परिचय
हिन्दी साहित्य के सूर्य और सर्वाधिक चर्चित साहित्यकारों में से एक सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' का जन्म बंगाल की रियासत महिषादल (जिला मेदिनीपुर) में माघ शुक्ल ११ संवत १९५३ तदनुसार ११ फ़रवरी सन १८९६ में हुआ था। उनकी कहानी संग्रह लिली में उनकी जन्मतिथि २१ फ़रवरी १८९९ अंकित की गई है। वसंत पंचमी पर उनका जन्मदिन मनाने की परंपरा १९३० में प्रारंभ हुई। उनका जन्म रविवार को हुआ था इसलिए सुर्जकुमार कहलाए। उनके पिता पंण्डित रामसहाय तिवारी उन्नाव (बैसवाड़ा) के रहने वाले थे और
महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। वे मूल रूप से
उत्तर प्रदेश के
उन्नाव जिले का
गढ़कोला नामक गाँव के निवासी थे। निराला की शिक्षा हाई स्कूल तक हुई। बाद में
हिन्दी संस्कृत और
बांग्ला का स्वतंत्र अध्ययन किया। पिता की छोटी-सी नौकरी की असुविधाओं और मान-अपमान का परिचय निराला को आरम्भ में ही प्राप्त हुआ। उन्होंने दलित-शोषित किसान के साथ हमदर्दी का संस्कार अपने अबोध मन से ही अर्जित किया। तीन वर्ष की अवस्था में माता का और बीस वर्ष का होते-होते पिता का देहांत हो गया। अपने बच्चों के अलावा संयुक्त परिवार का भी बोझ निराला पर पड़ा। पहले महायुद्ध के बाद जो महामारी फैली उसमें न सिर्फ पत्नी मनोहरा देवी का, बल्कि चाचा, भाई और भाभी का भी देहांत हो गया। शेष कुनबे का बोझ उठाने में महिषादल की नौकरी अपर्याप्त थी। इसके बाद का उनका सारा जीवन आर्थिक-संघर्ष में बीता। निराला के जीवन की सबसे विशेष बात यह है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने सिद्धांत त्यागकर समझौते का रास्ता नहीं अपनाया, संघर्ष का साहस नहीं गंवाया। जीवन का उत्तरार्द्ध
इलाहाबाद में बीता। वहीं दारागंज मुहल्ले में स्थित रायसाहब की विशाल कोठी के ठीक पीछे बने एक कमरे में १५ अक्टूबर १९६१ को हिन्दी साहित्य के महाप्राण का महाप्रयाण [मृत्यु] हुआ।
मुख्य कृतियाँ उपन्यास : अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरुपमा, कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा
कविता संग्रह : अनामिका,परिमल, गीतिका, द्वितीय अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नये पत्ते, अर्चना, आराधना, गीत कुंज, सांध्य काकली, अपरा
कहानी संग्रह : लिली, चतुरी चमार, सुकुल की बीवी, सखी, देवी
निबंध : रवीन्द्र कविता कानन, प्रबंध पद्म, प्रबंध प्रतिमा, चाबुक, चयन, संग्रह
पुराण कथा : महाभारत
अनुवाद : आनंद मठ, विष वृक्ष, कृष्णकांत का वसीयतनामा, कपालकुंडला, दुर्गेश नन्दिनी, राज सिंह, राजरानी, देवी चौधरानी, युगलांगुल्य, चन्द्रशेखर, रजनी, श्री रामकृष्ण वचनामृत, भरत में विवेकानंद, राजयोग (बांग्ला से हिन्दी)
निधन : 15 अक्टूबर 1961, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)
रचनाएँ
कहानियाँ
कविताएँ - चुम्बन
- तुम हमारे हो
- प्राप्ति
- राम की शक्ति पूजा
व्यंग्य - श्रीमती गजानंद शास्त्रिणी
अन्य - सोयी हुई जातियाँ पहले जगेंगी
बाल साहित्य - ‘भेड़िया, भेड़िया’
- कंजूस और सोना
- गधा और मेढक
- दो घड़े
- महावीर और गाड़ीवान
- शिकार को निकला शेर
- सौदागर और कप्तान
'निराला' जी भारतीय साहित्यिक संस्कृति के द्रष्टा कवि हैं-निराला जी रूढ़िवादिता के विरोधी तथा संस्कृति के युगानुरूप पक्षों के उदघाटक और पोषक रहे हैं। निराला जी का जीवन अपार अनुभवों का आकाश था, विशेष कर दुःख और संघर्ष का आकाश. जिसने तीन वर्ष में माँ, बीस वर्ष में पिता , भरी जवानी में पत्नी और फिर जवान बेटी खो दिया हो उससे ज्यादा दुःख और पीड़ा किसने महसूस किया होगा. मध्यम श्रेणी में उत्पन्न होकर परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से मोर्चा लेते हुए बिना समझौता किए आदर्श के लिए सब कुछ उत्सर्ग करने वाले महाप्राण निराला हिन्दी के साहित्याकाश में एक नक्षत्र की भांति चमकते विभूति हैं जो अन्यत्र हिन्दी साहित्य वरन विश्व साहित्य में दुर्लभ हैं . निराला जी एक ओर तो हिन्दी के छायावादी सोपान में 'तुलसीदास', 'राम की शक्ति-पूजा', 'जूही की कली', 'सरोज-स्मृति', 'जागो फिर एक बार', जैसी युगांतरकारी रचनाएँ देकर महाकवि 'प्रसाद', व 'पंत',के साथ मिल कर उस युग की 'त्रयी' का निर्माण करते हैं; वहीं दूसरी ओर समाज में व्याप्त अन्याय एवं शोषण के विरुद्ध 'भिक्षुक', 'वह तोड़ती पत्थर', 'कुकुरमुत्ता', जैसी क्रन्तिकारी स्वर-प्रधान मार्मिक रचनाएँ रच कर वे हिन्दी कविता के अग्रदूत बन जाते हैं। हिन्दी साहित्य में अपनी बेटी पर पर लिखी ''सरोजस्मृति'' जैसी मार्मिक कविता अन्यत्र कहीं नहीं मिलती. छंद मुक्त कविता के प्रणेता की कुछ रचनाएँ पढ़िए और खुद विचार करें कवितायेँ वह तोड़ती पत्थर वह तोड़ती पत्थर देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर- वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; श्याम तन, भर बँधा यौवन, नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन, गुरू हथौड़ा हाथ, करती बार-बार प्रहार :- सामने तरू-मालिका अट्टालिका, प्राकार। चढ़ रही थी धूप; गर्मियों के दिन दिवा का तमतमाता रूप; उठी झुलसाती हुई लू, रूई ज्यों जलती हुई भू, गर्द चिनगी छा गयीं, प्राय: हुई दुपहर :- वह तोड़ती पत्थर। देखते देखा मुझे तो एक बार उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार; देखकर कोई नहीं, देखा मुझे उस दृष्टि से जो मार खा रोई नहीं, सजा सहज सितार, सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर, ढुलक माथे से गिरे सीकर, लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा - 'मैं तोड़ती पत्थर।'
जागो फिर एक बार जागो फिर एक बार! समर अमर कर प्राण गान गाये महासिन्धु से सिन्धु-नद-तीरवासी! सैन्धव तुरंगों पर चतुरंग चमू संग; ”सवा-सवा लाख पर एक को चढ़ाऊंगा गोविन्द सिंह निज नाम जब कहाऊंगा” किसने सुनाया यह वीर-जन-मोहन अति दुर्जय संग्राम राग फाग का खेला रण बारहों महीने में शेरों की मांद में आया है आज स्यार जागो फिर एक बार! सिंहों की गोद से छीनता रे शिशु कौन मौन भी क्या रहती वह रहते प्राण? रे अनजान एक मेषमाता ही रहती है निर्मिमेष दुर्बल वह छिनती सन्तान जब जन्म पर अपने अभिशप्त तप्त आँसू बहाती है; किन्तु क्या योग्य जन जीता है पश्चिम की उक्ति नहीं गीता है गीता है स्मरण करो बार-बार जागो फिर एक बार
बापू, तुम मुर्गी खाते यदि बापू, तुम मुर्गी खाते यदि तो क्या भजते होते तुमको ऐरे-ग़ैरे नत्थू ख़ैरे? सर के बल खड़े हुए होते हिंदी के इतने लेखक-कवि? बापू, तुम मुर्गी खाते यदि बापू, तुम मुर्गी खाते यदि तो लोकमान्य से क्या तुमने लोहा भी कभी लिया होता? दक्खिन में हिंदी चलवाकर लखते हिंदुस्तानी की छवि बापू, तुम मुर्गी खाते यदि? बापू, तुम मुर्गी खाते यदि तो क्या अवतार हुए होते कुल के कुल कायथ बनियों के? दुनिया के सबसे बड़े पुरुष आदम, भेड़ों के होते भी! बापू, तुम मुर्गी खाते यदि? बापू, तुम मुर्गी खाते यदि तो क्या पटेल, राजन, टंडन, गोपालाचारी भी भजते? भजता होता तुमको मैं और मेरी प्यारी अल्लारक्खी! बापू, तुम मुर्गी खाते यदि !
अभी न होगा मेरा अन्त अभी-अभी ही तो आया है मेरे वन में मृदुल वसन्त अभी न होगा मेरा अन्त। हरे-हरे ये पात डालियाँ, कलियाँ कोमल गात! मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर फेरूंगा निद्रित कलियों पर जगा एक प्रत्यूष मनोहर पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूंगा मैं अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूंगा मैं द्वार दिखा दूंगा फिर उनको है मेरे वे जहाँ अनन्त अभी न होगा मेरा अन्त। मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण इसमें कहाँ मृत्यु? है जीवन ही जीवन अभी पड़ा है आगे सारा यौवन स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे, बालक-मन मेरे ही अविकसित राग से विकसित होगा बन्धु, दिगन्त अभी न होगा मेरा अन्त।
पूछेगा सारा गाँव बंधु! बांधो न नाव इस ठाँव बंधु! पूछेगा सारा गाँव बंधु! यह घाट वही जिस पर हँसकर वह कभी नहाती थी धँसकर आँखें रह जाती थीं फँसकर कँपते थे दोनों पाँव बंधु! वह हँसी बहुत कुछ कहती थी फिर भी अपने में रहती थी सबकी सुनती थी, सहती थी देती थी सबके दाँव बंधु!
चुम्बन लहर रही शशि-किरण चूम निर्मल यमुनाजल चूम सरित की सलिल राशि खिल रहे कुमुद दल कुमुदों के स्मिति-मन्द खुले वे अधर चूम कर बही वायु स्वच्छन्द, सकल पथ घूम-घूम कर है चूम रही इस रात को वही तुम्हारे मधु-अधर जिनमें हैं भाव भरे हुए सकल-शोक-सन्तापहर!
जूही की कली विजन-वन-वल्लरी पर सोती थी सुहागभरी-स्नेह-स्वप्न-मग्न- अमल-कोमल-तनु-तरुणी-जूही की कली, दृग बन्द किये, शिथिल-पत्रांक में। वासन्ती निशा थी; विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़ किसी दूर देश में था पवन जिसे कहते हैं मलयानिल। आई याद बिछुड़ने से मिलन की वह मधुर बात, आई याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात, आई याद कान्ता की कम्पित कमनीय गात, फिर क्या? पवन उपवन-सर-सरित गहन-गिरि-कानन कुञ्ज-लता-पुंजों को पारकर पहुँचा जहां उसने की केलि कली-खिली-साथ। सोती थी, जाने कहो कैसे प्रिय-आगमन वह? नायक ने चूमे कपोल, बोल उठी वल्लरी की लड़ी जैसे हिंडोल। इस पर भी जागी नहीं, चूक-क्षमा मांगी नहीं, निद्रालस बंकिम विशाल नेत्र मूंदे रही- किम्वा मतवाली थी यौवन की मदिरा पिये कौन कहे? निर्दय उस नायक ने निपट निठुराई की, कि झोंकों की झड़ियों से सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली, मसल दिये गोरे कपोल गोल, चौंक पड़ी युवति- चकित चितवन निज चारों ओर पेर, हेर प्यारे की सेज पास, नम्रमुख हंसी, खिली खेल रंग प्यारे संग।
ख़ून की होली जो खेली युवकजनों की है जान ; ख़ून की होली जो खेली । पाया है लोगों में मान, ख़ून की होली जो खेली । रँग गये जैसे पलाश; कुसुम किंशुक के, सुहाए, कोकनद के पाए प्राण, ख़ून की होली जो खेली । निकले क्या कोंपल लाल, फाग की आग लगी है, फागुन की टेढ़ी तान, ख़ून की होली जो खेली । खुल गई गीतों की रात, किरन उतरी है प्रात की ;- हाथ कुसुम-वरदान, ख़ून की होली जो खेली ।
स्नेह-निर्झर बह गया है! स्नेह-निर्झर बह गया है! रेत ज्यों तन रह गया है। आम की यह डाल जो सूखी दिखी कह रही है- “अब यहाँ पिक या शिखी नहीं आते; पंक्ति मैं वह हूँ लिखी नहीं जिसका अर्थ- जीवन दह गया है।” “दिए हैं मैंने जगत् को फूल-फल किया है अपनी प्रतिभा से चकित-चल पर अनश्वर था सकल पल्लवित पल ठाट जीवन का वही जो ढह गया है।” अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा श्याम तृण पर बैठने को निरुपमा बह रही है हृदय पर केवल अमा मै अलक्षित हूँ; यही कवि कह गया है।
वर दे, वीणावादिनि वर दे ! वर दे, वीणावादिनि वर दे ! प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव भारत में भर दे ! काट अंध-उर के बंधन-स्तर बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर; कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर जगमग जग कर दे ! नव गति, नव लय, ताल-छंद नव नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव; नव नभ के नव विहग-वृंद को नव पर, नव स्वर दे !
सरोज-स्मृति उनविंश पर जो प्रथम चरण तेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण: तनये, ली कर दृक्पात तरुण जनक से जन्म की विदा अरुण! गीते मेरी, तज रूप-नाम वर लिया अमर शाश्वत विराम पूरे कर शुचितर सपर्याय जीवन के अष्टादशाध्याय, चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण कह- “पित:, पूर्ण आलोक वरण करती हूँ मैं, यह नहीं मरण, ‘सरोज’ का ज्योति:शरण-तरण”- अशब्द अधरों का, सुना, भाष, मैं कवि हूँ, पाया है प्रकाश मैंने कुछ अहरह रह निर्भर ज्योतिस्तरणा के चरणों पर। जीवित-कविते, शत्-शत्-जर्जर छोड़कर पिता को पृथ्वी पर तू गयी स्वर्ग, क्या यह विचार- “जब पिता करेंगे मार्ग पार यह, अक्षम अति, तब मैं सक्षम, तारूंगी कर गह दुस्तर तम?” कहता तेरा प्रयाण सविनय,- कोई न अन्य था भावोदय। श्रावण-नभ का स्तब्धान्धकार शुक्ला प्रथमा, कर गयी पार! धन्ये, मैं पिता निरर्थक था, कुछ भी तेरे हित कर न सका! जाना तो अर्थागमोपाय पर रहा सदा संकुचित-काय लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर हारता रहा मैं स्वार्थ-समर। शुचिते, पहनाकर चीनांशुक रख सका न तुझे अत: दधिमुख। क्षीण का न छीना कभी अन्न, मैं लख सका न वे दृग विपन्न, अपने आँसुओं अत: बिम्बित देखे हैं अपने ही मुख-चित। सोचा है नत हो बार-बार- “यह हिंदी का स्नेहोपहार, यह नहीं हार मेरी भास्वर वह रत्नहार-लोकोत्तर वर।” अन्यथा, जहाँ है भाव शुद्ध साहित्य-कला-कौशल-प्रबुद्ध, हैं दिए हुए मेरे प्रमाण कुछ वहाँ, प्राप्ति को समाधान,- पार्श्व में अन्य रख कुशल हस्त गद्य में पद्य में समाभ्यस्त। देखें वे; हँसते हुये प्रवर जो रहे देखते सदा समर, एक साथ जब शत् घात घूर्ण आते थे मुझ पर तुले तूर्ण, देखता रहा मैं खड़ा अपल वह शर-क्षेप वह रण-कौशल। व्यक्त हो चुका चीत्कारोत्कल क्रुद्द युद्ध का रुद्ध-कण्ठ फल। और भी फलित होगी वह छवि, जागे जीवन जीवन का रवि, लेकर कर कल तूलिका कला, देखो क्या रंग भरती विमला, वांछित उस किस लांक्षित छवि पर फेरती स्नेह की कूची भर। अस्तु मैं उपार्जन को अक्षम कर नहीं सका पोषण उत्तम कुछ दिन को, जब तू रही साथ अपने गौरव से झुका माथ, पुत्री भी, पिता गेह में स्थिर, छोड़ने के प्रथम जीर्ण अजिर। आँसुओं सजल दृष्टि की छलक पूरी न हुई जो रही कलक प्राणों की प्राणों में दबकर कहती लघु-लघु उसाँस में भर: समझता हुआ मैं रहा देख हटती भी पथ पर दृष्टि टेक। तू सवा साल की जब कोमल, पहचान रही ज्ञान में चपल, माँ का मुख, हो चुम्बित क्षण-क्षण, भरती जीवन में नव-जीवन, वह चरित पूर्ण कर गई चली, तू नानी की गोद जा पली। सब किये वहीं कौतुक-विनोद उस घर निशि-वासर भरे मोद; खाई भाई की मार विकल रोई, उत्पल-दल-दृग-छलछल; चुमकारा सिर उसने निहार, फिर गंगा-तट-सैकत-विहार करने को लेकर साथ चला, तू गहकर हाथ चली चपला; आँसुओं धुला मुख हासोच्छल, लखती प्रसार वह ऊर्मि-धवल। तब भी मैं इसी तरह समस्त कवि-जीवन में व्यर्थ भी व्यस्त लिखता अबाध गति मुक्त छन्द, पर सम्पादकगण निरानन्द वापस कर देते पढ़ सत्वर रो एक-पंक्ति-दो में उत्तर। लौटी रचना लेकर उदास ताकता रहा मैं दिशाकाश बैठा प्रान्तर में दीर्घ प्रहर व्यतीत करता था गुन-गुन कर सम्पादक के गुण; यथाभ्यास पास की नोचता हुआ घास अज्ञात फेंकता इधर-उधर भाव की चढ़ी पूजा उन पर। याद है, दिवस की प्रथम धूप थी पड़ी हुई तुझ पर सुरूप, खेलती हुई तू परी चपल, मैं दूरस्थित प्रवास से चल दो वर्ष बाद, होकर उत्सुक देखने के लिए अपने मुख था गया हुआ, बैठा बाहर आंगन में फाटक के भीतर मोढ़े पर, ले कुण्डली हाथ अपने जीवन की दीर्घ गाथ। पढ़, लिखे हुए शुभ दो विवाह हँसता था, मन में बढ़ी चाह खण्डित करने को भाग्य-अंक, देखा भविष्य के प्रति अशंक। इससे पहले आत्मीय स्वजन सस्नेह कह चुके थे, जीवन सुखमय होगा, विवाह कर लो जो पढ़ी-लिखी हो-सुन्दर हो। आए ऐसे अनेक परिणय, पर विदा किया मैंने सविनय सबको, जो अड़े प्रार्थना भर नयनों में, पाने को उत्तर अनुकूल, उन्हें जब कहा निडर- “मैं हूं मंगली”, मुड़े सुनकर। इस बार एक आया विवाह जो किसी तरह भी हतोत्साह होने को न था, पड़ी अड़चन, आया मन में भर आकर्षण उन नयनों का, सासु ने कहा- “वे बड़े भले जन हैं, भय्या एन्ट्रेंन्स पास है लड़की वह, बोले मुझसे- ‘छब्बीस ही तो वर की है उम्र, ठीक ही है, लड़की भी अट्ठारह की है।’ फिर हाथ जोड़ने लगे, कहा- ‘वे नहीं कर रहे ब्याह, अहा, हैं सुधरे हुए बड़े सज्जन! अच्छे कवि, अच्छे विद्वज्जन! हैं बड़े नाम उनके! शिक्षित लड़की भी रूपवती; समुचित आपको यही होगा कि कहें हर तरह उन्हें; वर सुखी रहें।’ आएंगे कल।” दृष्टि थी शिथिल, आई पुतली तू खिल-खिल-खिल हँसती, मैं हुआ पुन: चेतन सोचता हुआ विवाह-बन्धन। कुण्डली दिखा बोला- “ए-लो” आई तू, दिया, कहा- “खेलो!” कर स्नान-शेष, उन्मुक्त-केश सासुजी रहस्य–स्मित सुवेश आईं करने को बातचीत जो कल होने वाली, अजीत संकेत किए मैंने अखिन्न जिस ओर कुण्डली छिन्न-भिन्न; देखने लगीं वे विस्मय भर तू बैठी संचित टुकड़ों पर। धीरे-धीरे फिर बढ़ा चरण, बाल्य की केलियों का प्रांगण कर पार, कुंज-तारुण्य सुघर आई, लावण्य-भार थर-थर काँपा कोमलता पर सस्वर ज्यों मालकोश नव वीणा पर : नैश स्वप्न ज्यों तू मन्द-मन्द फूटी ऊषा जागरण-छन्द, काँपी भर निज आलोक-भार, काँपा वन, काँपा दिक्-प्रसार। परिचय-परिचय पर खिला सकल- नभ, पृथ्वी, द्रुम, कलि, किसलय-दल। क्या दृष्टि! अतल की सिक्त-धार ज्यों भोगावती उठी अपार; उमड़ता ऊर्ध्व को कल सलील जल टलमल करता नील-नील, पर बंधा देह के दिव्य बांध, छलकता दृगों से साध-साध। फूटा कैसा प्रिय कण्ठ-स्वर माँ की मधुरिमा व्यंजना भर हर पिता-कण्ठ की दृप्त धार उत्कलित रागिनी की बहार! बन जन्मसिद्ध गायिका, तन्वि, मेरे स्वर की रागिनी वह्नि साकार हुई दृष्टि में सुघर, समझा मैं क्या संस्कार प्रखर। शिक्षा के बिना बना वह स्वर है, सुना न अब तक पृथ्वी पर! जाना बस, पिक-बालिका प्रथम पल अन्य नीड़ में जब सक्षम होती उड़ने को, अपना स्वर भर करती ध्वनित मौन प्रान्तर। तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि,। जागा उर में तेरा प्रिय कवि, उन्मनन-गुंज सज हिला कुंज तरु-पल्लव कलिदल पुंज-पुंज बह चली एक अज्ञात बात चूमती केश-मृदु नवल गात, देखती सकल निष्पलक-नयन तू, समझा मैं तेरा जीवन। सासु ने कहा लख एक दिवस:- “भैया अब नहीं हमारा बस, पालना-पोसना रहा काम, देना ‘सरोज’ को धन्य-धाम, शुचि वर के कर, कुलीन लखकर, है काम तुम्हारा धर्मोत्तर; अब कुछ दिन इसे साथ लेकर अपने घर रहो, ढूंढकर वर जो योग्य तुम्हारे, करो ब्याह होंगे सहाय हम सहोत्साह।” सुनकर, गुनकर चुपचाप रहा, कुछ भी न कहा,-न अहो, न अहा; ले चला साथ मैं तुझे, कनक ज्यों भिक्षुक लेकर, स्वर्ण-झनक अपने जीवन की, प्रभा विमल ले आया निज गृह-छाया-तल। सोचा मन में हत बार-बार- “ये कान्यकुब्ज-कुल-कुलांगार; खाकर पत्तल में करें छेद, इनके कर कन्या, अर्थ खेद, इस विषय-बेलि में विष ही फ़ल, यह दग्ध मरुस्थल-नहीं सुजल।” फिर सोचा- “मेरे पूर्वजगण गुजरे जिस राह, वही शोभन होगा मुझको, यह लोक-रीति कर दूँ पूरी, गो नहीं भीति कुछ मुझे तोड़ते गत विचार; पर पूर्ण रूप प्राचीन भार ढोते मैं हूँ अक्षम; निश्चय आएगी मुझमें नहीं विनय उतनी जो रेखा करे पार सौहार्द-बन्ध की, निराधार। वे जो जमुना के-से कछार पद फटे बिवाई के, उधार खाए के मुख ज्यों, पिये तेल चमरौधे जूते से सकेल निकले, जी लेते, घोर-गन्ध उन चरणों को मैं यथा अन्ध, कल घ्राण-प्राण से रहित व्यक्ति हो पूजूँ, ऐसी नहीं शक्ति। ऐसे शिव से गिरिजा-विवाह करने की मुझको नहीं चाह।” फिर आई याद- ‘मुझे सज्जन है मिला प्रथम ही विद्वज्जन नवयुवक एक, सत्साहित्यिक, कुल कान्यकुब्ज, यह नैमित्तिक होगा कोई इंगित अदृश्य, मेरे हित है हित यही स्पृश्य अभिनन्दनीय।’ बंध गया भाव, खुल गया ह्रदय का स्नेह-स्राव, खत लिखा, बुला भेजा तत्क्षण, युवक भी मिला प्रफुल्ल, चेतन। बोला मैं- “मैं हूँ रिक्त-हस्त इस समय, विवेचन में समस्त- जो कुछ है मेरा अपना धन पूर्वज से मिला, करूँ अर्पण यदि महाजनों को, तो विवाह कर सकता हूँ, पर नहीं चाह मेरी ऐसी, दहेज देकर मैं मूर्ख बनूँ, यह नहीं सुघर, बारात बुलाकर मिथ्या व्यय मैं करूँ, नहीं ऐसा सुसमय। तुम करो ब्याह, तोड़ता नियम मैं सामाजिक योग के प्रथम, लग्न के; पढ़ूंगा स्वयं मन्त्र यदि पण्डितजी होंगे स्वतन्त्र। जो कुछ मेरे, वह कन्या का, निश्चय समझो, कुल धन्या का।” आये पण्डितजी, प्रजावर्ग, आमन्त्रित साहित्यिक, ससर्ग देखा विवाह आमूल नवल, तुझ पर शुभ पड़ा कलश का जल। देखती मुझे तू, हँसी मन्द, होंठों में बिजली फँसी, स्पन्द उर में भर झूली छबि सुन्दर, प्रिय की अशब्द शृंगार-मुखर तू खुली एक-उच्छ्वास-संग, विश्वास-स्तब्ध बंध अंग-अंग, नत नयनों से आलोक उतर काँपा अधरों पर थर-थर-थर। देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसन्त प्रथम गीति- शृंगार, रहा जो निराकार रस कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग- भरता प्राणों में राग-रंग, रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदलकर बना मही। हो गया ब्याह, आत्मीय स्वजन कोई थे नहीं, न आमन्त्रण था भेजा गया, विवाह-राग भर रहा न घर निशि-दिवस जाग; प्रिय मौन एक संगीत भरा नव जीवन के स्वर पर उतरा। माँ की कुल शिक्षा मैंने दी, पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची, सोचा मन में- “वह शकुन्तला, पर पाठ अन्य यह, अन्य कला।” कुछ दिन रह गृह तू फिर समोद, बैठी नानी की स्नेह-गोद। मामा-मामी का रहा प्यार, भर जलद धरा को ज्यों अपार; वे ही सुख-दुख में रहे न्यस्त; तेरे हित सदा समस्त, व्यस्त; वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली, स्नेह से हिली, पली, अन्त भी उसी गोद में शरण ली, मूंदे दृग वर महामरण! मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल, युग वर्ष बाद जब हुई विकल, दु:ख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही! हो इसी कर्म पर वज्रपात यदि धर्म, रहे नत सदा माथ इस पथ पर, मेरे कार्य सकल हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल! कन्ये, गत कर्मों का अर्पण कर, करता मैं तेरा तर्पण!
भारती वंदना भारती, जय, विजय करे कनक-शस्य-कमल धरे! लंका पदतल-शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण-युगल स्तव कर बहु-अर्थ-भरे! तरु-तृण-वन-लता-वसन, अंचल में खचित सुमन, गंगा ज्योतिर्जल-कण धवल-धार हार गले! मुकुट शुभ्र हिम-तुषार, प्राण प्रणव ओंकार ध्वनित दिशाएँ उदार, शतमुख-शतरव मुखरे!
सखि वसन्त आया सखि वसन्त आया। भरा हर्ष वन के मन, नवोत्कर्ष छाया। किसलय-वसना नव-वय-लतिका मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका, मधुप-वृन्द बन्दी-पिक-स्वर नभ सरसाया। लता-मुकुल-हार-गन्ध-भार भर, बही पवन बन्द मन्द मन्दतर, जागी नयनों में वन- यौवन की माया। आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे, केशर के केश कली के छुटे स्वर्ण-शस्य-अंचल पृथ्वी का लहराया।
गीत गाने दो मुझे तो गीत गाने दो मुझे तो, वेदना को रोकने को। चोट खाकर राह चलते होश के भी होश छूटे, हाथ जो पाथेय थे, ठग- ठाकुरों ने रात लूटे, कंठ रूकता जा रहा है, आ रहा है काल देखो। भर गया है ज़हर से संसार जैसे हार खाकर, देखते हैं लोग लोगों को, सही परिचय न पाकर, बुझ गई है लौ पृथा की, जल उठो फिर सींचने को।
होली नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे, खेली होली ! जागी रात सेज प्रिय पति सँग रति सनेह-रँग घोली, दीपित दीप, कंज छवि मंजु-मंजु हँस खोली- मली मुख-चुम्बन-रोली । प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली, एक-वसन रह गई मन्द हँस अधर-दशन अनबोली- कली-सी काँटे की तोली । मधु-ऋतु-रात,मधुर अधरों की पी मधु सुध-बुध खोली, खुले अलक, मुँद गए पलक-दल, श्रम-सुख की हद हो ली- बनी रति की छवि भोली । बीती रात सुखद बातों में प्रात पवन प्रिय डोली, उठी सँभाल बाल, मुख-लट,पट, दीप बुझा, हँस बोली रही यह एक ठिठोली ।
निराला जी की यह कविता 'जागरण', पाक्षिक, काशी, 22 मार्च 1932 को छपी थी ।
टूटें सकल बन्ध टूटें सकल बन्ध कलि के, दिशा-ज्ञान-गत हो बहे गन्ध। रुद्ध जो धार रे शिखर - निर्झर झरे मधुर कलरव भरे शून्य शत-शत रन्ध्र। रश्मि ऋजु खींच दे चित्र शत रंग के, वर्ण - जीवन फले, जागे तिमिर अन्ध।
राम की शक्ति पूजा रवि हुआ अस्त; ज्योति के पत्र पर लिखा अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय समर आज का तीक्ष्ण शर-विधृत-क्षिप्रकर, वेग-प्रखर, शतशेलसम्वरणशील, नील नभगर्ज्जित-स्वर, प्रतिपल - परिवर्तित - व्यूह - भेद कौशल समूह राक्षस - विरुद्ध प्रत्यूह,-क्रुद्ध - कपि विषम हूह, विच्छुरित वह्नि - राजीवनयन - हतलक्ष्य - बाण, लोहितलोचन - रावण मदमोचन - महीयान, राघव-लाघव - रावण - वारण - गत - युग्म - प्रहर, उद्धत - लंकापति मर्दित - कपि - दल-बल - विस्तर, अनिमेष - राम-विश्वजिद्दिव्य - शर - भंग - भाव, विद्धांग-बद्ध - कोदण्ड - मुष्टि - खर - रुधिर - स्राव, रावण - प्रहार - दुर्वार - विकल वानर - दल - बल, मुर्छित - सुग्रीवांगद - भीषण - गवाक्ष - गय - नल, वारित - सौमित्र - भल्लपति - अगणित - मल्ल - रोध, गर्ज्जित - प्रलयाब्धि - क्षुब्ध हनुमत् - केवल प्रबोध, उद्गीरित - वह्नि - भीम - पर्वत - कपि चतुःप्रहर, जानकी - भीरू - उर - आशा भर - रावण सम्वर। लौटे युग - दल - राक्षस - पदतल पृथ्वी टलमल, बिंध महोल्लास से बार - बार आकाश विकल। वानर वाहिनी खिन्न, लख निज - पति - चरणचिह्न चल रही शिविर की ओर स्थविरदल ज्यों विभिन्न। प्रशमित हैं वातावरण, नमित - मुख सान्ध्य कमल लक्ष्मण चिन्तापल पीछे वानर वीर - सकल रघुनायक आगे अवनी पर नवनीत-चरण, श्लथ धनु-गुण है, कटिबन्ध स्रस्त तूणीर-धरण, दृढ़ जटा - मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल फैला पृष्ठ पर, बाहुओं पर, वक्ष पर, विपुल उतरा ज्यों दुर्गम पर्वत पर नैशान्धकार चमकतीं दूर ताराएं ज्यों हों कहीं पार। आये सब शिविर,सानु पर पर्वत के, मन्थर सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान आदिक वानर सेनापति दल - विशेष के, अंगद, हनुमान नल नील गवाक्ष, प्रात के रण का समाधान करने के लिए, फेर वानर दल आश्रय स्थल। बैठे रघु-कुल-मणि श्वेत शिला पर, निर्मल जल ले आये कर - पद क्षालनार्थ पटु हनुमान अन्य वीर सर के गये तीर सन्ध्या - विधान वन्दना ईश की करने को, लौटे सत्वर, सब घेर राम को बैठे आज्ञा को तत्पर, पीछे लक्ष्मण, सामने विभीषण, भल्लधीर, सुग्रीव, प्रान्त पर पाद-पद्म के महावीर, यूथपति अन्य जो, यथास्थान हो निर्निमेष देखते राम का जित-सरोज-मुख-श्याम-देश। है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार, अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल। स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर - फिर संशय रह - रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय, जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपु-दम्य-श्रान्त, एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार - बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार-हार। ऐसे क्षण अन्धकार घन में जैसे विद्युत जागी पृथ्वी तनया कुमारिका छवि अच्युत देखते हुए निष्पलक, याद आया उपवन विदेह का, -प्रथम स्नेह का लतान्तराल मिलन नयनों का-नयनों से गोपन-प्रिय सम्भाषण,- पलकों का नव पलकों पर प्रथमोत्थान-पतन,- काँपते हुए किसलय,-झरते पराग-समुदय,- गाते खग-नव-जीवन-परिचय-तरू मलय-वलय,- ज्योतिःप्रपात स्वर्गीय,-ज्ञात छवि प्रथम स्वीय,- जानकी-नयन-कमनीय प्रथम कम्पन तुरीय। सिहरा तन, क्षण-भर भूला मन, लहरा समस्त, हर धनुर्भंग को पुनर्वार ज्यों उठा हस्त, फूटी स्मिति सीता ध्यान-लीन राम के अधर, फिर विश्व-विजय-भावना हृदय में आयी भर, वे आये याद दिव्य शर अगणित मन्त्रपूत,- फड़का पर नभ को उड़े सकल ज्यों देवदूत, देखते राम, जल रहे शलभ ज्यों रजनीचर, ताड़का, सुबाहु, बिराध, शिरस्त्रय, दूषण, खर; फिर देखी भीम मूर्ति आज रण देखी जो आच्छादित किये हुए सम्मुख समग्र नभ को, ज्योतिर्मय अस्त्र सकल बुझ बुझ कर हुए क्षीण, पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन; लख शंकाकुल हो गये अतुल बल शेष शयन, खिंच गये दृगों में सीता के राममय नयन; फिर सुना हँस रहा अट्टहास रावण खलखल, भावित नयनों से सजल गिरे दो मुक्तादल। बैठे मारुति देखते राम-चरणारविन्द- युग 'अस्ति-नास्ति' के एक रूप, गुण-गण-अनिन्द्य; साधना-मध्य भी साम्य-वाम-कर दक्षिणपद, दक्षिण-कर-तल पर वाम चरण, कपिवर गद् गद् पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम - धाम, जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम - नाम। युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल, देखा कपि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल; ये नहीं चरण राम के, बने श्यामा के शुभ,- सोहते मध्य में हीरक युग या दो कौस्तुभ; टूटा वह तार ध्यान का, स्थिर मन हुआ विकल, सन्दिग्ध भाव की उठी दृष्टि, देखा अविकल बैठे वे वहीं कमल-लोचन, पर सजल नयन, व्याकुल-व्याकुल कुछ चिर-प्रफुल्ल मुख निश्चेतन। "ये अश्रु राम के" आते ही मन में विचार, उद्वेल हो उठा शक्ति - खेल - सागर अपार, हो श्वसित पवन - उनचास, पिता पक्ष से तुमुल एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प को उड़ा अतुल, शत घूर्णावर्त, तरंग - भंग, उठते पहाड़, जल राशि - राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़, तोड़ता बन्ध-प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष, शत-वायु-वेग-बल, डूबा अतल में देश - भाव, जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव वज्रांग तेजघन बना पवन को, महाकाश पहुँचा, एकादश रूद्र क्षुब्ध कर अट्टहास। रावण - महिमा श्यामा विभावरी, अन्धकार, यह रूद्र राम - पूजन - प्रताप तेजः प्रसार; उस ओर शक्ति शिव की जो दशस्कन्ध-पूजित, इस ओर रूद्र-वन्दन जो रघुनन्दन - कूजित, करने को ग्रस्त समस्त व्योम कपि बढ़ा अटल, लख महानाश शिव अचल, हुए क्षण-भर चंचल, श्यामा के पद तल भार धरण हर मन्द्रस्वर बोले- "सम्बरो, देवि, निज तेज, नहीं वानर यह, -नहीं हुआ श्रृंगार-युग्म-गत, महावीर, अर्चना राम की मूर्तिमान अक्षय - शरीर, चिर - ब्रह्मचर्य - रत, ये एकादश रूद्र धन्य, मर्यादा - पुरूषोत्तम के सर्वोत्तम, अनन्य, लीलासहचर, दिव्यभावधर, इन पर प्रहार करने पर होगी देवि, तुम्हारी विषम हार; विद्या का ले आश्रय इस मन को दो प्रबोध, झुक जायेगा कपि, निश्चय होगा दूर रोध।" कह हुए मौन शिव, पतन तनय में भर विस्मय सहसा नभ से अंजनारूप का हुआ उदय। बोली माता "तुमने रवि को जब लिया निगल तब नहीं बोध था तुम्हें, रहे बालक केवल, यह वही भाव कर रहा तुम्हें व्याकुल रह रह। यह लज्जा की है बात कि माँ रहती सह सह। यह महाकाश, है जहाँ वास शिव का निर्मल, पूजते जिन्हें श्रीराम उसे ग्रसने को चल क्या नहीं कर रहे तुम अनर्थ? सोचो मन में, क्या दी आज्ञा ऐसी कुछ श्री रधुनन्दन ने? तुम सेवक हो, छोड़कर धर्म कर रहे कार्य, क्या असम्भाव्य हो यह राघव के लिये धार्य?" कपि हुए नम्र, क्षण में माता छवि हुई लीन, उतरे धीरे धीरे गह प्रभुपद हुए दीन। राम का विषण्णानन देखते हुए कुछ क्षण, "हे सखा" विभीषण बोले "आज प्रसन्न वदन वह नहीं देखकर जिसे समग्र वीर वानर भल्लुक विगत-श्रम हो पाते जीवन निर्जर, रघुवीर, तीर सब वही तूण में हैं रक्षित, है वही वक्ष, रणकुशल हस्त, बल वही अमित, हैं वही सुमित्रानन्दन मेघनादजित् रण, हैं वही भल्लपति, वानरेन्द्र सुग्रीव प्रमन, ताराकुमार भी वही महाबल श्वेत धीर, अप्रतिभट वही एक अर्बुद सम महावीर हैं वही दक्ष सेनानायक है वही समर, फिर कैसे असमय हुआ उदय यह भाव प्रहर। रघुकुलगौरव लघु हुए जा रहे तुम इस क्षण, तुम फेर रहे हो पीठ, हो रहा हो जब जय रण। कितना श्रम हुआ व्यर्थ, आया जब मिलनसमय, तुम खींच रहे हो हस्त जानकी से निर्दय! रावण? रावण लम्पट, खल कल्म्ष गताचार, जिसने हित कहते किया मुझे पादप्रहार, बैठा उपवन में देगा दुख सीता को फिर, कहता रण की जय-कथा पारिषद-दल से घिर, सुनता वसन्त में उपवन में कल-कूजित पिक मैं बना किन्तु लंकापति, धिक राघव, धिक्-धिक्? सब सभा रही निस्तब्ध राम के स्तिमित नयन छोड़ते हुए शीतल प्रकाश देखते विमन, जैसे ओजस्वी शब्दों का जो था प्रभाव उससे न इन्हें कुछ चाव, न कोई दुराव, ज्यों हों वे शब्दमात्र मैत्री की समनुरक्ति, पर जहाँ गहन भाव के ग्रहण की नहीं शक्ति। कुछ क्षण तक रहकर मौन सहज निज कोमल स्वर, बोले रघुमणि-"मित्रवर, विजय होगी न समर, यह नहीं रहा नर-वानर का राक्षस से रण, उतरीं पा महाशक्ति रावण से आमन्त्रण, अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति।" कहते छल छल हो गये नयन, कुछ बूँद पुनः ढलके दृगजल, रुक गया कण्ठ, चमका लक्ष्मण तेजः प्रचण्ड धँस गया धरा में कपि गह युगपद, मसक दण्ड स्थिर जाम्बवान, समझते हुए ज्यों सकल भाव, व्याकुल सुग्रीव, हुआ उर में ज्यों विषम घाव, निश्चित सा करते हुए विभीषण कार्यक्रम मौन में रहा यों स्पन्दित वातावरण विषम। निज सहज रूप में संयत हो जानकी-प्राण बोले-"आया न समझ में यह दैवी विधान। रावण, अधर्मरत भी, अपना, मैं हुआ अपर, यह रहा, शक्ति का खेल समर, शंकर, शंकर! करता मैं योजित बार-बार शर-निकर निशित, हो सकती जिनसे यह संसृति सम्पूर्ण विजित, जो तेजः पुंज, सृष्टि की रक्षा का विचार, हैं जिसमें निहित पतन घातक संस्कृति अपार। शत-शुद्धि-बोध, सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक, जिनमें है क्षात्रधर्म का धृत पूर्णाभिषेक, जो हुए प्रजापतियों से संयम से रक्षित, वे शर हो गये आज रण में, श्रीहत खण्डित! देखा हैं महाशक्ति रावण को लिये अंक, लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक, हत मन्त्रपूत शर सम्वृत करतीं बार-बार, निष्फल होते लक्ष्य पर क्षिप्र वार पर वार। विचलित लख कपिदल क्रुद्ध, युद्ध को मैं ज्यों ज्यों, झक-झक झलकती वह्नि वामा के दृग त्यों-त्यों, पश्चात्, देखने लगीं मुझे बँध गये हस्त, फिर खिंचा न धनु, मुक्त ज्यों बँधा मैं, हुआ त्रस्त!" कह हुए भानुकुलभूष्ण वहाँ मौन क्षण भर, बोले विश्वस्त कण्ठ से जाम्बवान-"रघुवर, विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण, हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण, आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर, तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर। रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सकता त्रस्त तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त, शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन। छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो, रघुनन्दन! तब तक लक्ष्मण हैं महावाहिनी के नायक, मध्य भाग में अंगद, दक्षिण-श्वेत सहायक। मैं, भल्ल सैन्य, हैं वाम पार्श्व में हनुमान, नल, नील और छोटे कपिगण, उनके प्रधान। सुग्रीव, विभीषण, अन्य यथुपति यथासमय आयेंगे रक्षा हेतु जहाँ भी होगा भय।" खिल गयी सभा। "उत्तम निश्चय यह, भल्लनाथ!" कह दिया वृद्ध को मान राम ने झुका माथ। हो गये ध्यान में लीन पुनः करते विचार, देखते सकल-तन पुलकित होता बार-बार। कुछ समय अनन्तर इन्दीवर निन्दित लोचन खुल गये, रहा निष्पलक भाव में मज्जित मन, बोले आवेग रहित स्वर सें विश्वास स्थित "मातः, दशभुजा, विश्वज्योति; मैं हूँ आश्रित; हो विद्ध शक्ति से है खल महिषासुर मर्दित; जनरंजन-चरण-कमल-तल, धन्य सिंह गर्जित! यह, यह मेरा प्रतीक मातः समझा इंगित, मैं सिंह, इसी भाव से करूँगा अभिनन्दित।" कुछ समय तक स्तब्ध हो रहे राम छवि में निमग्न, फिर खोले पलक कमल ज्योतिर्दल ध्यान-लग्न। हैं देख रहे मन्त्री, सेनापति, वीरासन बैठे उमड़ते हुए, राघव का स्मित आनन। बोले भावस्थ चन्द्रमुख निन्दित रामचन्द्र, प्राणों में पावन कम्पन भर स्वर मेघमन्द्र, "देखो, बन्धुवर, सामने स्थिर जो वह भूधर शोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुन्दर, पार्वती कल्पना हैं इसकी मकरन्द विन्दु, गरजता चरण प्रान्त पर सिंह वह, नहीं सिन्धु। दशदिक समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर, अम्बर में हुए दिगम्बर अर्चित शशि-शेखर, लख महाभाव मंगल पदतल धँस रहा गर्व, मानव के मन का असुर मन्द हो रहा खर्व।" फिर मधुर दृष्टि से प्रिय कपि को खींचते हुए बोले प्रियतर स्वर सें अन्तर सींचते हुए, "चाहिए हमें एक सौ आठ, कपि, इन्दीवर, कम से कम, अधिक और हों, अधिक और सुन्दर, जाओ देवीदह, उषःकाल होते सत्वर तोड़ो, लाओ वे कमल, लौटकर लड़ो समर।" अवगत हो जाम्बवान से पथ, दूरत्व, स्थान, प्रभुपद रज सिर धर चले हर्ष भर हनुमान। राघव ने विदा किया सबको जानकर समय, सब चले सदय राम की सोचते हुए विजय। निशि हुई विगतः नभ के ललाट पर प्रथम किरण फूटी रघुनन्दन के दृग महिमा ज्योति हिरण। हैं नहीं शरासन आज हस्त तूणीर स्कन्ध वह नहीं सोहता निविड़-जटा-दृढ़-मुकुट-बन्ध, सुन पड़ता सिंहनाद,-रण कोलाहल अपार, उमड़ता नहीं मन, स्तब्ध सुधी हैं ध्यान धार, पूजोपरान्त जपते दुर्गा, दशभुजा नाम, मन करते हुए मनन नामों के गुणग्राम, बीता वह दिवस, हुआ मन स्थिर इष्ट के चरण गहन-से-गहनतर होने लगा समाराधन। क्रम-क्रम से हुए पार राघव के पंच दिवस, चक्र से चक्र मन बढ़ता गया ऊर्ध्व निरलस, कर-जप पूरा कर एक चढाते इन्दीवर, निज पुरश्चरण इस भाँति रहे हैं पूरा कर। चढ़ षष्ठ दिवस आज्ञा पर हुआ समाहित-मन, प्रतिजप से खिंच-खिंच होने लगा महाकर्षण, संचित त्रिकुटी पर ध्यान द्विदल देवी-पद पर, जप के स्वर लगा काँपने थर-थर-थर अम्बर। दो दिन निःस्पन्द एक आसन पर रहे राम, अर्पित करते इन्दीवर जपते हुए नाम। आठवाँ दिवस मन ध्यान-युक्त चढ़ता ऊपर कर गया अतिक्रम ब्रह्मा-हरि-शंकर का स्तर, हो गया विजित ब्रह्माण्ड पूर्ण, देवता स्तब्ध, हो गये दग्ध जीवन के तप के समारब्ध। रह गया एक इन्दीवर, मन देखता पार प्रायः करने हुआ दुर्ग जो सहस्रार, द्विप्रहर, रात्रि, साकार हुई दुर्गा छिपकर हँस उठा ले गई पूजा का प्रिय इन्दीवर। यह अन्तिम जप, ध्यान में देखते चरण युगल राम ने बढ़ाया कर लेने को नीलकमल। कुछ लगा न हाथ, हुआ सहसा स्थिर मन चंचल, ध्यान की भूमि से उतरे, खोले पलक विमल। देखा, वह रिक्त स्थान, यह जप का पूर्ण समय, आसन छोड़ना असिद्धि, भर गये नयनद्वय, "धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध जानकी! हाय उद्धार प्रिया का हो न सका, वह एक और मन रहा राम का जो न थका, जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय, कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय, बुद्धि के दुर्ग पहुँचा विद्युतगति हतचेतन राम में जगी स्मृति हुए सजग पा भाव प्रमन। "यह है उपाय", कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन- "कहती थीं माता मुझे सदा राजीवनयन। दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।" कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर रहा झलक, ले लिया हस्त, लक-लक करता वह महाफलक। ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन ले अर्पित करने को उद्यत हो गये सुमन जिस क्षण बँध गया बेधने को दृग दृढ़ निश्चय, काँपा ब्रह्माण्ड, हुआ देवी का त्वरित उदय- "साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!" कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम। देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर वामपद असुर-स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर। ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित, मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित। हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग, दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग, मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वर वन्दन कर। "होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन।" कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।
भिक्षुक वह आता-- दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता। पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक, चल रहा लकुटिया टेक, मुट्ठी भर दाने को-- भूख मिटाने को मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता-- दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता। साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये, बायें से वे मलते हुए पेट को चलते, और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाये। भूख से सूख ओठ जब जाते दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?-- घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते। चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए, और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!
जागो फिर एक बार! जागो फिर एक बार! प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें अरुण-पंख तरुण-किरण खड़ी खोलती है द्वार- जागो फिर एक बार! आँखे अलियों-सी किस मधु की गलियों में फँसी, बन्द कर पाँखें पी रही हैं मधु मौन अथवा सोयी कमल-कोरकों में?- बन्द हो रहा गुंजार- जागो फिर एक बार! अस्ताचल चले रवि, शशि-छवि विभावरी में चित्रित हुई है देख यामिनीगन्धा जगी, एकटक चकोर-कोर दर्शन-प्रिय, आशाओं भरी मौन भाषा बहु भावमयी घेर रहा चन्द्र को चाव से शिशिर-भार-व्याकुल कुल खुले फूल झूके हुए, आया कलियों में मधुर मद-उर-यौवन उभार- जागो फिर एक बार! पिउ-रव पपीहे प्रिय बोल रहे, सेज पर विरह-विदग्धा वधू याद कर बीती बातें, रातें मन-मिलन की मूँद रही पलकें चारु नयन जल ढल गये, लघुतर कर व्यथा-भार जागो फिर एक बार! सहृदय समीर जैसे पोछों प्रिय, नयन-नीर शयन-शिथिल बाहें भर स्वप्निल आवेश में, आतुर उर वसन-मुक्त कर दो, सब सुप्ति सुखोन्माद हो, छूट-छूट अलस फैल जाने दो पीठ पर कल्पना से कोमन ऋतु-कुटिल प्रसार-कामी केश-गुच्छ। तन-मन थक जायें, मृदु सरभि-सी समीर में बुद्धि बुद्धि में हो लीन मन में मन, जी जी में, एक अनुभव बहता रहे उभय आत्माओं मे, कब से मैं रही पुकार जागो फिर एक बार!
कहानी पद्मा और लिली पद्मा के चन्द्र-मुख पर षोडश कला की शुभ्र चंद्रिका अम्लान खिल रही है। एकांत कुंज की कली-सी प्रणय के वासंती मलयस्पर्श से हिल उठती,विकास के लिए व्याकुल हो रही है। पद्मा की प्रतिभा की प्रशंसा सुनकर उसके पिता ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट पंडित रामेश्वरजी शुक्ल उसके उज्ज्वल भविष्य पर अनेक प्रकार की कल्पनाएँ किया करते हैं। योग्य वर के अभाव से उसका विवाह अब तक रोक रखा है। मैट्रिक परीक्षा में पद्मा का सूबे में पहला स्थान आया था। उसे वृत्ति मिली थी। पत्नी को योग्य वर न मिलने के कारण विवाह रुका हुआ है, शुक्लजी समझा देते हैं। साल-भर से कन्या को देखकर माता भविष्य-शंका से काँप उठती हैं। पद्मा काशी विश्वविद्यालय के कला-विभाग में दूसरे साल की छात्रा है। गर्मियों की छुट्टी है, इलाहाबाद घर आई हुई है। अबके पद्मा का उभार, उसका रूप-रंग, उसकी चितवन-चलन-कौशल-वार्तालाप पहले से सभी बदल गए हैं। उसके हृदय में अपनी कल्पना से कोमल सौन्दर्य की भावना, मस्तिष्क में लोकाचार से स्वतन्त्र अपने उच्छृंखल आनुकूल्य के विचार पैदा हो गए हैं। उसे निस्संकोच चलती-फिरती, उठती-बैठती, हँसती-बोलती देखकर माता हृदय के बोलवाले तार से कुछ और ढीली तथा बेसुरी पड़ गई हैं। एक दिन सन्ध्या के डूबते सूर्य के सुनहले प्रकाश में, निरभ्र नील आकाश के नीचे, छत पर, दो कुर्सियाँ डलवा माता और कन्या गंगा का रजत-सौन्दर्य एकटक देख रही थी। माता पद्मा की पढाई, कॉलेज की छात्राओं की संख्या, बालिकाओं के होस्टल का प्रबन्ध आदि बातें पूछती हैं, पद्मा उत्तर देती है। हाथ में है हाल की निकली स्ट्रैंड मैगजीन की एक प्रति। तस्वीरें देखती जाती है। हवा का एक हल्का झोंका आया, खुले रेशमी बाल, सिर से साड़ी को उड़ाकर, गुदगुदाकर, चला गया। ''सिर ढक लिया करो, तुम बेहया हुई जाती हो।'' माता ने रुखाई से कहा। पद्मा ने सिर पर साड़ी की जरीदार किनारी चढ़ा ली, आँखें नीची कर किताब के पन्ने उलटने लगी। ''पद्मा!'' गम्भीर होकर माता ने कहा। ''जी!'' चलते हुए उपन्यास की एक तस्वीर देखती हुई नम्रता से बोली। मन से अपराध की छाप मिट गई, माता की वात्सल्य-सरिता में कुछ देर के लिए बाढ-सी आ गई, उठते उच्छ्वास से बोलीं, ''कानपुर में एक नामी वकील महेशप्रसाद त्रिपाठी हैं।'' ''हूँ", एक दूसरी तस्वीर देखती हुई। ''उनका लड़का आगरा युनिवर्सिटी से एम. ए. में इस साल फर्स्ट क्लास फर्स्ट आया है।'' ''हूँ", पद्मा ने सिर उठाया। आँखें प्रतिभा से चमक उठीं। ''तेरे पिताजी को मैंने भेजा था, वह परसों देखकर लौटे हैं। कहते थे, लड़का हीरे का टुकड़ा, गुलाब का फूल है। बातचीत दस हजार में पक्की हो गई है।'' ''हूँ", मोटर की आवाज पा पद्मा उठकर छत के नीचे देखने लगी। हर्ष से हृदय में तरंगें उठने लगीं। मुसकुराहट दबाकर आप ही में हँसती हुई चुपचाप बैठ गई। माता ने सोचा, लड़की बड़ी हो गई है, विवाह के प्रसंग से प्रसन्न हुई है। खुलकर कहा, ''मैं बहुत पहले से तेरे पिताजी से कह रही थी, वह तेरी पढ़ाई के विचार में पड़े थे।'' नौकर ने आकर कहा, ''राजेन बाबू मिलने आए हैं।'' पद्मा की माता ने एक कुर्सी डाल देने के लिए कहा। कुर्सी डालकर नौकर राजेन बाबू को बुलाने नीचे उतर गया। तब तक दूसरा नौकर रामेश्वरजी का भेजा हुआ पद्मा की माता के पास आया, कहा, ''जरूरी काम से कुछ देर के लिए पंडित जल्द बुलाते हैं।'' जीने से पद्मा की माता उतर रही थीं, रास्ते में राजेन्द्र से भेंट हुई। राजेन्द्र ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। पद्मा की माता ने कंधे पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और कहा- ''चलो, पद्मा छत पर है, बैठो, मैं अभी आती हूँ।'' राजेन्द्र जज का लड़का है, पद्मा से तीन साल बड़ा, पढ़ाई में भी। पद्मा अपराजिता बडी-बडी आँखों की उत्सुकता से प्रतीक्षा में थी, जब से छत से उसने देखा था। ''आइए, राजेन बाबू, कुशल तो है?'' पद्मा ने राजेन्द्र का उठकर स्वागत किया। एक कुर्सी की तरफ बैठने के लिए हाथ से इंगित कर खड़ी रही। राजेन्द्र बैठ गया, पद्मा भी बैठ गई। ''राजेन, तुम उदास हो!'' ''तुम्हारा विवाह हो रहा है?'' राजेन्द्र ने पूछा। पद्मा उठकर खड़ी हो गई। बढ़कर राजेन्द्र का हाथ पकडक़र बोली- ''राजेन, तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं! जो प्रतिज्ञा मैंने की है, हिमालय की तरह उस पर अटल रहूंगी।" पद्मा अपनी कुर्सी पर बैठ गई। मेगज़ीन खोल उसी तरह पन्नों में नजर गढ़ा दी। जीने से आहट मालूम दी। माता निगरानी की निगाह से देखती हुई आ रही थीं। प्रकृति स्तब्ध थी। मन में वैसी ही अन्वेषक-चपलता। ''क्यों बेटा, तुम इस साल बी.ए. हो गए?'' हँसकर पूछा। ''जी हाँ।'' सिर झुकाये हुए राजेन्द्र ने उत्तर दिया। ''तुम्हारा विवाह कब तक करेंगे तुम्हारे पिताजी, जानते हो?'' ''जी नहीं।'' ''तुम्हारा विचार क्या है?'' ''आप लोगों से आज्ञा लेकर विदा होने के लिए आया हूँ, विलायत भेज रहे हैं पिताजी।'' नम्रता से राजेन्द्र ने कहा। ''क्या बैरिस्टर होने की इच्छा है?'' पद्मा की माता ने पूछा। ''जी हाँ।'' ''तुम साहब बनकर विलायत से आना और साथ एक मेम भी लाना, मैं उसकी शुद्धि कर लूँगी।'' पद्मा हँसकर बोली। आँखे नीची किए राजेंद्र भी मुसकराने लगा। नौकर ने एक तश्तरी पर दो प्यालों में चाय दी-दो रकाबियों पर कुछ बिस्कुट और केक। दूसरा एक मेज़ उठा लिया। राजेन्द्र और पद्मा की कुर्सी के बीच रख दी, एक धुली तौलिया ऊपर से बिछा दी। सासर पर प्याले तथा रकाबियों पर बिस्कुट और केक रखकर नौकर पानी लेने गया, दूसरा आज्ञा की प्रतीक्षा में खडा रहा। ''मैं निश्चय कर चुका हूँ, ज़बान भी दे चुका हूँ। अबके तुम्हारी शादी कर दूँगा।'' पंडित रामेश्वरजी ने कन्या से कहा। ''लेकिन मैंने भी निश्चय कर लिया है, डिग्री प्राप्त करने से पहले विवाह न करूंगी।'' सिर झुकाकर पद्मा ने जवाब दिया। ''मैं मजिस्ट्रेट हूँ बेटी, अब तक अक्ल ही की पहचान करता रहा हूँ, शायद इससे ज्यादा सुनने की तुम्हें इच्छा न होगी।'' गर्व से रामेश्वरजी टहलने लगे। पद्मा के हृदय के खिले गुलाब की कुल पंखड़ियां हवा के एक पुरजोर झोंके से काँप उठीं। मुक्ताओं-सी चमकती हुई दो बूँदें पलकों के पत्रों से झड़ पड़ी। यही उसका उत्तर था। ''राजेन जब आया, तुम्हारी माता को बुलाकर मैंने जीने पर नौकर भेज दिया था, एकान्त में तुम्हारी बातें सुनने के लिए। - तुम हिमालय की तरह अटल हो, मैं भी वर्तमान की तरह सत्य और दृढ।'' रामेश्वरजी ने कहा- ''तुम्हें इसलिए मैंने नहीं पढ़ाया कि तुम कुल-कलंक बनो।'' ''आप यह सब क्या कह रहे हैं?'' ''चुप रहो। तुम्हें नहीं मालूम? तुम ब्राह्मण-कुल की कन्या हो, वह क्षत्रिय-घराने का लड़का है- ऐसा विवाह नहीं हो सकता।'' रामेश्वरजी की साँस तेज चलने लगीं, आँखें भौंहों से मिल गईं। ''आप नहीं समझे मेरे कहने का मतलब।'' पद्मा की निगाह कुछ उठ गईं। ''मैं बातों का बनाना आज दस साल से देख रहा हूँ। तू मुझे चराती है? वह बदमाश.......!'' ''इतना बहुत है। आप अदालत के अफ़सर है! अभी-अभी आपने कहा था, अब तक अक्ल की पहचान करते रहे हैं, यह आपकी अक्ल की पहचान है! आप इतनी बड़ी बात राजेन्द्र को उसके सामने कह सकते हैं? बतलाइए, हिमालय की तरह अटल सुन लिया, तो इससे आपने क्या सोचा?'' आग लग गई, जो बहुत दिनों से पद्मा की माता के हृदय में सुलग रही थी। ''हट जा मेरी नज़रों से बाहर, मैं समझ गया।'' रामेश्वर जी क्रोध से काँपने लगे। ''आप गलती कर रहे हैं, आप मेरा मतलब नहीं समझे, मैं भी बिना पूछे हुए बतलाकर कमज़ोर नहीं बनना चाहती।'' पद्मा जेठ की लू में झुलस रही थी, स्थल-पद्म-सा लाल चेहरा तम-तमा रहा था। आँखों की दो सीपियाँ पुरस्कार की दो मुक्ताएँ लिए सगर्व चमक रही थीं। रामेश्वरजी भ्रम में पड ग़ये। चक्कर आ गया। पास की कुर्सी पर बैठ गए। सर हथेली से टेककर सोचने लगे। पद्मा उसी तरह खड़ी दीपक की निष्कंप शिखा-सी अपने प्रकाश में जल रही थी। ''क्या अर्थ है, मुझे बता।'' माता ने बढ़कर पूछा। ''मतलब यह, राजेन को संदेह हुआ था, मैं विवाह कर लूँगी - यह जो पिताजी पक्का कर आए हैं, इसके लिए मैंने कहा था कि मैं हिमालय की तरह अटल हूँ, न कि यह कि मैं राजन के साथ विवाह करूँगी। हम लोग कह चुके थे कि पढ़ाई का अन्त होने पर दूसरी चिंता करेंगे।'' पद्मा उसी तरह खड़ी सीधे ताकती रही। ''तू राजेन को प्यार नहीं करती?'' आँख उठाकर रामेश्वरजी ने पूछा। ''प्यार? करती हूँ।'' ''करती है?'' ''हाँ, करती हूँ।'' ''बस, और क्या?'' ''पिता!-" पद्मा की आबदार आँखों से आँसुओं के मोती टूटने लगे, जो उसके हृदय की कीमत थे, जिनका मूल्य समझनेवाला वहाँ कोई न था। माता ने ठोढ़ी पर एक उँगली रख रामेश्वरजी की तरफ देखकर कहा- ''प्यार भी करती है, मानती भी नहीं, अजीब लड़की है।'' ''चुप रहो।'' पद्मा की सजल आँखें भौंहों से सट गईं, ''विवाह और प्यार एक बात है? विवाह करने से होता है, प्यार आप होता है। कोई किसी को प्यार करता है, तो वह उससे विवाह भी करता है? पिताजी जज साहब को प्यार करते हैं, तो क्या इन्होंने उनसे विवाह भी कर लिया है?'' रामेश्वरजी हँस पड़े। रामेश्वरजी ने शंका की दृष्टि से डॉक्टर से पूछा, ''क्या देखा आपने डॉक्टर साहब?'' ''बुख़ार बड़े जोर का है, अभी तो कुछ कहा नहीं जा सकता। जिस्म की हालत अच्छी नहीं, पूछने से कोई जवाब भी नहीं देती। कल तक अच्छी थी, आज एकाएक इतने जोर का बुख़ार, क्या सबब है?'' डॉक्टर ने प्रश्न की दृष्टि से रामेश्वरजी की तरफ देखा। रामेश्वरजी पत्नी की तरफ देखने लगे। डाक्टर ने कहा- ''अच्छा, मैं एक नुस्खा लिखे देता हूँ, इससे जिस्म की हालत अच्छी रहेगी। थोडी-सी बर्फ़ मँगा लीजिएगा। आइस-बैग तो क्यों होगा आपके यहाँ? एक नौकर मेरे साथ भेज दीजिए, मैं दे दूँगा। इस वक्त एक सौ चार डिग्री बुख़ार है। बर्फ़ डालकर सिर पर रखिएगा। एक सौ एक तक आ जाय, तब जरूरत नहीं।'' डॉक्टर चले गए। रामेश्वरजी ने अपनी पत्नी से कहा- ''यह एक दूसरा फ़साद खडा हुआ। न तो कुछ कहते बनता है, न करते। मैं क़ौम की भलाई चाहता था, अब खुद ही नकटों का सिरताज हो रहा हूँ। हम लोगों में अभी तक यह बात न थी कि ब्राह्मण की लड़की का किसी क्षत्रिय लड़के से विवाह होता। हाँ, ऊँचे कुल की लड़कियाँ ब्राह्मणों के नीचे कुलों में गयी हैं। लेकिन, यह सब आखिर क़ौम ही में हुआ है।'' ''तो क्या किया जाय?'' स्फारित, स्फुरित आँखें, पत्नी ने पूछा। ''जज साहब से ही इसकी बचत पूछूंगा। मेरी अक़्ल अब और नहीं पहु़ँचती। - अरे छीटा!'' ''जी!'' छीटा चिलम रखकर दौडा। ''जज साहब से मेरा नाम लेकर कहना, जल्द बुलाया है।'' ''और भैया बाबू को भी बुला लाऊँ?'' ''नहीं-नहीं।'' रामेश्वरजी की पत्नी ने डाँट दिया। जज साहब पुत्र के साथ बैठे हुए वार्तालाप कर रहे थे। इंग्लैंड के मार्ग, रहन-सहन, भोजन-पान, अदब-क़ायदे का बयान कर रहे थे। इसी समय छीटा बँगले पर हाजिर हुआ, और झुककर सलाम किया। जज साहब ने आँख उठाकर पूछा, ''कैसे आए छीटाराम?'' ''हुजूर को सरकार ने बुलाया है, और कहा है, बहुत जल्द आने के लिए कहना।'' ''क्यों?'' ''बीबी रानी बीमार हैं, डाक्टर साहब आए थे, और हुजूर.....'' बाकी छीटा ने कह ही डाला था। ''और क्या?'' ''हुजूर.... '' छीटा ने हाथ जोड लिये। उसकी आँखें डबडबा आईं। जज साहब बीमारी कड़ी समझकर घबरा गए। ड्राइवर को बुलाया। छीटा चल दिया। ड्राइवर नहीं था। जज साहब ने राजेन्द्र से कहा- ''जाओ, मोटर ले आओ। चलें, देखें, क्या बात है।'' राजेन्द्र को देखकर रामेश्वरजी सूख गए। टालने की कोई बात न सूझी। कहा- ''बेटा, पद्मा को बुख़ार आ गया है, चलो, देखो, तब तक मैं जज साहब से कुछ बातें करता हूँ।'' राजेन्द्र उठ गया। पद्मा के कमरे में एक नौकर सिर पर आइस-बैग रखे खडा था। राजेन्द्र को देखकर एक कुर्सी पलंग के नजदीक रख दी। ''पद्मा!'' ''राजेन!'' पद्मा की आँखों से टप-टप गर्म आँसू गिरने लगे। पद्मा को एकटक प्रश्न की दृष्टि से देखते हुए राजेन्द्र ने रूमाल से उसके आँसू पोंछ दिए। सिर पर हाथ रखा, सिर जल रहा था। पूछा -"सिर दर्द है?" "हाँ, जैसे कोई कलेजा मसल रहा हो।" दुलाई के भीतर से छाती पर हाथ रखा, बड़े ज़ोर से धड़क रही थी। पद्मा ने पलकें मूँद ली, नौकर ने फिर सिर पर आइस-बैग रख दिया। सिरहाने थरमामीटर रखा था। झाड़कर, राजेन्द्र ने आहिस्ते से बगल में लगा दिया। उसका हाथ बगल से सटाकर पकड़े रहा। नज़र कमरे की घड़ी तरफ थी। निकालकर देखा, बुखार एक सौ तीन डिग्री था। अपलक चिन्ता की दृष्टि से देखते हुए राजेन्द्र ने पूछा- ''पद्मा, तुम कल तो अच्छी थीं, आज एकाएक बुखार कैसे आ गया?'' पद्मा ने राजेन्द्र की तरफ करवट ली, कुछ न कहा। ''पद्मा, मैं अब जाता हूँ।" ज्वर से उभरी हुई बडी-बडी आँखों ने एक बार देखा, और फिर पलकों के पर्दे में मौन हो गईं। अब जज साहब और रामेश्वरजी भी कमरे में आ गए। जज साहब ने पद्मा के सिर पर हाथ रखकर देखा, फिर लड़के की तरफ़ निगाह फेरकर पूछा, ''क्या तुमने बुख़ार देखा है?'' ''जी हाँ, देखा है।'' ''कितना है?'' ''एक सौ तीन डिग्री।'' ''मैंने रामेश्वरजी से कह दिया है, तुम आज यही रहोगे। तुम्हें यहाँ से कब जाना है? - परसों न?'' ''जी।'' ''कल सुबह बतलाना घर आकर, पद्मा की हालत-कैसी रहती है। और रामेश्वरजी, डॉक्टर की दवा करने की मेरे खयाल से कोई जरूरत नहीं।'' ''जैसा आप कहें।'' सम्प्रदान-स्वर से रामेश्वरजी बोले। जज साहब चलने लगे। दरवाजे तक रामेश्वरजी भी गए। राजेन्द्र वहीं रह गया। जज साहब ने पीछे फिरकर कहा- ''आप घबराइए मत, आप पर समाज का भूत सवार है।'' मन-ही-मन कहा- ''कैसा बाप और कैसी लड़की। तीन साल बीत गए। पद्मा के जीवन में वैसा ही प्रभात, वैसा ही आलोक भरा हुआ है। वह रूप, गुण, विद्या और ऐश्वर्य की भरी नदी, वैसी ही अपनी पूर्णता से अदृश्य की ओर, वेग से बहती जा रही है। सौन्दर्य की वह ज्योति-राशि स्नेह-शिखाओं से वैसी ही अम्लान स्थिर है। अब पद्मा एम.ए. क्लास में पढ़ती है। वह सभी कुछ है, पर वह रामेश्वरजी नहीं हैं। मृत्यु के कुछ समय पहले उन्होंने पद्मा को एक पत्र में लिखा था- ''मैंने तुम्हारी सभी इच्छाएँ पूरी की हैं, पर अभी तक मेरी एक भी इच्छा तुमने पूरी नहीं की। शायद मेरा शरीर न रहे, तुम मेरी सिर्फ एक बात मानकर चलो- राजेन्द्र या किसी अपर जाति के लड़के से विवाह न करना। बस।'' इसके बाद से पद्मा के जीवन में आश्चर्यकर परिवर्तन हो गया। जीवन की धारा ही पलट गई। एक अद्भुत स्थिरता उसमें आ गई। जिस गति के विचार ने उसके पिता को इतना दुर्बल कर दिया था, उसी जाति की बालिकाओं को अपने ढंग पर शिक्षित कर, अपने आदर्श पर लाकर, पिता की दुर्बलता से प्रतिशोध लेने का उसने निश्चय कर लिया। राजेन्द्र बैरिस्टर होकर विलायत से आ गया। पिता ने कहा- ''बेटा, अब अपना काम देखो।'' राजेन्द्र ने कहा- ''जरा और सोच लूँ, देश की परिस्थिति ठीक नहीं।'' 'पद्मा!'' राजेन्द्र ने पद्मा को पकड़कर कहा। पद्मा हँस दी। ''तुम यहाँ कैसे राजेन?'' पूछा। ''बैरिस्टरी में जी नहीं लगता पद्मा, बडा नीरस व्यवसाय है, बडा बेदर्द। मैंने देश की सेवा का व्रत ग्रहण कर लिया है, और तुम?'' ''मैं भी लड़कियाँ पढ़ाती हूँ - तुमने विवाह तो किया होगा?'' ''हाँ, किया तो है।'' हँसकर राजेन्द्र ने कहा। पद्मा के हृदय पर जैसे बिजली टूट पडी, जैसे तुषार की प्रहत पद्मिनी क्षण-भर में स्याह पड़ गई। होश में आ, अपने को सँभालकर कृत्रिम हँसी रँगकर पूछा- ''किसके साथ किया?'' ''लिली के साथ।'' उसी तरह हँसकर राजेन्द्र बोला। ''लिली के साथ!'' पद्मा स्वर में काँप गई। ''तुम्हीं ने तो कहा था-विलायत जाना और मेम लाना।'' पद्मा की आँखें भर आईं। हँसकर राजेन्द्र ने कहा- ''यही तुम अंगेजी की एम.ए. हो? लिली के मानी?''
निराला जी के प्रथम कहानी संग्रह लिली से [1933]