सुमित्रानंदन 'पन्त'
परिचय
जन्म: 20 मई 1900
निधन: 28 दिसम्बर 1977
जन्म स्थान
ग्राम कौसनी, अल्मोडा़, उत्तराखंड, भारत
कुछ प्रमुख कृतियाँप्रमुख कृतियां : चिदम्बरा, वीणा, उच्छावास, पल्लव, ग्रंथी, गुंजन, लोकायतन, पल्लवणी, मधु ज्वाला, मानसी,युग वाणी, युग पथ, सत्यकाम, कला और बूढ़ा चांद, ग्राम्या,।
कहानी संग्रह -पांच कहानियाँ [1938], उपन्यास - हार [1960] आत्मकथात्मक संस्मरण - आठ वर्ष : एक रेखांकन [1963]
पुरस्कार/सम्मान : "चिदम्बरा" के लिये भारतीय ज्ञानपीठ, लोकायतन के लिये सोवियत नेहरू शांति पुरस्कार और हिन्दी साहित्य की इस अनवरत सेवा के लिये उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया गया।
"चिदम्बरा" नामक रचना के लिये 1968 मेंज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित। "कला और बूढ़ा चांद" के लिये 1960 का साहित्य अकादमी पुरस्कार।
विशेष
सुमित्रानंदन पंत (मई 20, 1900 - 1977) हिंदी में छायावाद युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उनका जन्म अल्मोड़ा ज़िले के कौसानी नामक ग्राम में मई 20, 1900 को हुआ। जन्म के छह घंटे बाद ही माँ को क्रूर मृत्यु ने छीन लिया। शिशु को उसकी दादी ने पाला पोसा। शिशु का नाम रखा गया गुसाई दत्त। वे सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे। गुसाई दत्त की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा में हुई। सन् 1918 में वे अपने मँझले भाई के साथ काशी आ गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद वे इलाहाबाद चले गए। उन्हें अपना नाम पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नाम रख लिया - सुमित्रानंदन पंत। यहाँ म्योर कॉलेज में उन्होंने इंटर में प्रवेश लिया। 1919 में महात्मा गाँधी के सत्याग्रह से प्रभावित होकर अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ दी और स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय हो गए और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे।आपको अपना नाम पसंद नहीं था सो आपने अपना नाम सुमित्रानंदन पंत रख लिया। सुमित्रानंदन सात वर्ष की उम्र में ही जब वे चौथी कक्षा में पढ़ रहे थे, कविता लिखने लग गए थे। सन् 1917 से 1918 के काल को स्वयं कवि ने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ वीणा में संकलित हैं। सन् 1922 में उच्छवास और 1928 में पल्लव का प्रकाशन हुआ। सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं - ग्रंथि, गुंजन, ग्राम्या, युंगात, स्वर्ण-किरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, निदेबरा, सत्यकाम आदि। उनके जीवनकाल में उनकी 28 पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें कविताएं, पद्य-नाटक और निबंध शामिल हैं। श्री सुमित्रानंदन पंत अपने विस्तृत वाङमय में एक विचारक, दार्शनिक और मानवतावादी के रूप में सामने आते हैं किंतु उनकी सबसे कलात्मक कविताएं 'पल्लव' में संकलित हैं, जो 1918 से 1925 तक लिखी गई ३२ कविताओं का संग्रह है। उनका रचा हुआ संपूर्ण साहित्य 'सत्यम शिवम सुंदरम' के संपूर्ण आदर्शों से प्रभावित होते हुए भी समय के साथ निरंतर बदलता रहा है। जहां प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति और सौंदर्य के रमणीय चित्र मिलते हैं वहीं दूसरे चरण की कविताओं में छायावाद की सूक्ष्म कल्पनाओं व कोमल भावनाओं के और अंतिम चरण की कविताओं में प्रगतिवाद और विचारशीलता के। उनकी सबसे बाद की कविताएं अरविंद दर्शन और मानव कल्याण की भावनाओं सो ओतप्रोत हैं। हिंदी साहित्य की इस अनवरत सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण(1961), ज्ञानपीठ(1968) तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानों से अलंकृत किया गया। सुमित्रानंदन पंत के नाम पर कौशानी में उनके पुराने घर को जिसमें वे बचपन में रहा करते थे, सुमित्रानंदन पंत वीथिका के नाम से एक संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। इसमें उनके व्यक्तिगत प्रयोग की वस्तुओं जैसे कपड़ों, कविताओं की मूल पांडुलिपियों, छायाचित्रों, पत्रों और पुरस्कारों को प्रदर्शित किया गया है। इसमें एक पुस्तकालय भी है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत तथा उनसे संबंधित पुस्तकों का संग्रह है। उनका देहांत 28 दिसंबर 1977 को इलाहाबाद में हुआ । आधी शताब्दी से भी अधिक लंबे उनके रचनाकर्म में आधुनिक हिंदी कविता का पूरा एक युग समाया हुआ है। यहाँ पन्त जी की कुछ कविताएँ डी जा रही हैं---
कवितायेँ
सोनजुही
सोनजुही की बेल नवेली, एक वनस्पति वर्ष, हर्ष से खेली, फूली, फैली, सोनजुही की बेल नवेली! आँगन के बाड़े पर चढ़कर दारु खंभ को गलबाँही भर, कुहनी टेक कँगूरे पर वह मुस्काती अलबेली! सोनजुही की बेल छबीली! दुबली पतली देह लतर, लोनी लंबाई, प्रेम डोर सी सहज सुहाई! फूलों के गुच्छों से उभरे अंगों की गोलाई, निखरे रंगों की गोराई शोभा की सारी सुघराई जाने कब भुजगी ने पाई! सौरभ के पलने में झूली मौन मधुरिमा में निज भूली, यह ममता की मधुर लता मन के आँगन में छाई! सोनजुही की बेल लजीली पहिले अब मुस्काई! एक टाँग पर उचक खड़ी हो मुग्धा वय से अधिक बड़ी हो, पैर उठा कृश पिंडुली पर धर, घुटना मोड़ , चित्र बन सुन्दर, पल्लव देही से मृदु मांसल, खिसका धूप छाँह का आँचल पंख सीप के खोल पवन में वन की हरी परी आँगन में उठ अंगूठे के बल ऊपर उड़ने को अब छूने अम्बर! सोनजुही की बेल हठीली लटकी सधी अधर पर! झालरदार गरारा पहने स्वर्णिम कलियों के सज गहने बूटे कढ़ी चुनरी फहरा शोभा की लहरी-सी लहरा तारों की-सी छाँह सांवली, सीधे पग धरती न बावली कोमलता के भार से मरी अंग भंगिमा भरी, छरहरी! उदि्भद जग की-सी निर्झरिणी हरित नीर, बहती सी टहनी! सोनजुही की बेल, चौकड़ी भरती चंचल हिरनी! आकांक्षा सी उर से लिपटी, प्राणों के रज तम से चिपटी, भू यौवन की सी अंगड़ाई, मधु स्वप्नों की सी परछाई, रीढ़ स्तम्भ का ले अवलंबन धरा चेतना करती रोहण आ, विकास पथ पर भू जीवन! सोनजुही की बेल, गंध बन उड़ी, भरा नभ का मन!
वह बुड्ढा
खड़ा द्वार पर, लाठी टेके, वह जीवन का बूढ़ा पंजर, चिमटी उसकी सिकुड़ी चमड़ी हिलते हड्डी के ढाँचे पर। उभरी ढीली नसें जाल सी सूखी ठठरी से हैं लिपटीं, पतझर में ठूँठे तरु से ज्यों सूनी अमरबेल हो चिपटी। उसका लंबा डील डौल है, हट्टी कट्टी काठी चौड़ी, इस खँडहर में बिजली सी उन्मत्त जवानी होगी दौड़ी! बैठी छाती की हड्डी अब, झुकी रीढ़ कमटा सी टेढ़ी, पिचका पेट, गढ़े कंधों पर, फटी बिबाई से हैं एड़ी। बैठे, टेक धरती पर माथा, वह सलाम करता है झुककर, उस धरती से पाँव उठा लेने को जी करता है क्षण भर! घुटनों से मुड़ उसकी लंबी टाँगें जाँघें सटी परस्पर, झुका बीच में शीश, झुर्रियों का झाँझर मुख निकला बाहर। हाथ जोड़, चौड़े पंजों की गुँथी अँगुलियों को कर सन्मुख, मौन त्रस्त चितवन से, कातर वाणी से वह कहता निज दुख। गर्मी के दिन, धरे उपरनी सिर पर, लुंगी से ढाँपे तन,-- नंगी देह भरी बालों से,-- वन मानुस सा लगता वह जन। भूखा है: पैसे पा, कुछ गुनमुना, खड़ा हो, जाता वह घर, पिछले पैरों के बल उठ जैसे कोई चल रहा जानवर! काली नारकीय छाया निज छोड़ गया वह मेरे भीतर, पैशाचिक सा कुछ: दुःखों से मनुज गया शायद उसमें मर! रचनाकाल: जनवरी’४० बाँध दिए क्यों प्राण
बाँध दिए क्यों प्राण प्राणों से तुमने चिर अनजान प्राणों से गोपन रह न सकेगी अब यह मर्म कथा प्राणों की न रुकेगी बढ़ती विरह व्यथा विवश फूटते गान प्राणों से यह विदेह प्राणों का बंधन अंतर्ज्वाला में तपता तन मुग्ध हृदय सौन्दर्य ज्योति को दग्ध कामना करता अर्पण नहीं चाहता जो कुछ भी आदान प्राणों से भारत ग्राम सारा भारत है आज एक रे महा ग्राम! हैं मानचित्र ग्रामों के, उसके प्रथित नगर ग्रामीण हृदय में उसके शिक्षित संस्कृत नर, जीवन पर जिनका दृष्टि कोण प्राकृत, बर्बर, वे सामाजिक जन नहीं, व्यक्ति हैं अहंकाम। है वही क्षुद्र चेतना, व्यक्तिगत राग द्वेष, लघु स्वार्थ वही, अधिकार सत्व तृष्णा अशेष, आदर्श, अंधविश्वास वही,--हो सभ्य वेश, संचालित करते जीवन जन का क्षुधा काम। वे परंपरा प्रेमी, परिवर्तन से विभीत, ईश्वर परोक्ष से ग्रस्त, भाग्य के दास क्रीत, कुल जाति कीर्ति प्रिय उन्हें, नहीं मनुजत्व प्रीत, भव प्रगति मार्ग में उनके पूर्ण धरा विराम। लौकिक से नहीं, अलौकिक से है उन्हें प्रीति, वे पाप पुण्य संत्रस्त, कर्म गति पर प्रतीति उपचेतन मन से पीड़ित, जीवन उन्हें ईति, है स्वर्ग मुक्ति कामना, मर्त्य से नहीं काम। आदिम मानव करता अब भी जन में निवास, सामूहिक संज्ञा का जिसकी न हुआ विकास, जन जीवी जन दारिद्रय दुःख के बने ग्रास, परवशा यहाँ की चर्म सती ललना ललाम! जन द्विपद: कर सके देश काल को नहीं विजित, वे वाष्प वायु यानों से हुए नहीं विकसित, वे वर्ग जीव, जिनसे जीवन साधन अधिकृत, लालायित करते उन्हें वही धन, धरणि, धाम। ललकार रहा जग को भौतिक विज्ञान आज, मानव को निर्मित करना होगा नव समाज, विद्युत औ’ वाष्प करेंगे जन निर्माण काज, सामूहिक मंगल हो समान: समदृष्टि राम! रचनाकाल: दिसंबर’ ३९ ग्राम देवता
राम राम, हे ग्राम देवता, भूति ग्राम ! तुम पुरुष पुरातन, देव सनातन, पूर्णकाम, शिर पर शोभित वर छत्र तड़ित स्मित घन श्याम, वन पवन मर्मरित-व्यजन, अन्न फल श्री ललाम। तुम कोटि बाहु, वर हलधर, वृष वाहन बलिष्ठ, मित असन, निर्वसन, क्षीणोदर, चिर सौम्य शिष्ट; शिर स्वर्ण शस्य मंजरी मुकुट, गणपति वरिष्ठ, वाग्युद्ध वीर, क्षण क्रुद्ध धीर, नित कर्म निष्ठ। पिक वयनी मधुऋतु से प्रति वत्सर अभिनंदित, नव आम्र मंजरी मलय तुम्हें करता अर्पित। प्रावृट् में तव प्रांगण घन गर्जन से हर्षित, मरकत कल्पित नव हरित प्ररोहों में पुलकित! शशि मुखी शरद करती परिक्रमा कुंद स्मित, वेणी में खोंसे काँस, कान में कुँई लसित। हिम तुमको करता तुहिन मोतियों से भूषित, बहु सोन कोक युग्मों से तव सरि-सर कूजित। अभिराम तुम्हारा बाह्य रूप, मोहित कवि मन, नभ के नीलम संपुट में तुम मरकत शोभन! पर, खोल आज निज अंतःपुर के पट गोपन चिर मोह मुक्त कर दिया, देव! तुमने यह जन! राम राम, हे ग्राम देवता, रूढ़ि धाम! तुम स्थिर, परिवर्तन रहित, कल्पवत् एक याम, जीवन संघर्षण विरत, प्रगति पथ के विराम, शिक्षक तुम, दस वर्षों से मैं सेवक, प्रणाम। कवि अल्प, उडुप मति, भव तितीर्षु,--दुस्तर अपार, कल्पना पुत्र मैं, भावी द्रष्टा, निराधार, सौन्दर्य स्वप्नचर,-- नीति दंडधर तुम उदार, चिर परम्परा के रक्षक, जन हित मुक्त द्वार। दिखलाया तुमने भारतीयता का स्वरूप, जन मर्यादा का स्रोत शून्य चिर अंध कूप, जग से अबोध, जानता न था मैं छाँह धूप, तुम युग युग के जन विश्वासों के जीर्ण स्तूप! यह वही अवध! तुलसी की संस्कृति का निवास! श्री राम यहीं करते जन मानस में विलास! अह, सतयुग के खँडहर का यह दयनीय ह्रास! वह अकथनीय मानसिक दैन्य का बना ग्रास!! ये श्रीमानों के भवन आज साकेत धाम! संयम तप के आदर्श बन गए भोग काम! आराधित सत्व यहाँ, पूजित धन, वंश, नाम! यह विकसित व्यक्तिवाद की संस्कृति! राम राम!! श्री राम रहे सामंत काल के ध्रुव प्रकाश, पशुजीवी युग में नव कृषि संस्कृति के विकास; कर सके नहीं वे मध्य युगों का तम विनाश, जन रहे सनातनता के तब से क्रीत दास! पशु-युग में थे गणदेवों के पूजित पशुपति, थी रुद्रचरों से कुंठित कृषि युग की उन्नति । श्री राम रुद्र की शिव में कर जन हित परिणति, जीवित कर गए अहल्या को, थे सीतापति! वाल्मीकि बाद आए श्री व्यास जगत वंदित, वह कृषि संस्कृति का चरमोन्नत युग था निश्चित; बन गए राम तब कृष्ण, भेद मात्रा का मित, वैभव युग की वंशी से कर जन मन मोहित। तब से युग युग के हुए चित्रपट परिवर्तित, तुलसी ने कृषि मन युग अनुरूप किया निर्मित। खोगया सत्य का रूप, रह गया नामामृत, जन समाचरित वह सगुण बन गया आराधित! गत सक्रिय गुण बन रूढ़ि रीति के जाल गहन कृषि प्रमुख देश के लिए होगए जड़ बंधन। जन नही, यंत्र जीवनोपाय के अब वाहन, संस्कृति के केन्द्र न वर्ग अधिप, जन साधारण! उच्छिष्ट युगों का आज सनातनवत् प्रचलित, बन गईं चिरंतन रीति नीतियाँ, -- स्थितियाँ मृत। गत संस्कृतियाँ थी विकसित वर्ग व्यक्ति आश्रित, तब वर्ग व्यक्ति गुण, जन समूह गुण अब विकसित। अति-मानवीय था निश्चित विकसित व्यक्तिवाद, मनुजों में जिसने भरा देव पशु का प्रमाद। जन जीवन बना न विशद, रहा वह निराह्लाद, विकसित नर नर-अपवाद नही, जन-गुण-विवाद। तब था न वाष्प, विद्युत का जग में हुआ उदय, ये मनुज यंत्र, युग पुरुष सहस्र हस्त बलमय। अब यंत्र मनुज के कर पद बल, सेवक समुदय, सामंत मान अब व्यर्थ,-- समृद्ध विश्व अतिशय। अब मनुष्यता को नैतिकता पर पानी जय, गत वर्ग गुणों को जन संस्कृति में होना लय; देशों राष्ट्रों को मानव जग बनना निश्चय, अंतर जग को फिर लेना वहिर्जगत आश्रय। राम राम, हे ग्राम्य देवता, यथा नाम । शिक्षक हो तुम, मै शिष्य, तुम्हें सविनय प्रणाम। विजया, महुआ, ताड़ी, गाँजा पी सुबह शाम तुम समाधिस्थ नित रहो, तुम्हें जग से न काम! पंडित, पंडे, ओझा, मुखिया औ' साधु, संत दिखलाते रहते तुम्हें स्वर्ग अपवर्ग पंथ। जो था, जो है, जो होगा,--सब लिख गए ग्रंथ, विज्ञान ज्ञान से बड़े तुम्हारे मंत्र तंत्र। युग युग से जनगण, देव! तुम्हारे पराधीन, दारिद्र्य दुःख के कर्दम में कृमि सदृश लीन! बहु रोग शोक पीड़ित, विद्या बल बुद्धि हीन, तुम राम राज्य के स्वप्न देखते उदासीन! जन अमानुषी आदर्शो के तम से कवलित, माया उनको जग, मिथ्या जीवन, देह अनित; वे चिर निवृत्ति के भोगी,--त्याग विराग विहित, निज आचरणों में नरक जीवियों तुल्य पतित! वे देव भाव के प्रेमी,--पशुओं से कुत्सित, नैतिकता के पोषक,-- मनुष्यता से वंचित, बहु नारी सेवी,- - पतिव्रता ध्येयी निज हित, वैधव्य विधायक,-- बहु विवाह वादी निश्चित। सामाजिक जीवन के अयोग्य, ममता प्रधान, संघर्षण विमुख, अटल उनको विधि का विधान। जग से अलिप्त वे, पुनर्जन्म का उन्हें ध्यान, मानव स्वभाव के द्रोही, श्वानों के समान। राम राम, हे ग्राम देव, लो हृदय थाम, अब जन स्वातंत्र्य युद्ध की जग में धूम धाम। उद्यत जनगण युग क्रांति के लिए बाँध लाम, तुम रूढ़ि रीति की खा अफ़ीम, लो चिर विराम! यह जन स्वातंत्र्य नही, जनैक्य का वाहक रण, यह अर्थ राजनीतिक न, सांस्कृति संघर्षण। युग युग की खंड मनुजता, दिशि दिशि के जनगण मानवता में मिल रहे,-- ऐतिहासिक यह क्षण! नव मानवता में जाति वर्ग होंगे सब क्षय, राष्ट्रों के युग वृत्तांश परिधि मे जग की लय। जन आज अहिंसक, होंगे कल स्नेही, सहृदय, हिन्दु, ईसाई, मुसलमान,--मानव निश्चय। मानवता अब तक देश काल के थी आश्रित, संस्कृतियाँ सकल परिस्थितियों से थीं पीड़ित। गत देश काल मानव के बल से आज विजित, अब खर्व विगत नैतिकता, मनुष्यता विकसित। छायाएँ हैं संस्कृतियाँ, मानव की निश्चित, वह केन्द्र, परिस्थितियों के गुण उसमें बिम्बित। मानवी चेतना खोल युगों के गुण कवलित अब नव संस्कृति के वसनों से होगी भूषित। विश्वास धर्म, संस्कृतियाँ, नीति रीतियाँ गत जन संघर्षण में होगी ध्वंस, लीन, परिणत। बंधन विमुक्त हो मानव आत्मा अप्रतिहत नव मानवता का सद्य करेगी युग स्वागत। राम राम, हे ग्राम देवता, रूढ़िधाम! तुम पुरुष पुरातन, देव सनातन, पूर्ण काम, जड़वत्, परिवर्तन शून्य, कल्प शत एक याम, शिक्षक हो तुम, मैं शिष्य, तुम्हें शत शत प्रणाम। रचनाकाल: जनवरी’ ४० यह धरती कितना देती है मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे, सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे, रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी और फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूँगा! पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा, बन्ध्या मिट्टी नें न एक भी पैसा उगला!- सपने जाने कहाँ मिटे, कब धूल हो गये! मैं हताश हो बाट जोहता रहा दिनों तक बाल-कल्पना के अपलर पाँवडडे बिछाकर मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे, ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था! अर्द्धशती हहराती निकल गयी है तबसे! कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने, ग्रीष्म तपे, वर्षा झूली, शरदें मुसकाई; सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे, खिले वन! औ\' जब फिर से गाढ़ी, ऊदी लालसा लिये गहरे, कजरारे बादल बरसे धरती पर, मैंने कौतूहल-वश आँगन के कोने की गीली तह यों ही उँगली से सहलाकर बीज सेम के दबा दिये मिट्टी के नीचे- भू के अंचल में मणि-माणिक बाँध दिये हो! मैं फिर भूल गया इस छोटी-सी घटना को, और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन! किन्तु, एक दिन जब मैं सन्ध्या को आँगन में टहल रहा था,- तब सहसा, मैने देखा उसे हर्ष-विमूढ़ हो उठा मैं विस्मय से! देखा-आँगन के कोने में कई नवागत छोटे-छोटे छाता ताने खड़े हुए हैं! छांता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की, या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं प्यारी- जो भी हो, वे हरे-हरे उल्लास से भरे पंख मारकर उड़ने को उत्सुक लगते थे- डिम्ब तोड़कर निकले चिडियों के बच्चों से! निर्निमेष, क्षण भर, मैं उनको रहा देखता- सहसा मुझे स्मरण हो आया,-कुछ दिन पहिले बीज सेम के मैने रोपे थे आँगन में, और उन्हीं से बौने पौधो की यह पलटन मेरी आँखों के सम्मुख अब खड़ी गर्व से, नन्हें नाटे पैर पटक, बढती जाती है! तब से उनको रहा देखता धीरे-धीरे अनगिनती पत्तों से लद, भर गयी झाड़ियाँ, हरे-भरे टंग गये कई मखमली चँदोवे! बेलें फैल गयी बल खा, आँगन में लहरा, और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का हरे-हरे सौ झरने फूट पड़े ऊपर को,- मैं अवाक् रह गया-वंश कैसे बढ़ता है! छोटे तारों-से छितरे, फूलों के छीटे झागों-से लिपटे लहरों श्यामल लतरों पर सुन्दर लगते थे, मावस के हँसमुख नभ-से, चोटी के मोती-से, आँचल के बूटों-से! ओह, समय पर उनमें कितनी फलियाँ फूटी! कितनी सारी फलियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ,- पतली चौड़ी फलियाँ! उफ उनकी क्या गिनती! लम्बी-लम्बी अँगुलियों - सी नन्हीं-नन्हीं तलवारों-सी पन्ने के प्यारे हारों-सी, झूठ न समझे चन्द्र कलाओं-सी नित बढ़ती, सच्चे मोती की लड़ियों-सी, ढेर-ढेर खिल झुण्ड-झुण्ड झिलमिलकर कचपचिया तारों-सी! आः इतनी फलियाँ टूटी, जाड़ो भर खाई, सुबह शाम वे घर-घर पकीं, पड़ोस पास के जाने-अनजाने सब लोगों में बँटबाई बंधु-बांधवों, मित्रों, अभ्यागत, मँगतों ने जी भर-भर दिन-रात महुल्ले भर ने खाई !- कितनी सारी फलियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ! यह धरती कितना देती है! धरती माता कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को! नही समझ पाया था मैं उसके महत्व को,- बचपन में छिः स्वार्थ लोभ वश पैसे बोकर! रत्न प्रसविनी है वसुधा, अब समझ सका हूँ। इसमें सच्ची समता के दाने बोने है; इसमें जन की क्षमता का दाने बोने है, इसमें मानव-ममता के दाने बोने है,- जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसलें मानवता की, - जीवन श्रम से हँसे दिशाएँ- हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे।
संध्या
कहो, तुम रूपसि कौन? व्योम से उतर रही चुपचाप छिपी निज छाया-छबि में आप, सुनहला फैला केश-कलाप,-- मधुर, मंथर, मृदु, मौन! मूँद अधरों में मधुपालाप, पलक में निमिष, पदों में चाप, भाव-संकुल, बंकिम, भ्रू-चाप, मौन, केवल तुम मौन! ग्रीव तिर्यक, चम्पक-द्युति गात, नयन मुकुलित, नत मुख-जलजात, देह छबि-छाया में दिन-रात, कहाँ रहती तुम कौन? अनिल पुलकित स्वर्णांचल लोल, मधुर नूपुर-ध्वनि खग-कुल-रोल, सीप-से जलदों के पर खोल, उड़ रही नभ में मौन! लाज से अरुण-अरुण सुकपोल, मदिर अधरों की सुरा अमोल,-- बने पावस-घन स्वर्ण-हिंदोल, कहो, एकाकिनि, कौन? मधुर, मंथर तुम मौन? रचनाकाल: सितम्बर’ 1930 लहरों का गीत
अपने ही सुख से चिर चंचल हम खिल खिल पडती हैं प्रतिपल, जीवन के फेनिल मोती को ले ले चल करतल में टलमल!छू छू मृदु मलयानिल रह रह करता प्राणों को पुलकाकुल; जीवन की लतिका में लहलह विकसा इच्छा के नव नव दल!सुन मधुर मरुत मुरली की ध्वनी गृह-पुलिन नांध, सुख से विह्वल, हम हुलस नृत्य करतीं हिल हिल खस खस पडता उर से अंचल!चिर जन्म-मरण को हँस हँस कर हम आलिंगन करती पल पल, फिर फिर असीम से उठ उठ कर फिर फिर उसमें हो हो ओझल!
धरती का आँगन इठलाता
धरती का आँगन इठलाता! शस्य श्यामला भू का यौवन अंतरिक्ष का हृदय लुभाता! जौ गेहूँ की स्वर्णिम बाली भू का अंचल वैभवशाली इस अंचल से चिर अनादि से अंतरंग मानव का नाता! आओ नए बीज हम बोएं विगत युगों के बंधन खोएं भारत की आत्मा का गौरव स्वर्ग लोग में भी न समाता! भारत जन रे धरती की निधि, न्यौछावर उन पर सहृदय विधि, दाता वे, सर्वस्व दान कर उनका अंतर नहीं अघाता! किया उन्होंने त्याग तप वरण, जन स्वभाव का स्नेह संचरण आस्था ईश्वर के प्रति अक्षय श्रम ही उनका भाग्य विधाता! सृजन स्वभाव से हो उर प्रेरित नव श्री शोभा से उन्मेषित हम वसुधैव कुटुम्ब ध्येय रख बनें नये युग के निर्माता! सुख - दुःख
मैं नहीं चाहता चिर-सुख, मैं नहीं चाहता चिर-दुख, सुख दुख की खेल मिचौनी खोले जीवन अपना मुख ! सुख-दुख के मधुर मिलन से यह जीवन हो परिपूरन; फिर घन में ओझल हो शशि, फिर शशि से ओझल हो घन ! जग पीड़ित है अति-दुख से जग पीड़ित रे अति-सुख से, मानव-जग में बँट जाएँ दुख सुख से औ’ सुख दुख से ! अविरत दुख है उत्पीड़न, अविरत सुख भी उत्पीड़न; दुख-सुख की निशा-दिवा में, सोता-जगता जग-जीवन ! यह साँझ-उषा का आँगन, आलिंगन विरह-मिलन का; चिर हास-अश्रुमय आनन रे इस मानव-जीवन का ! ऋतुओं की ऋतु वसंत फिर वसंत की आत्मा आई, मिटे प्रतीक्षा के दुर्वह क्षण, अभिवादन करता भू का मन ! दीप्त दिशाओं के वातायन, प्रीति सांस-सा मलय समीरण, चंचल नील, नवल भू यौवन, फिर वसंत की आत्मा आई, आम्र मौर में गूंथ स्वर्ण कण, किंशुक को कर ज्वाल वसन तन ! देख चुका मन कितने पतझर, ग्रीष्म शरद, हिम पावस सुंदर, ऋतुओं की ऋतु यह कुसुमाकर, फिर वसंत की आत्मा आई, विरह मिलन के खुले प्रीति व्रण, स्वप्नों से शोभा प्ररोह मन ! सब युग सब ऋतु थीं आयोजन, तुम आओगी वे थीं साधन, तुम्हें भूल कटते ही कब क्षण? फिर वसंत की आत्मा आई, देव, हुआ फिर नवल युगागम, स्वर्ग धरा का सफल समागम ! सावन
झम झम झम झम मेघ बरसते हैं सावन के छम छम छम गिरतीं बूँदें तरुओं से छन के। चम चम बिजली चमक रही रे उर में घन के, थम थम दिन के तम में सपने जगते मन के। ऐसे पागल बादल बरसे नहीं धरा पर, जल फुहार बौछारें धारें गिरतीं झर झर। आँधी हर हर करती, दल मर्मर तरु चर् चर् दिन रजनी औ पाख बिना तारे शशि दिनकर। पंखों से रे, फैले फैले ताड़ों के दल, लंबी लंबी अंगुलियाँ हैं चौड़े करतल। तड़ तड़ पड़ती धार वारि की उन पर चंचल टप टप झरतीं कर मुख से जल बूँदें झलमल। नाच रहे पागल हो ताली दे दे चल दल, झूम झूम सिर नीम हिलातीं सुख से विह्वल। हरसिंगार झरते, बेला कलि बढ़ती पल पल हँसमुख हरियाली में खग कुल गाते मंगल? दादुर टर टर करते, झिल्ली बजती झन झन म्याँउ म्याँउ रे मोर, पीउ पिउ चातक के गण! उड़ते सोन बलाक आर्द्र सुख से कर क्रंदन, घुमड़ घुमड़ घिर मेघ गगन में करते गर्जन। वर्षा के प्रिय स्वर उर में बुनते सम्मोहन प्रणयातुर शत कीट विहग करते सुख गायन। मेघों का कोमल तम श्यामल तरुओं से छन। मन में भू की अलस लालसा भरता गोपन। रिमझिम रिमझिम क्या कुछ कहते बूँदों के स्वर, रोम सिहर उठते छूते वे भीतर अंतर! धाराओं पर धाराएँ झरतीं धरती पर, रज के कण कण में तृण तृण की पुलकावलि भर। पकड़ वारि की धार झूलता है मेरा मन, आओ रे सब मुझे घेर कर गाओ सावन! इन्द्रधनुष के झूले में झूलें मिल सब जन, फिर फिर आए जीवन में सावन मन भावन! तप रे मधुर-मधुर मन!
विश्व वेदना में तप प्रतिपल, जग-जीवन की ज्वाला में गल, बन अकलुष, उज्जवल औ' कोमल तप रे विधुर-विधुर मन!अपने सजल-स्वर्ण से पावन रच जीवन की मूर्ति पूर्णतम, स्थापित कर जग में अपनापन, ढल रे ढल आतुर मन!तेरी मधुर मुक्ति ही बंधन गंध-हीन तू गंध-युक्त बन निज अरूप में भर-स्वरूप, मन, मूर्तिमान बन, निर्धन! गल रे गल निष्ठुर मन!आते कैसे सूने पल जीवन में ये सूने पल? जब लगता सब विशृंखल, तृण, तरु, पृथ्वी, नभमंडल!खो देती उर की वीणा झंकार मधुर जीवन की, बस साँसों के तारों में सोती स्मृति सूनेपन की!बह जाता बहने का सुख, लहरों का कलरव, नर्तन, बढ़ने की अति-इच्छा में जाता जीवन से जीवन!आत्मा है सरिता के भी जिससे सरिता है सरिता; जल-जल है, लहर-लहर रे, गति-गति सृति-सृति चिर भरिता!क्या यह जीवन? सागर में जल भार मुखर भर देना! कुसुमित पुलिनों की कीड़ा- ब्रीड़ा से तनिक ने लेना!सागर संगम में है सुख, जीवन की गति में भी लय, मेरे क्षण-क्षण के लघु कण जीवन लय से हों मधुमयदीपक जलता
दीपक जलता अँधियारे में, जलकर कहता बात रे! कभी न हटना अपने पथ से, आए झंझावात रे! दीवाली हर दिन है उसको, जिसे मिल गई शांति रे! जिसे सताती नहीं ईर्ष्या, जिसे न भाती भ्रांति रे! प्रबल प्रभंजन डरते उससे, डरती है बरसात रे!! जो खुशियाँ भर दे जीवन में, वह लक्ष्मी महान रे! जो कि बुद्धि विकसित कर देवे, वह गणेश भगवान रे! नारी लक्ष्मी, गुरु गणेश हैं, दु:ख में थामें हाथ रे!! भेद-भाव का भूत भगाकर, भरो मन में प्रीत रे! बैर-भाव जड़ से विनष्ट कर, गाओ प्रेम-प्रगीत रे! हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, सब आपस में भ्रात रे!! दूर करो मन का अँधियारा, भर कर आत्म-प्रकाश रे! प्रेम-प्रदीप जलाकर प्यारे, जग का करो विकास रे! देती है आदेश यही, यह दीवाली की रात रे!! भारतमाता ग्रामवासिनी
भारतमाता ग्रामवासिनीखेतों में फैला है श्यामल धूल भरा मैला-सा आँचल गंगा जमुना में आँसू जल मिट्टी की प्रतिमा उदासिनी, भारतमाता ग्रामवासिनीदैन्य जड़ित अपलक नत चितवन अधरों में चिर नीरव रोदन युग-युग के तम से विषण्ण मन वह अपने घर में प्रवासिनी, भारतमाता ग्रामवासिनीतीस कोटी संतान नग्न तन अर्द्ध-क्षुभित, शोषित निरस्त्र जन मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन नतमस्तक तरुतल निवासिनी, भारतमाता ग्रामवासिनीस्वर्ण शस्य पर पद-तल-लुंठित धरती-सा सहिष्णु मन कुंठित क्रन्दन कम्पित अधर मौन स्मित राहु ग्रसित शरदिंदु हासिनी, भारतमाता ग्रामवासिनीचिंतित भृकुटी क्षितिज तिमिरान्कित नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित आनन श्री छाया शशि उपमित ज्ञानमूढ़ गीता-प्रकाशिनी, भारतमाता ग्रामवासिनीसफल आज उसका तप संयम पिला अहिंसा स्तन्य सुधोपम हरती जन-मन भय, भव तन भ्रम जग जननी जीवन विकासिनी, भारतमाता ग्रामवासिनी
प्रार्थना
जग के उर्वर आँगन में बरसो ज्योतिर्मय जीवन! बरसो लघु लघु तृण तरु पर हे चिर अव्यय, चिर नूतन! बरसो कुसुमों के मधु बन, प्राणो में अमर प्रणय धन; स्मिति स्वप्न अधर पलकों में उर अंगो में सुख यौवन! छू छू जग के मृत रज कण कर दो तृण तरु में चेतन, मृन्मरण बांध दो जग का दे प्राणो का आलिंगन! बरसो सुख बन, सुखमा बन, बरसो जग जीवन के घन! दिशि दिशि में औ' पल पल में बरसो संसृति के सावन!
गीतों का दर्पण
यदि मरणोन्मुख वर्तमान से ऊब गया हो कटु मन, उठते हों न निराश लौह पग रुद्ध श्वास हो जीवन ! रिक्त बालुका यंत्र,…खिसक हो चुके सुनहले सब क्षण, क्यों यादों में बंदी हो सिसक रहा उर स्पन्दन ! तो मेरे गीतों में देखो नव भविष्य की झाँकी, नि:स्वर शिखरों पर उड़ता गाता सोने का पाँखी । चीर कुहासों के क्षितिजों को भर उड़ान दिग् भास्वर, वह प्रभात नभ में फैलाता स्वर्णिम लपटों के पर ! दुविधा के ये क्षितिज,- मौन वे श्रद्धा शुभ्र दिगंतर, सत्यों के स्मित शिखर, अमित उल्लास भरे ये अंबर ! नीलम के रे अंतरिक्ष, विद्रुम प्रसार दिग् दीपित, स्वप्नों के स्वर्गिक दूतों की पद चापों से कंपित ! प्राणों का पावक पंछी यह, मुक्त चेतना की गति, प्रीति मधुरिमा सुषमा के स्वर, अंतर की स्वर संगति ! उज्जवल गैरिक पंख, चंचु मणि लोहित, गीत तरंगित, नील पीठ, मुक्ताभ वक्ष, चल पुच्छ हरित दिग्लंबित ! दृढ़ संयम ही पीठ, शांति ही वक्ष, पक्ष मन चेतन, पुच्छ प्रगति क्रम, सुरुचि चंचु, लुंठित छाया भू जीवन ! हीरक चितवन, मनसिज शर-से स्वर्ण पंख निर्मम स्वर, मर्म तमस को वेध, प्रीति व्रण करते उर में नि:स्वर ! दिव्य गरुड़ रे यह, उड़ता सत रज प्रसार कर अतिक्रम, पैने पंजों में दबोच, नत काल सर्प सा भू तम ! वह श्रद्धा का रे भविष्य,-- जो देश काल युग से पर, स्वप्नों की सतरंग शोभा से रंग लो हे निज अंतर ! मन से प्राणों में, प्राणों से जीवन में कर मूर्तित, शोभा आकृति में जन भू का स्वर्ग करो नव निर्मित ! उस भविष्य ही की छाया इस वर्तमान के मुख पर, सदा रेंगता रहा रहस छवि… इंगित पर जो खिंचकर । यह भावी का वर्तमान रे युग प्रभात सा प्रहसित, कढ़ अतीत के धूमों से जो नव क्षितिजों में विकसित ! यदि भू के प्राणों का जीवन करना हो संयोजित, तो अंतरतम में प्रवेश कर करो बाह्य पट विस्तृत ! वर्तमान से छिन्न तुम्हें जो लगता रिक्त भविष्यत्- वह नव मानव का मुख, अंकित काल पटी पर अक्षत ! नहीं भविष्यत् रे वह, मानवता की आत्मा विकसित, जड़ भू जीवन में, जन मन में करना जिसे प्रतिष्ठित ! यदि यथार्थ की चकाचौंध से मूढ़ दृष्टि अब निष्फल,-- डुबो गीतों में, जिनका चेतना द्रवित अंतस्तल ! लहराता आनंद अमृत रे इनमें शाश्वत उज्जवल, ये रेती की चमक न, प्यासा रखता जिसका मृग जल ! यदि ह्रासोन्मुख वर्तमान से ऊब गया हो अब मन, गीतों के दर्पण में देखो अपना श्री-नव आनन ।
स्मृति
वन फूलों की तरु डाली में गाती अह, निर्दय गिरि कोयल, काले कौओं के बीच पली, मुँहजली, प्राण करती विह्वल ! कोकिल का ज्वाला का गायन, गायन में मर्म व्यया मादन, उस मूक व्यथा में लिपटी स्मृति, स्मृति पट में प्रीति कथा पावन ! वह प्रीति तुम्हारी ही प्रिय निधि, निधि, चिर शोभा की ! (जो अनंत कलि कुसुमों के अंगों में खिल बनती रहती जीवन वसंत ! ) उस शोभा का स्वप्नों का तन, (जिन स्वप्नों से विस्मित लोचन ।-- जो स्वप्न मूर्त हो सके नहीं, भरते उर में स्वर्णिम गुंजन ! ) उस तन कीभाव द्रवित आकृति,… (जो धूपछाँह पट पर अंकित । ) आकृति की खोई सी रेखा लहरों में वेला सी मज्जित ! यौवन बेला वह, स्वप्न लिखी छबि रेखाएँ जिसमें ओझल, तुम अंर्तमुख शोभा धारा बहती अब प्राणों में शीतल ! प्राणों की फूलों की डाली स्मृति की छाया मधु की कोयल, यह गीति व्यथा, अंर्तमुख स्वर, वह प्रीति कथा, धारा निश्चल !
आत्मबोध
आड़ू नीबू की डालों सी… स्वर्ण शुभ्र कलियों में पुलकित,… तुम्हें अंक भरने को मेरी बांहें युग युग से लालायित ! ओ नित नयी क्षितिज की शोभे, पत्र हीन मैं पतझर का वन,… शून्य नील की नीरवता को प्राणों में बाँधे हूँ उन्मन ! मुझमें भी बहता वन शोणित हरा भरा,-मरकत सा विगलित,- मूक वनस्पति जीवन मेरा मलय स्पर्श पा होता मुकुलित ! वन का आदिम प्राणी तरु मैं जिसने केवल बढ़ना जाना,… यह संयोग कि खिले कुसुम कलि, नीड़ों ने बरसाया गाना ! माना, इन डालों में कांटे, गहरे चिंतन के जिनके व्रण,- मर्म गूँज के बिना मधुप क्या होता सुखी, चूम मधु के कण ? अकथित थी इच्छा,-सुमनों में हँस, उड़ गई अमित सुगंध बन, मूल रहे मिट्टी से लिपटे आए बहु हेमंत, ग्रीष्म, घन ! अन फिर से मधु ऋतु आने को,- पर, मैं जान गया हूँ, निश्चित मैं ही स्वर्ग शिखाओं में जल नए क्षितिज करता हूँ निर्मित ! यह मेरी ही अमृत चेतना,- रिक्त पात्र बन जिसका पतझर नयी प्राप्ति के नव वसंत में नव श्री शोभा से जाता भर ! 4. प्रकाश, पतंगे, छिपकलियाँ वह प्रकाश, वे मुग्ध पतंगे, ये भूखी, लोभी छिपकलियाँ, प्रीति शिखा, उत्सर्ग मौन, स्वार्थों की अंधी चलती गलियाँ ! वह आकर्षण, वे मिलनातुर, ये चुपके छिप घात लगातीं, आत्मोज्वल वह, विरह दग्ध वे, ये ललचा, धीरे रिरियातीं ! ऊर्ध्व प्राण वह, चपल पंख वे, रेंग पेट के बल ये चलतीं, -- इनके पर जमते तो क्या ये आत्म त्याग के लिए मचलतीं ? छि:, फलाँग भर ये, निरीह लघु शलभों को खाते न अघातीं नोंच सुनहले पंख निगलतीं, -- दीपक लौं पर क्या बलि जातीं ? उच्च उड़ान नहीं भर सकते तुच्छ बाहरी चमकीले पर, महत् कर्म के लिये चाहिए महत् प्रेरणा बल भी भीतर ! पर, प्रकाश, प्रेमी पतंग या छिपकलियाँ केवल प्रतीक भर, ये प्रवृतियाँ भू मानव की, इन्हें समझ लेना श्रेयस्कर! ये आत्मा, मन, देह रूप हैं, साथ-साथ जो जग में रहते, शिखा आत्म स्थित, ज्योति स्पर्श हित अंध शलभ तपते, दुख सहते ! पर, प्रकाश से दूर, विरत, छिपकली साधती कार्य स्वार्थ रत, ऊपर लटक, सरकती औंधी, कठिन साधना उसकी अविरत ! उदर देह को भरना, जिससे मन पंखों पर उड़, उठ पाए, आत्मा लीन रहकर प्रकाश को मार्ग सुझाना, मन खिंच आए ! तुच्छ सरट से उच्च ज्योति तक एक सृष्टि सोपान निरंतर, जटिल जगत्, गति गूढ़ , मुक्त चिति, तीनों सत्य,-- व्याप्त जगदीश्वर !