत्त पिलाकर मंजुल मधु का प्याला कौन फैल रही जिसकी महिमा है है वह महिमावाला कौन?।।18।। मेरे बहु विकसित उपवन का विभव बढ़ानेवाला कौन? विपट–निचय के पूत पदों पर पुष्प चढ़ाने वाला कौन?।।19।। फैलाकर माया मधुकर को मुग्ध बनाने वाला कौन? छिपे छिपे मेरे आँगन में हँसता आनेवाला कौन?।।20।। महक रहा है मलयानिल क्यों? होती है क्यों कैसी कूक? बौरे–बौरे आमों का है¸ भाव और भाषा क्यों मूक।"।21।। वह इसी तरह थी प्रकृति–मग्न¸ तब तक आया अकबर अधीर। धीरे से बोला युवती से वह कामातुर कम्पित–शरीर ।।22।। "प्रेयसि! गालों की लाली में मधु–भार भरा¸ मृदु प्यार भरा। रानी¸ तेरी चल चितवन में मेरे उर का संसार भरा।।23।। मेरे इन प्यासे अधरों को तू एक मधुर चुम्बन दे दे। धीरे से मेरा मन लेकर धीरे से अपना मन दे दे"।।24।। यह कहकर अकबर बढ़ा समय उसी सती सिंहनी के आगे। आगे उसके कुल के गौरव पावन–सतीत्व उर के आगे।।25।। शिशोदिया–कुल–कन्या थी वह सती रही पांचाली सी। क्षत्राणी थी चढ़ बैठी उसकी छाती पर काली सी।।26।। कहा डपटकर – "बोल प्राण लूँ¸ या छोड़ेगा यह व्यभिचार?" बोला अकबर – "क्षमा करो अब देवि! न होगा अत्याचार"।।27।। जब प्रताप सुनता था ऐसी सदाचार की करूण–पुकार। रण करने के लिए म्यान से सदा निकल पड़ती तलवार।।28।। तृतीय सर्ग अखिल हिन्द का था सुल्तान¸ मुगल–राज कुल का अभिमान। बढ़ा–चढ़ा था गौरव–मान¸ उसका कहीं न था उपमान।।1।। सबसे अधिक राज विस्तार¸ धन का रहा न पारावार। राज–द्वार पर जय जयकार¸ भय से डगमग था संसार।।2।। नभ–चुम्बी विस्तृत अभिराम¸ धवल मनोहर चित्रित–धाम। भीतर नव उपवन आराम¸ बजते थे बाजे अविराम।।3।। संगर की सरिता कर पार कहीं दमकते थे हथियार। शोणित की प्यासी खरधार¸ कहीं चमकती थी तलवार।।4।। स्वर्णिम घर में शीत प्रकाश जलते थे मणियों के दीप। धोते आँसू–जल से चरण देश–देश के सकल महीप।।5।। तो भी कहता था सुल्तान – पूरा कब होगा अरमान। कब मेवाड़ मिलेगा आन¸ राणा का होगा अपमान।।6।। देख देख भीषण षड््यन्त्र¸ सबने मान लिया है मन्त्र। पर वह कैसा वीर स्वतन्त्र¸ रह सकता न क्षणिक परतन्त्र।।7।। कैसा है जलता अंगार¸ कैसा उसका रण–हुंकार। कैसी है उसकी तलवार¸ अभय मचाती हाहाकार।।8।। कितना चमक रहा है भाल¸ कितनी तनु कटि¸ वक्ष विशाल। उससे जननी–अंक निहाल¸ धन्य धन्य माई का लाल।।9।। कैसी है उसकी ललकार¸ कैसी है उसकी किलकार। कैसी चेतक–गति अविकार¸ कैसी असि कितनी खरधार।।10।। कितने जन कितने सरदार¸ कैसा लगता है दरबार। उस पर क्यों इतने बलिहार¸ उस पर जन–रक्षा का भार।।11।। किसका वह जलता अभिशाप¸ जिसका इतना भ्ौरव–ताप। कितना उसमें भरा प्रताप¸ अरे! अरे! साकार प्रताप।।12।। कैसा भाला कैसी म्यान¸ कितना नत कितना उत्तान! पतन नहीं दिन–दिन उत्थान¸ कितना आजादी का ध्यान।।13।। कैसा गोरा–काला रंग¸ जिससे सूरज शशि बदरंग। जिससे वीर सिपाही तंग¸ जिससे मुगल–राज है दंग।।14।। कैसी ओज–भरी है देह¸ कैसा आँगन कैसा गेह। कितना मातृ–चरण पर नेह¸ उसको छू न गया संदेह।।15।। कैसी है मेवाड़ी–आन; कैसी है रजपूती शान। जिस पर इतना है कुबार्न¸ जिस पर रोम–रोम बलिदान।।16।। एक बार भी मान–समान¸ मुकुट नवा करता सम्मान। पूरा हो जाता अरमान¸ मेरा रह जाता अभिमान।।17।। यही सोचते दिन से रात¸ और रात से कभी प्रभात। होता जाता दुबर्ल गात¸ यद्यपि सुख या वैभव–जात।।18।। कुछ दिन तक कुछ सोच विचार¸ करने लगा सिंह पर वार। छिपी छुरी का अत्याचार¸ रूधिर चूसने का व्यापार।।19।। करता था जन पर आघात¸ उनसे मीठी मीठी बात। बढ़ता जाता था दिन–रात¸ वीर शत्रु का यह उत्पात।।20।। इधर देखकर अत्याचार¸ सुनकर जन की करूण–पुकार। रोक शत्रु के भीषण–वार¸ चेतक पर हो सिंह सवार।।21।। कह उठता था बारंबार¸ हाथों में लेकर तलवार – वीरों¸ हो जाओ तैयार¸ करना है माँ का उद्धार।।22।। चतुर्थ सर्ग पर मृदु कोमल फूल¸ पावक की ज्वाला पर तूल। सुई–नोक पर पथ की धूल¸ बनकर रहता था अनुकूल।।1।। बाहर से करता सम्मान¸ बह अजिया–कर लेता था न। कूटनीति का तना वितान¸ उसके नीचे हिन्दुस्तान।।2।। अकबर कहता था हर बार – हिन्दू मजहब पर बलिहार। मेरा हिन्दू से सत्कार; मुझसे हिन्दू का उपकार।।3।। यही मौलवी से भी बात¸ कहता उत्तम है इस्लाम। करता इसका सदा प्रचार¸ मेरा यह निशि–दिन का काम।।4।। उसकी यही निराली चाल¸ मुसलमान हिन्दू सब काल। उस पर रहते सदा प्रसन्न¸ कहते उसे सरल महिपाल।।5।। कभी तिलक से शोभित भाल¸ साफा कभी शीश पर ताज। मस्जिद में जाकर सविनोद¸ पढ़ता था वह कभी नमाज।।6।। एक बार की सभा विशाल¸ आज सुदिन¸ शुभ–मह¸ शुभ–योग। करने आये धर्म–विचार¸ दूर दूर से ज्ञानी लोग।।7।। तना गगन पर एक वितान¸ नीचे बैठी सुधी–जमात। ललित–झाड़ की जगमग ज्योति¸ जलती रहती थी दिन–रात।।8।। एक ओर पण्डित–समुदाय¸ एक ओर बैठे सरदार। एक ओर बैठा भूपाल¸ मणि–चौकी पर आसन मार।।9।। पण्डित–जन के शास्त्र–विचार¸ सुनता सदा लगातार ध्यान। हिला हिलाकर शिर सविनोद¸ मन्द मन्द करता मुसकान।।10।। कभी मौलवी की भी बात¸ सुनकर होता मुदित महान््। मोह–मग्न हो जाता भूप¸ कभी धर्म–मय सुनकर गान।।11।। पाकर मानव सहानुभूति¸ अपने को जाता है भूल। वशीभूत होकर सब काम¸ करता है अपने प्रतिकूल।।12।। माया बलित सभा के बीच¸ यही हो गया सबका हाल। जादू का पड़ गया प्रभाव¸ सबकी मति बदली तत्काल।।13।। एक दिवस सुन सब की बात¸ उन पर करके क्षणिक विचार। बोल उठा होकर गम्भीर – सब धर्मों से जन–उद्धार।।14।। पर मुझसे भी करके क्लेश¸ सुनिए ईश्वर का सन्देश। मालिक का पावन आदेश¸ उस उपदेशक का उपदेश।।15।। प्रभु का संसृति पर अधिकार¸ उसका मैं धावन का अविकार।। यह भव–सागर कठिन अपार¸ दीन–इलाही से उद्धार।।16।। इसका करता जो विश्वास¸ उसको तनिक न जग का त्रास। उसकी बुझ जाती है प्यास¸ उसके जन्म–मरण का नाश।।17।। इससे बढ़ा सुयश–विस्तार¸ दीन–इलाही का सत्कार। बुध जन को तब राज–विचार¸ सबने किया सभय स्वीकार।।18।। हिन्दू–जनता ने अभिमान¸ छोड़ा रामायण का गान। दीन–इलाही पर कुबार्न¸ मुसलमान से अलग कुरान।।19।। तनिक न बा`ह्मण–कुल उत्थान¸ रही न क्षत्रियपन की आन। गया वैश्य–कुल का सम्मान¸ शूद्र जाति का नाम–निशान।।20।। राणा प्रताप से अकबर से¸ इस कारण वैर–विरोध बढ़ा। करते छल–छल परस्पर थे¸ दिन–दिन दोनों का क्रोध बढ़ा।।21।। कूटनीति सुनकर अकबर की¸ राणा जो गिनगिना उठा। रण करने के लिए शत्रु से¸ चेतक भी हिनहिना उठा।।22।। पंचम सर्ग भरा रहता अकबर का सुरभित जय–माला से। सारा भारत भभक रहा था क्रोधानल–ज्वाला से।।1।। रत्न–जटित मणि–सिंहासन था मण्डित रणधीरों से। उसका पद जगमगा रहा था राजमुकुट–हीरों से।।2।। जग के वैभव खेल रहे थे मुगल–राज–थाती पर। फहर रहा था अकबर का झण्डा नभ की छाती पर।।3।। यह प्रताप यह विभव मिला¸ पर एक मिला था वादी। रह रह कांटों सी चुभती थी राणा की आजादी।।4।। कहा एक वासर अकबर ने – "मान¸ उठा लो भाला¸ शोलापुर को जीत पिन्हा दो¸ मुझे विजय की माला।।5।। हय–गज–दल पैदल रथ ले लो मुगल–प्रताप बढ़ा दो। राणा से मिलकर उसको भी अपना पाठ पढ़ा दो।।6।। ऐसा कोई यत्न करो बन्धन में कस लेने को। वही एक विषधर बैठा है मुझको डस लेने को्"।।7।। मानसिंह ने कहा –्"आपका हुकुम सदा सिर पर है। बिना सफलता के न मान यह आ सकता फिरकर है।"।।8।। यह कहकर उठ गया गर्व से झुककर मान जताया। सेना ले कोलाहल करता शोलापुर चढ़ आया।।9।। युद्ध ठानकर मानसिंह ने जीत लिया शोलापुर। भरा विजय के अहंकार से उस अभिमानी का उर।।10।। किसे मौत दूं¸ किसे जिला दूं¸ किसका राज हिला दूं? लगा सोचने किसे मींजकर रज में आज मिला दूं।।11।। किसे हंसा दूं बिजली–सा मैं¸ घन–सा किसै रूला दूं? कौन विरोधी है मेरा फांसी पर जिसे झुला दूं।।12।। बनकर भिक्षुक दीन जन्म भर किसे झेलना दुख है? रण करने की इच्छा से जो आ सकता सम्मुख है।।13।। कहते ही यह ठिठक गया¸ फिर धीमे स्वर से बोला। शोलापुर के विजय–गर्व पर गिरा अचानक गोला।।14।। अहो अभी तो वीर–भूमि मेवाड़–केसरी खूनी। गरज रहा है निर्भय मुझसे लेकर ताकत दूनी।।15।। स्वतन्त्रता का वीर पुजारी संगर–मतवाला है। शत–शत असि के सम्मुख उसका महाकाल भाला है।।16।। धन्य–धन्य है राजपूत वह उसका सिर न झुका है। अब तक कोई अगर रूका तो केवल वही रूका है।।17।। निज प्रताप–बल से प्रताप ने अपनी ज्योति जगा दी। हमने तो जो बुझ न सके¸ कुछ ऐसी आग लगा दी।।18।। अहो जाति को तिलांजली दे हुए भार हम भू के। कहते ही यह ढुलक गये दो–चार बूंद आंसू के।।19।। किन्तु देर तक टिक न सका अभिमान जाति का उर में। क्या विहंसेगा विटप¸ लगा है यदि कलंक अंकुर में।।20।। एक घड़ी तक मौन पुन: कह उठा मान गरवीला– देख काल भी डर सकता मेरी भीषण रण–लीला।।21।। वसुधा का कोना धरकर चाहूं तो विश्व हिला दूं। गगन–मही का क्षितिज पकड़ चाहूं तो अभी मिला दूं।।22।। राणा की क्या शक्ति उसे भी रण की कला सिखा दूं। मृत्यु लड़े तो उसको भी अपने दो हाथ दिखा दूं।।23।। पथ में ही मेवाड़ पड़ेगा चलकर निश्चय कर लूं। मान रहा तो कुशल¸ नहीं तो संगर से जी भर लूं।।24।। युद्ध महाराणा प्रताप से मेरा मचा रहेगा। मेरे जीते–जी कलंक से क्या वह बचा रहेगा?।।25।। मानी मान चला¸ सोचा परिणाम न कुछ जाने का। पास महाराणा के भेजा समाचार आने का।।26।। मानसिंह के आने का सन्देश उदयपुर आया। राणा ने भी अमरसिंह को अपने पास बुलाया।।27।। कहा –! मिलने आता है मानसिंह अभिमानी। छल है¸ तो भी मान करो लेकर लोटा भर पानी।।28।। किसी बात की कमी न हो रह जाये आन हमारी। पुत्र! मान के स्वागत की तुम ऐसी करो तयारी्"।।29।। मान लिया आदेश¸ स्वर्ण से सजे गये दरवाजे। मान मान के लिये मधुर बाजे मधुर–रव से बाजे।।30।। जगह जगह पर सजे गये फाटक सुन्दर सोने के। बन्दनवारों से हंसते थे घर कोने कोने के।।31।। जगमग जगमग ज्योति उठी जल¸ व्याकुल दरबारी–जन¸ नव गुलाब–वासित पानी से किया गया पथ–सिंचन।।32।। शीतल–जल–पूरित कंचन के कलसे थे द्वारों पर। चम–चम पानी चमक रहा था तीखी तलवारों पर।।33।। उदयसिंधु के नीचे भी बाहर की शोभा छाई। हृदय खोलकर उसने भी अपनी श्रद्धा दिखलाई।।34।। किया अमर ने धूमधाम से मानसिंह का स्वागत। मधुर–मधुर सुरभित गजरों के बोझे से वह था नत।।35।। कहा देखकर अमरसिंह का विकल प्रेम अपने मन में। होगा यह सम्मान मुझे विश्वास न था सपने में।।36।। शत–शत तुमको धन्यवाद है¸ सुखी रहो जीवन भर। झरें शीश पर सुमन–सुयश के अम्बर–तल से झर–झर।।37।। धन्यवाद स्वीकार किया¸ कर जोड़ पुन: वह बोला। भावी भीषण रण का दरवाजा धीरे से खोला –।।38।। समय हो गया भूख लगी है¸ चलकर भोजन कर लें। थके हुए हैं ये मृदु पद जल से इनको तर कर लें।"।।39।। सुनकर विनय उठा केवल रख पट रेशम का तन पर। धोकर पद भोजन करने को बैठ गया आसन पर।।40।। देखे मधु पदार्थ पन्ने की मृदु प्याली प्याली में। चावल के सामान मनोहर सोने की थाली में।।41।। घी से सनी सजी रोटी थी¸ रत्नों के बरतन में। शाक खीर नमकीन मधुर¸ चटनी चमचम कंचन में।।42।। मोती झालर से रक्षित¸ रसदार लाल थाली में। एक ओर मीठे फल थे¸ मणि–तारों की डाली में।।43।। तरह–तरह के खाद्य–कलित¸ चांदी के नये कटोरे भरे खराये घी से देखे¸ नीलम के नव खोरे।।44।। पर न वहां भी राणा था बस ताड़ गया वह मानी। रहा गया जब उसे न तब वह बोल उठा अभिमानी।।45।। "अमरसिंह¸ भोजन का तो सामान सभी सम्मुख है। पर प्रताप का पता नहीं है एक यही अब दुख है।।46।। मान करो पर मानसिंह का मान अधूरा होगा। बिना महाराणा के यह आतिथ्य न पूरा होगा।।47।। जब तक भोजन वह न करेंगे एक साथ आसन पर; तब तक कभी न हो सकता है मानसिंह का आदर।।48।। अमरसिंह¸ इसलिए उठो तुम जाओ मिलो पिता से; मेरा यह सन्देश कहो मेवाड़–गगन–सविता से।।49।। बिना आपके वह न ठहर पर ठहर सकेंगे क्षण भी। छू सकते हैं नहीं हाथ से¸ चावल का लघु कण भी।"।।50।। अहो¸ विपत्ति में देश पड़ेगा इसी भयानक तिथि से। गया लौटकर अमरसिंह फिर आया कहा अतिथि से।।51।। "मैं सेवा के लिए आपकी तन–मन–धन से आकुल। प्रभो¸ करें भोजन¸ वह हैं सिर की पीड़ा से व्याकुल।"।।51।। पथ प्रताप का देख रहा था¸ प्रेम न था रोटी में। सुनते ही वह कांप गया¸ लग गई आग चोटी में।।53।। घोर अवज्ञा से ज्वाला सी¸ लगी दहकने त्रिकुटी। अधिक क्रोध से वक्र हो गई¸ मानसिंह की भृकुटी।।54।। चावल–कण दो–एक बांधकर गरज उठा बादल सा। मानो भीषण क्रोध–वह्नि से¸ गया अचानक जल सा।।55।। "कुशल नहीं¸ राणा प्रताप का मस्तक की पीड़ा से। थहर उठेगा अब भूतल रण–चण्डी की क्रीड़ा से।।56।। जिस प्रताप की स्वतन्त्रता के गौरव की रक्षा की। खेद यही है वही मान का कुछ रख सका न बाकी।।57।। बिना हेतु के होगा ही वह जो कुछ बदा रहेगा। किन्तु महाराणा प्रताप अब रोता सदा रहेगा।।58।। मान रहेगा तभी मान का हाला घोल उठे जब। डग–डग–डग ब्रह्माण्ड चराचर भय से डोल उठे जब।"।।59।। चकाचौंध सी लगी मान को राणा की मुख–भा से। अहंकार की बातें सुन जब निकला सिंह गुफा से।।60।। दक्षिण–पद–कर आगे कर तर्जनी उठाकर बोला। गिरने लगा मान–छाती पर गरज–गरज कर गोला।।61।। वज्र–नाद सा तड़प उठा हलचल थी मरदानों में। पहुंच गया राणा का वह रव अकबर के कानों में।।62।। "अरे तुर्क¸ बकवाद करो मत खाना हो तो खाओ। या बधना का ही शीतल–जल पीना हो तो जाओ।।63।। जो रण को ललकार रहे हो तो आकर लड़ लेना। चढ़ आना यदि चाह रहे चित्तौड़ वीर–गढ़ लेना।।64।। कहां रहे जब स्वतन्त्रता का मेरा बिगुल बजा था? जाति–धर्म के मुझ रक्षक को तुमने क्या समझा था।।65।। अभी कहूं क्या¸ प्रश्नों का रण में क्या उत्तर दूंगा। महामृत्यु के साथ–साथ जब इधर–उधर लहरूंगा।।66।। भभक उठेगी जब प्रताप के प्रखर तेज की आगी। तब क्या हूं बतला दूंगा ऐ अम्बर कुल के त्यागी।्"।।67।। अभी मान से राणा से था वाद–विवाद लगा ही¸ तब तक आगे बढ़कर बोला कोई वीर–सिपाही।।68।। "करो न बकझक लड़कर ही अब साहस दिखलाना तुम; भगो¸ भगो¸ अपने फूफे को भी लेते आना तुम।"।।69।। महा महा अपमान देखकर बढ़ी क्रोध की ज्वाला। मान कड़ककर बोल उठा फिर पहन आर्च की माला–।।70।। "मानसिंह की आज अवज्ञा कर लो और करा लो; बिना विजय के ऐ प्रताप तुम¸ विजय–केतु फहरा लो।।71।। पर इसका मैं बदल लूंगा¸ अभी चन्द दिवसों में; झुक जाओगे भर दूंगा जब जलती ज्वाल नसों में।।72।। ऐ प्रताप¸ तुम सजग रहो अब मेरी ललकारों से; अकबर के विकराल क्रोध से¸ तीखी तलवारों से।।73।। ऐ प्रताप¸ तैयार रहो मिटने के लिए रणों में; हाथों में हथकड़ी पहनकर बेड़ी निज चरणों में।।74।। मानसिंह–दल बन जायेगा जब भीषण रण–पागल। ऐ प्रताप¸ तुम झुक जाओगे झुक जायेगा सेना–बल।।75।। ऐ प्रताप¸ तुम सिहर उठो सांपिन सी करवालों से; ऐ प्रताप¸ तुम भभर उठो तीखे–तीखे भालों से।।76।। "गिनो मृत्यु के दिन्" कहकर घोड़े को सरपट छोड़ा¸ पहुंच गया दिल्ली उड़ता वह वायु–वेग ...